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रविवार, 13 नवंबर 2011

गलती या लावरवाही - निर्णय पाठक ही करेंगें ......




अपनी बात कहने से पहले आप सभी पाठकों से एक सवाल का उत्तर चाहूंगीं - अखबार में दिनांक का कितना महत्व होता है ?

हम तो यही समझते है कि अखबार तिथि के हिसाब से ही बिकता है , १ तारीख का अखबार २ तारीख को रद्दी बन जाता है , अगर हम कोई पुरानी खबर अखबार में ढूंढना चाह्ते है तो पहले यह ही सोचते है के फलां खबर किस दिन के अखबार में थी । जितना महत्व अखबार में किसी खबर का होता है , उससे कम महत्व उस अखबार में छपी तिथि का भी नही होता ।

अब जरा सोचिये अगर अखबार में तिथि ही गलत पडी हो तो ?
हिन्दुस्तान -भारत का एक प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक अखबार है । और यह देश ही नही विदेशों में भी पढा जाता है, जिससे की उसकी जिम्मेदारी और अधिक बढ जाती है ।
पिछले तीन दिनों से लगातार हम हिन्दुस्तान(कानपुर) अखबार में देख रहे है कि अखबार बहुत मेहनत और ईमानदारी से खबरें तो छाप रहा है, लेकिन शायद उसके लिये अखबार के पहले पन्ने पर छपने वाली तिथि पर ध्यान जा ही नही रहा । जिसका परिणाम यह हुआ कि मुझे ब्लाग के माध्यम से यह कहना पड रहा है, बहुत कोशिश के बावजूद हमे हिन्दुस्तान(कानपुर) के मुख्य सम्पादक का ई-मेल आई डी नही मिल पाया ,

अब जरा आप लोग भी इन चित्रों को जरा ध्यान से देखिये ...
13 nov 2011 (please see both red box)

14th oct 2011 (please again see both red box)


12th nov 2011
११ नवम्बर के अखबार के मुख्य पृष्ठ का चित्र कुछ कारणों से उपलब्ध नही कर सकी हूँ, किन्तु उस दिन भी यही गलती हुयी है ।

अखबार तिथि अंग्रेजी और हिन्दी दोनो ही हिसाब से छापता है, और ऐसा सभी हिन्दी अखबार करते है । शायद ऐसा करके वो किसी परम्परा को निभाते है । क्या अंग्रेजी हिसाब से सही तिथि का छपना ही पर्याप्त है , तो फिर हिन्दी हिसाब से तिथि को छापने का क्या उद्देश्य है ?

आप सभी सोच रहे होगें कि गलतियां किसी से भी हो सकती है, अखबार से भी यदि हो गयी हो यह कोई बहुत बडी बात तो नही हो जाती । हम आप सभी से पूर्णतः सहमत हैं, किन्तु गलती की पुनरावृत्ति हमारी लावरवाही को दर्शाती है । लगातार तीन दिनों से गलत तिथि का अखबार में छपना अखबार के छपने में कार्यरत पूरी टीम की लापरवाही को ही दिखाता है ।

हम इस ब्लाग के माधयम से हिन्दुस्तान(कानपुर) अखबार के माननीय सम्पादक महोदय से विनम्र निवेदन के साथ यह कहना चाहते है कि कृपया इस विषय पर उचित ध्यान दें और अगले संस्करण में इस भूल सुधार का उल्लेख अवश्य करें ।

उम्मीद करती हूँ अखबार इसको अन्यथा ना लेते हुये अपनी भूल अवश्य स्वीकार करेगा और भविष्य में इस प्रकार की लापरवाही ना करने का आश्वासन भी देगा ।

हिन्दुस्तान की पाठिका एवं शुभचिन्तक

सोमवार, 7 नवंबर 2011

अन्जाना गुनाह


मुझे नही मालूम की इसे प्यार कहा जाय , दीवानापन कहे या दिल की नादानी, मगर कभी कभी किसी को एक झलक देख कर ही हम उसे अपना दिल दे बैठते है , कभी कभी हम बिना कुछ जाने समझे ही लाखों सपने बुनने लगते हैं , और फिर जब उन सपनों के आसमां से हकीकत की जमीं पर आते हैं सब कुछ जानते हुये भी दिल कुछ समझना ही नही चाहता .........

अन्जाने में आज हमसे इक गुनाह हो गया ,

उनकी इजाजत के बिना उनसे प्यार हो गया

वो छुपाते रहे खुद को रेशमीं चिलमन में,

मगर मेरी नजरों को उनका दीदार हो गया

कल तक हसँते थे हीर मजनूं की दास्तां पे,

नाम अपना भी दीवानों में अब शुमार हो गया

गुजरते गुजरते मोहब्बत के साहिलों से दिल,

इश्क के दरिया में डूबने को बेकरार हो गया

ना नाम ही जाना , ना पता ही घर के उनका,

बस इस मोड से गुजरने का इन्तजार हो गया

उनकी नजरों ने नजर भर भी ना देखा हमको,

उन्हे भी प्यार है हमसे, ये हमे ऐतबार हो गया

इक हसीं सी हँसी ही सुनी, आज तलक उनकी,

हम समझने लगे मोहब्बत का इकरार हो गया

वो जो आये कुछ देर से किसी और के साथ,

गुल खिलने से पहले ही गुलशन उजाड हो गया

बुधवार, 26 अक्टूबर 2011

एक दीवाली ऐसी भी


दिल्ली की पाशॅ कालोनी मयूर बिहार से सटी हुयी है, राधे की झोपडी। पूरी कालोनी दुल्हन सी सजी हुयी है । और ठीक चिराग तले अंधेरा की कहावत को चरित्रार्थ कर रही थी उसकी छोटी सी झोपडी जिसमें सारी दुनिया का अंधकार समाया हुआ था । राधे और सुखमयी की दीवाली तब शुरु होती थी जब सारी कालोनी त्योहार मना कर थक कर सो जाती थी , तब रात ढले दोनो कालोनी की गलियों में निकलते और बुझी हयी मकान पर लगी मोमबत्ती , दिये बिनते , पटाखों के बिखरे हुये कागजों में बिन जले पटाखे और आधी जली छुछुरियां ढूँढने की कोशिश करते । आज भी जब पूरी कालोनी दीवाली के जश्न में डूबी हुयी थी, सुखमयी अपने दोनो बच्चों को ये कह कर सुला रही थी , कि अभी तुम लोग सो जाओ, जब ये इन सब लोगों के पटाखे खत्म हो जायेगे तब हम लोग पटाखे छुडायेगें, दिये जलायेगें, अभी तो लक्ष्मी जी भी किस किस के घर जायेगी, मगर तब जब सिर्फ अपने घर में दिये जलेगे तो अपने ही घर आ कर रुकेंगीं । मगर क्या पता था कि आज की रात उनको ऐसी भी दीवाली नसीब नही होगी। वो अपनी गली से निकल कर सडकों पर अपने बच्चो की दीवाली ढूँढ ही रहे थे , कि तभी सुखमयी की नजर एक मकान की बालकनी पर रखे बिन जले अनार पर पड गयी , उसे लगा जैसे उसने अपने बच्चों के लिये कोई खजाना देख लिया, आज ही तो दिन में , मुनेर(उसके छोटे लडके) ने कहा था अम्मा इस बार एक अनार ला देना ना , अम्मा उसमे बहुत सारा उजाला होता है ,और उससे  तारे भी निकलते है । उसने अभी अनार उठाया ही था कि मकान के अंदर से एक आदमी चिल्लाया चोर चोर , उसका शोर मचाना था कि मकान के सभी लोग निकल आये , शोर सुन कर मोहल्ले वाले भी जमा हो गये , और देखते ही देखते भीड ने उन्हे अपने जश्न का एक और साधन समझ उनको लहूलुहान कर डाला । उस भीड में एक भी व्यक्ति उसकी बात सुनने वाला ना था , या शायद उस गरीब की आवाज में इतना दम नही था जो उन रहीसों के कानों तक जा पाती ।
भीड उस पर अपना जोर दिखाती रही और मकान की मुडेर पर रखा अनार बेबसी से सब देखता रहा, और सोचता रहा कि काश वो मुनेर के घर जा पाता, और उस मासूम को कुछ खुशियां दे पाता ..........



दीप जल रहे है गली गली
आंगन आंगन सजी रंगोली
हर मन मे खिले खुशहाली
आओ ऐसे मनाये दीवाली

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

अह्सास की आवाज


दो घडी गुजारी थी मोहब्बत में कभी ,

बैचैन हुआ था ये दिल भी कभी,
 
अह्सासों के आगोश में हम भी खोये थे कभी,

जिन्दगी खूबसूरत सी लगी थी कभी,

वक्त को थमते देखा था कभी,

जमीं आसमां मे मिलते नजर आयी थी कभी,

तपती धूप भी भली लगी थी कभी,

इन होठों पे मुस्कान खिली थी कभी,

दुआओं के लिये हाथ उठे थे कभी,

हर रंग में इश्क बसा लगता था कभी

तनहाई भी ना तन्हा लगती थी कभी

इक नाम ही जुबां पे रहता था कभी

सब कुछ वैसा ही तो है आज भी मगर

तेरे होने ना होने का फर्क साफ नजर आता है

कहती नही किसी से , और कहूँ भी तो क्यों

जब तेरे सिवा कौन मुझको समझ पाता है

धूप की तपिश आज भी महसूस नही होती

हर रंग में तेरा प्यार नजर आता है

वक्त वही थम गया सा लगता है

तेरे अह्सास में ही दिल खोया रहता है

लोग कहते है दुनिया हर पल बदलती रहती है

मुझे तो कुछ भी बदला नजर नही आता

कल भी तुम ही रहते थे निगाहों में मेरी

आज भी नजरों को सिर्फ तू ही नजर आता है
सिर्फ तू ही नजर आता है ..................




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