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बुधवार, 31 दिसंबर 2014

कुंडली


एक अनसुलझा सा प्रश्न या सुलझा सा उत्तर ये कहना तो आसान नही। जन्म के साथ ही लिख दिया गया मेरा कर्म, वो कर्म जिसे मेरे नन्हे से हाथों ने अभी किया तो नही था मगर भविष्य के गर्भ में उसका अंकुर प्रस्फुटित हो चुका था। जन्म के सात दिन बाद ही मेरे जीवन काल की रेखा और उस पर सुख दुख के बिन्दुओं को आचार्य सत्यानन्द ने अपने काल के गणित से कुंडली की धरा पर चिन्हित कर दिया था।
अब यदि कुछ शेष बचा था तो वो था मेरा उन बिंदुओं को जोडते हुये अपने जीवल के पलों जीते हुये निर्धारित सभी सुख के पर्वतो पर चढते और दुख के बादलों में घिरते जूझते मृत्यु की चौखट तक पहुँचना। जब से होश संभाला, कुछ भी अच्छा हो जाने पर आचार्य सत्यानन्द जी की वाणी और विद्या को शत शत नमन किया जाता, और अशुभ होने पर समय की प्रबलता की व्याख्या की जाती।
स्वयं को इस विचारधारा से बहुत दूर रखने पर भी कई बार इसके भ्रमरजाल में खुद को जकडा पाती। आज पता नही सौभाग्य से कहूं या दुर्भाग्य से मुझे मेरी कुंडली मिल गयी जिसे माँ ने शायद बहुत जतन से ऐसे छुपा कर मेरी नजरों से दूर रखा था जैसे कोई कोई चिडिया अपने नन्हे से बच्चे को बिल्ली से बचा कर रखती है। उस कुंडली में मेरी आयु रेखा ३२ वर्ष निर्धारित की गयी थी। इस सावन की पूर्णिमा से मै ३१ सावन की गिनती पूरी करने वाली थी।
नानी की मोती की माला जो मुझे बहुत पसंद थी और जिसे माँ हमेशा देने से मना कर देती थी, आज उनकी अनुपस्थिति में खोजने लगी थी, और जिसे खोजते खोजते मुझे अपने जीवन की माला मिल गयी थी, जिसमें मात्र ३२ मोती थे। मैं चाह कर भी माँ के विश्वास को जीतता हुआ नही देखना चाहती थी, इसलिये नही कि प्रश्न मेरे जीवन या मरण का था, बल्कि इसलिये की प्रश्न था उस काल का जिसे कोई भी नही देख सकता था , उसे कैसे कोई भविष्यवक्ता अपनी गणित के गुणा भाग से संख्या में बदल सकता था।
मगर क्या वाकई मैं माँ के अटूट विश्वास को हरा सकी थी। एक वर्ष बाद जब मैं घर से मीलों दूर बैठी थी, मेरी ऐसी मानसिक स्थिति हुयी कि मुझे माँ को पत्र लिखना ही पडा - आपकी बेटी कल तक आपसे मीलों दूर थी, किन्तु फिर भी आपसे मिलने की उम्मीद थी, आज आपकी सारी उम्मीदों को तोड कर आपसे बहुत दूर जा रही हूँ, जहाँ आपसे मिल पाने की सारी सम्भावनायें क्षीण हो जाती है
पत्र पढकर माँ की ह्दय गति यदि नही रुकी होगी तो सम्भवतः इसीलिये क्योंकि काल के दर्पण में घटित होने वाली इस दुर्घटना का प्रतिबिम्ब उन्हे बहुत पहले ही मेरी कुडंली में दिख गया था, जिसे वो सदैव मेरी नजरों से ओझल रखना चाहती थी कि कही उनकी कोमल हदया बेटी का हदय अपनी म्रूत्यु की छाया को देख कर समयपूर्व ही उदासीन मृत्यु का वरण ना कर ले।
मगर समय के पटल पर क्या लिखा है इसे शायद अक्षरशः कोई महाज्ञानी भी शायद नही पढ सकता ।
उस दिन मेरी मत्यु तो हुयी मगर साथ ही जीवन दान भी मिला, एक अक्षय जीवन जिस पर कोई ग्रहों या उसकी दशाओं के बिन्दु नही खींच सकता था।
मृत्यु हुयी थी मेरी आशंकाओं की, जिसमें ना चाहते हुये भी मैं उलझ गयी थी, डर गयी थी, और अपने इसी डर को माँ से छुपाने के लिये मै दूसरे शहर नौकरी का बहाना लिये आ गयी थी। यहाँ कोई नही था जो मेरे मन में स्थायी घर बना लेने वाले मेरे भय को देख सकता। जैसे जैसे मेरा ये वर्ष बीत रहा था मुझे मेरा जीवन चक्र समाप्त होता दिख रहा था। मुझे नही मालूम कैसे अनन्त ने मेरी आंखों, मेरे रोम रोम में बसे मेरे डर को पहचान लिया। और एक दिन मुझसे सब कुछ जानने के बाद मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रखा। मैं विवाह करना तो दूर उसके बारे में सोच भी नही सकती थी। ये सुख तो मेरी कुंडली में लिखा ही नही गया था। फिर कैसे मैं पल पल मृत्यु के निकट जाते जीवन को सप्तपदी के पवित्र मार्ग से ले जा सकती थी। घरवालों के सामने यह प्रस्ताव रख पाना तो मेरे लिये रेगिस्तान में केसर की फसल उगाने जैसा था। मगर अन्नत तो आज जैसे ध्रुव सा अटल विश्वास ले विवाहवेदी की अग्नि में मेरे भय की आहुति देने ही आया था।
मेरे हाथ में अपना अपना हाथ लेते हुये उसने कहा- मुझे अपना शेष जीवन दे दो। वो याचक सा मेरे सामने खडा था। मुझमें अपने माता- पिता को यह दुख देने का साहस नही था। हाँ ये जानती थी कि नित्यप्रति मेरी दीर्घायु की कामना और प्रार्थना करने वाली माँ जानती है कि उसकी पुत्री की आयुरेखा अपने अन्तिम बिन्दु की ओर प्रस्थान कर चुकी है। बस यही सोचते हुये उन्हे संक्षिप्त पत्र लिख कर अपनी निकट आती मृत्यु की सूचना इस तरह दी कि जैसे मै इस दुनिया से प्रस्थान कर चुकी हूँ।
पता नही अन्नत मुझे सत्यवान मान, मेरे लिये स्वयं को सावित्री बना ईश्वर से मेरे लियी अक्षय जीवन मांग कर लाये थे या आचार्य सत्यवान की गणना में कही कोई त्रुटि हुयी थी, आज विवाह के दो साल बाद मैं अपने पति और पुत्र के साथ उस घर में जा रहे थे जहाँ मेरी आज भी मेरे विछोह में मेरी माँ की आंखे नम हो जाती होंगी। जहाँ मेरे काल्पनिक क्रियाकर्म में मेरी कुडंली को जलप्रवाहित कर दिया गया होगा।
जहाँ शायद अब अपने नवासे को देख कर उसकी नानी अपने नैनिहाल नाती की कुडंली बनवाने किसी आचार्य सत्यानन्द के पास नही जायगी।


गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

काश और शायद


काश और शायद
शब्द हैं, कुछ ना हो पाने के
फर्क है, सिर्फ अहसासों का
एक में नाउम्मीदी का कफन
दूजे में उम्मीद की सूरत दिखती है

काश! मुझे वो मिल जाते
शायद, वो मुझको मिल जाये
एक में ना मिल पाने का दुख
दूजे में मिलने की आस झलकती है

काश ! ऐसा हो जाता
शायद ऐसा हो जाय
एक में हताशा निराशा
दूजे में कर्मठता की राह निकलती है

काश ! ये दिन बदल जाते
शायद ये दिन बदल जाये
एक में जीवन की अन्तता
दूजे में अनन्त जिन्दगी मिलती है

काश डुबाये अन्धकार में
शायद भोर का तारा है
एक काल चक्र में खोया
दूजे में गति की कल्पना संवरती है

काश है वो परछाई जो
पीछे पीछे चलती है
शायद ऐसा साया जिसमें
आगे बढने की इच्छा पलती है

काश और शायद तो
दो पहलू है जीवन जीने के
एक कहता और भरता आहे
दूजे में हौंसलों की पिटारी खुलती है

परिवर्तन


मनोहर भइया आज हमार जी मा बार बार रहि रहि के जाने काहे ई बिचार आ रहा है जइसन हम कउनो दगा करा है। हमका कुच्छौ समझ नही आ रहा, का सही है का गलत। अब आपै हमका रास्ता दिखाओ।
रहीम कल से राबर्ट कहलाने वाला था, गाँव में आये मिशनरी के लोगो से उसने घर की रोटियों के लिये धर्म परिवर्तन करने को हांमी तो भर दी थी, मगर अब उसकी आंखों से नींद कोसो दूर थी। मन में उथल पुथल थी, कि कल से जाने क्या क्या बदल जायगा। और अपनी इसी ऊहा पोह को शान्त करने के लिये अपने मित्र मनोहर जिसको वो अपने से भी ज्यादा मानता था, के पास आया था।
कुछ देर तक ऐसा सन्नाटा पसरा रहा कि अगर एक पत्ता भी गिरता तो उसकी आवाज भी दूर तक साफ सुनाई दे जाती। फिर उस सन्नाटे की चुप्पी को तोडते हुये मनोहर ने बहुत गम्भीर मुद्रा में रहीम से कहा- भैया हम गरीब लोगन का एक ही धरम है और वो है अपने परिवार का दुई बखत की रोटी देना। सुख सुबिधा तक तो हम सोच ही नही सकत। हमार नाम राम होय, रहीम होय या राबर्ट का फरक पडत हैं, ई सब तो अमीर लोगन की खातिर है। औ फिर हमका इक बात बताओ तुमहार नाम बदल जाय से का तुम्हार करम बदल जइहै, का तुम्हार भासा बदल जइहै, का तुम कल से इंगलिश मा गिटिर पिटिर करै लगिहो, का हमार तोहार रिशता बदल जइहै, का ई गाँव का हवा पानी बदल जइहै, का तुहार आतमा बदल जइहै | ना भइया कुच्छो ना बदली, कल भी तुम अइसै हमार साथ बैठियो, बतलइहो। बस फरक इत्तै होई कि तुम्हार घरवाली, तुम अउर तुमहार बच्चा भूखे पेट ना सोइहै। भैया हाथ मा चार पैसा आये का चाही। चाहे उई खुदा के घर से आवै, या ईशा के।
तुमका तो खुश होए का चाही कि कल से तुमका काम मिल रहा है। अब तुमहो इंसान हुई जइहो, नही तो गरीब मनई अउर कुकुर मा ज्यादा फरक नही।
अब जाओ और चैन से सो जाओ, अब तुहार दुख के दिन खतम, हाँ ई बात याद रख्खेओ हमार लिये तुम हमार रहीमै रहिहो।

बात तो सोचने की है, आखिर क्या बदल जाता है धर्म परिवर्तन से, क्या वाकई, ईश्वर, खुदा या गॉड गिनती करते होंगे, कि धरती पर कितने लोग है जो उनको मानने वाले हैं। क्या वाकई में कही सबकी अलग अलग सत्ता है, क्या गले में तुलसी की माला डाल कर कोई हिन्दू, या क्रास डाल कर कोई इसाई बन जाता है। क्या कल तक मस्जिद में सजदा करने वाला आज अपनी मुसीबत में, या अल्लाह, या खुदा की जगह ओह गॉड कह पायगा। क्या सुबह उठ कर हनुमान चालीसा पढने वाला, पाँच वक्त की नमाज अदा करते समय राम को याद नही करेगा। और अगर वो ऐसा करेगा तो क्या खुदा या भगवान उससे नाराज हो जायेंगें। हकीकत की जमीन पर क्या क्या बदलेगा धर्म परिवर्तन से.........



गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

अब रक्त धरा पर और नही



चाह रहा मन आज लिखना
जो बचा सके इंसानियत
एक लकीर खींचना उन दिलों में
जो पूज रहे है हैवानियत
कैसे मैं समझाऊं उनको
ये नही खुदा की चाहत
खून बहा कर नही मिली है
कभी किसी को राहत

बहुत हो चुका, अब तो छोडो
बदले की आग में जलना
गोली बारुद के ढेरों पर
अब सौदे मौत के करना
जन्मा नही तुमको माँ ने
बेगुनाहों का रक्त बहाने को
क्यों दागदार फिर करते 
तुम उसके दूध पिलाने को

याद करों उन दिन को जब
तेरे रोने पर माँ रोई थी
तुझे सुलाने की खातिर
रात सारी नही वो सोई थी
बता भला, अब कैसे सोयें वो 
जिनके नन्हों को तूने सुलाया है 
कैसे खुदा बेहरबां हो तुझ पर
बेबस ममता को तुमने रुलाया है

है वक्त अभी भी, कुछ तो सोचो
कुछ तो सच्चे काम करो
छोडो ये बन्दूक तमंचे
इंसानियत का सम्मान करों

रो रो कर कह रहा अल्लाह
अब रक्त धरा पर और नही
मत मार जालिम मासूमों को
सब मेरे बच्चे हैं कोई गैर नही

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

ये कैसी शिक्षा ??





शिक्षा का बाजार बने है
ये विघा के मंदिर
शिक्षा छोड के सब मिलता है
देखो इसके अंदर


अब पहले से नही रहे
गुरुजन द्रोण के जैसे
ढूढे से भी ना मिलते  
शिष्य भी अर्जुन के जैसे 


हाथ में डिग्री उनके होती 
जिनकी जेब में पैसे 
जिसके पास नही हो पैसा
वो पढने को तरसे

विधार्थी बन रहे कस्टमर 
और टीचर बना इम्प्लाई
स्टूडेंट से कुछ कहे तो समझो 
उसकी जीविका पर बन आई 

बच्चो से ज्यादा रिजल्ट की चिंता 
रोज गुरुवर जी  को है सताती 
एक्साम के दिनों में यही सोच कर
गुरु  जी को नीद भी नहीं आती 

सुबह सवेरे मंदिर जाकर
मन्नत टीचर है  मांगे
और बरगद के पेड़ में जाकर 
मोटे धागे भी बांधे 

बिन शिक्षा के फल फूल रहा
देखो शिक्षा का व्यापार
बिन शिक्षित हुए लोग भी पा रहे 
मेडल नौकरी और उपहार 

शिक्षा का बाजार बने है
ये विघा के मंदिर
शिक्षा छोड के सब मिलता है
देखो इसके अंदर



चित्र के लिए गूगल का आभार 

रविवार, 7 दिसंबर 2014

कुछ रंग जिन्दगी के


जाने कैसे बना देते हैं लोग
ह्र्दय भी पाषाण का
पिघलना तो दूर
एक लकीर तक नही खिंचती मनुष्यता की

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कोई बना दे यंत्र
जो पहचान सके
सच्चे और झूठे जज्बात
कि बहुत लुटा चुका
सहद्यता के मोती
चील कौंवों  में

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वो क्या समझेंगें
मेरे होने ना होने का मतलब
जिनके लिये
प्यार एक उम्र नही
 है मात्र एक पल खुशी का

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जगह भी वही
मै भी हूँ वही
दिन रात सुबह शाम
सब कुछ तो है वैसा ही
जाने क्या बदला
मैं आदम से खुदा हो गया

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जिसे फेंक दिया
किसी ने
यूं ही कुछ सोचे बिना
कुछ और नही
किसी की जिन्दगी थी,
भूख थी
किसी तडपते
पेट की।
और थी आस,
एक रात जिन्दगी में
भरपेट खा कर सोने की






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