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शनिवार, 11 अगस्त 2012

सभ्य समाज का छुपा सच



आज मै एक ऐसे शख्स से मिली, जो मेरी नजर में खुदा से कम नही मगर समाज उन्हे हिराकत भरी नजर से देखता है, कोई उनके साथ तो क्या आस पास भी नही रहना नही चाहता। आज सुबह जब मैं अपने घर के लॉन में बैढी अखबार पढ़ रही थी कि एक करीब ६० वर्ष की महिला आयी, मुझे लगा कि जरूर पैसे मांगने वाली होगी, मगर नही वो तो काम माँगने आयी थी, मैने कहा- अरे इस उम्र में क्या काम करोगी और मै पाँच रुपये देने लगी, जो अभी थोडी देर पहले टमाटर खरीदने से बचे थे और मैने पल्लू में बाँध लिये थे। कहने लगी - बिटिया कुछ काम पर रख लो, जो चाहे दे देना , मुझ बुढिया को चाहिये भी क्या, बस दो बखत की रोटी। मुझे लगा ये ऐसे पैसे नही लेने वाली मगर ऐसे कैसे काम पर रख ले, वो भी संजय से बिना पूँछे, मैने कहा - अम्मा ऐसा करो इस लॉन की घास निकाल दो। वो काम करने लगी, तो मैने कहा - अम्मा तुम्हारे कोई बेटा बहू नही है क्या जो इस उम्र में ऐसे काम ढूँढ रही हो , तो उसने कहा - अरे ये सब मेरा नसीब कहाँ , जब आज तक घर ही नही मिला तो बेटा तो बडी दूर की बात हो गयी, उसकी इस एक बात ने मेरे मन में हजारों सवाल खडे कर दिये,मैने कहा - आप ऐसा क्यों कह रही हैं, तो वो बोली- अरे हम तो नाच गाना करके कमाने खाने वाली हैं, जब तक उम्र रही हुनर का खाया मगर और अब तो ना उमर का जोर रहा ना पैसे का, दो रोटी के भी लाले पडे हैं, सारी जिन्दगी मेहनत का ही खाया अब भीख माँग कर नही खाया जाता , और मेरा कल जानने के बाद कोई अपने घर में मेरा साया पडने तक को मनहूसियत समझता है। अब तक मैं ये तो समझ गयी थी कि ये कौन है, मगर अब मेरे मन में नये प्रश्न जन्म लेने लगे कि आखिर क्यो इन्होने ये काम किया, मैने कहा अम्मा तो क्या तुम पैदाइशी से इसमें थी या.... मुझे बीच में रोकते हुये और कुछ याद करते हुये बोली - नही नही, पैदा तो मैं बहुत बडे खानदान में हुयी थी, उन दिनों मेरे पिता जी का बडा रुतबा हुआ करता था, हम लोग इलाहाबाद में रहते थे, बनारस गयी थी सबके साथ बाबा बिश्वनाथ के दर्शन करने, वही खो गयी , और ऐसी खोयी कि वापस कभी घर की दहलीज नसीब नही हुयी कहते कहते वो कहीं खो सी गयी, उनकी बात सुनते सुनते मेरी आँखों में पानी आ गया मगर उनकी आँखों मे नमी का कोई नामो निशान ना था, शायद वक्त की मार ने उनके आँसू भी उनसे छीन लिये थे, मैने कहा- तो आप कितनी बडी थी तब, अपना घर नही जानती थी क्या जो वापस नही जा पाई। आसमान की ओर देखते हुये बोली- सब तकदीर के खेल हैं, मैं तब करीब सात या आठ बरस की थी, घर वालों से मेले में अलग हो गयी थी, खडी रो रही थी, कि एक आदमी आया और कहने लगा कि यहाँ मत रो मेरे साथ आओ, उधर की तरफ कैंप लगा है वही सारे खोये बच्चे हैं वहाँ तुम्हारे पिता जी तुमको लेने के लिये आये होंगें, और मैं उअसके साथ चल पडी, ना जाने उसने मुझे क्या सुंघाया, कि जब आँख खुली तो बस अपने सामने तबले और घुंघरू ही देखे, बहुत कोशिश की निकलने की मगर रज्जो को नूरजान बनने से नही बचा पायी, और अचानक उनकी आँखों से पानी की वो धार बह निकली जो शायद बरसों से बादल बन कर कही रुकी हुयी थी, मैं उनके पास चली गयी, अम्मा कुछ बहुत बुरा याद आ गया क्या? तो कहने लगी , बुरा या भला ये तो दुनिया ही जाने, करीब वहाँ आने के तीन साल बाद की बात है, उस दिन जब मैं मुजरा कर रही थी तो सामने एक शख्स को देखा जिसको देखने के बाद मेरे पैर वही जम से गये, दिल जोर से धडकने लगा, और मन में नयी जिन्दगी की आस जाग पडी, पता है वो इन्सान कौन था वो मेरा अपना खून, मेरा भाई था, उस दिन एक पल को लगा कि धरती मैया यही फट जाओ और मैं समा जाऊँ, और दूसरे पल लगा कि शायद ईश्वर को मुझ पर दया आ गयी और मेरा भाई आज राखी का फर्ज निभाने आया है, मगर नही वो तो बस ये कह कर निकल गया कि हम सबने ये मान लिया है कि तुम मर चुकी हो, और तुम भी यही मान लेना, मरे हुये लौट कर नही आया करते।
उस दिन मेरे मन में एक ही बात आयी थी जो आज भी बस सवाल ही है कि जब एक रज्जो नूरजान बन सकती है तो फिर एक नूरजान रज्जो काहे नही बन सकी.............
और मेरे सामने अमीरन और उमरावजान की तस्वीर उभर आयी जो मैने बचपन में देखी थी.........


रविवार, 29 जुलाई 2012

राखी- प्रतीक भाई बहन के स्नेह का...........


रजनी सोच रहा हूँ इस बार राखी पर दीदी के लिये कोई अच्छी सी साडी ले आते हैं, क्यों तुम्हारा क्या ख्याल है। आप भी ना घर कैसे चला रही हूँ इसका तो कोई ध्यान नही बस आपको दीदी के अलावा कुछ सूझता ही कहाँ है? अब साडी का मतलब कम से कम हजार रुपये, अरे मै कहती हूँ जब १०१ से काम चल जाता है तो इस खर्च की क्या जरूरत, एक बार दे दोगे तो हर बार का ही हो जायगा और ज्यादा ही मन कर रहा है तो २०१ दे देना। फिर तुम्हारी दीदी भी आखिर क्या ले कर आती है वही बेसन के लड्डू वो भी घर से बना कर , बीच मे ही रोक कर अनय ने कहा, मगर वो ही मुझे पसन्द है तुम भी तो जानती हो मुझे और कोई मिठाई पसन्द ही नही, मगर रजनी कहाँ कुछ मानने वाली थी, हाँ ठीक है मगर मेरे लिये तो कुछ ला ही सकती हैं कह कर वो रसोई में चली गयी, और अनय बेमन से आफिस के लिये तैयार होने चल दिया । आफिस मे भी आज अनय का मन नही लग रहा था, सोच रहा था क्या फायदा इतने हाई पैकेज की नौकरी करने का, जो मै अपनी दीदी के लिये एक साडी भी नही खरीद सकता, वो दीदी जो हमेशा मेरी खुशियों के लिये पापा जी से छुप कर मेरे लिये बपपन में चाकलेट, बैट बॉल और ना जाने क्या क्या ला दिया करती थीं, मेरी हर छोटी छोटी खुशी को पूरा कर देती थीं, और सोचते ही सोचते उसने रजनी को फोन कर दिया - रजनी ऐसा करना दीदी को फोन कर देना कि कल राखी पर ना आयें, मुझे आफिस के काम से तीन दिन के लिये बाहर जाना है, हाँ मेरा बैग पैक कर देना मुझे तुरन्त ही निकलना होगा। मै कहूँगा तो शायद ठीक ना लगे, अब तुम ही बताओ आफिस का काम वो भी टूर छोडा तो नही जा सकता ना जिसमें चार पैसे बनने की उम्मीद होती है। आप चिन्ता ना करो मै दीदी से कह दूंगी । और फिर उसने दूसरा फोन अपनी दीदी को किया- दीदी इस बार राखी पर आप नही मै आ रहा हूँ , आप तो बस मेरे लड्डू बना दो । उसने घडी देखी ५ बजने वाले थे, फटाफट वो घर के लिये निकला , अभी उसको अपनी दीदी के लिये साडी भी तो लेनी थी और समय से घर भी पहुँचना था।

सोमवार, 23 जुलाई 2012

अनसुलझे उत्तर



तुम भी कमाल करती हो सुधा, एक हफ्ते से तुम अस्पताल मे हो और मुझको बताना जरूरी भी नही समझा , वो तो आज जब छुट्टियों के बाद मैं कालेज गया तब शिशिर ने मुझे बताया कि तुम बीमार हो । मुझसे अगर कोई गलती हुयी तो बता देती, आखिर किस बात की तुमने मुझे ये सजा दी  कहते कहते महिम का गला रूँध सा गया, आँखे छलक सी गयी । महिम तुमने कोई गलती नही की, प्लीज ऐसा क्यो सोचते हो , और फिर अगर मै अगर खुद को सभांल पाने की स्थिति में ना होती तो तुमको बुलाती ही,आखिर तुम्हारे सिवा और किसे बुलाती । तो तुमको लगता है कि इतने दिनों से तुम यूँ ही यहाँ एड्मिट हो , और मै बेकार ही तुम्हारी फिक्र कर रहा हूँ , और कहते कहते महिम कुछ नाराज सा हो गया, तो धीरे से सुधा ने महिम का हाथ थामते हुये कहा- महिम सच कहना क्या आधी रात अगर मै तुमसे कहती कि मै बीमार हूँ तो क्या वाकई तुम अपनी पत्नी को छोड कर मेरे पास आ पाते........... कहते  कहते उसने आँखे बन्द कर ली  मगर उसके हाथ की पकड इतनी मजबूत हो गयी थी जैसे कोई बच्ची अपनी नयी गुडिया को समेट कर सो जाती है , और महिम बस अपनी गुडिया को अपलक देखता रहा, क्योकि कहने के लिये शायद उसके पास भी कुछ नही था, और शायद सुधा को भी किसी उत्तर का इन्त्जार नही था, या शायद कुछ प्रश्नो के जवाब हो कर भी नही होते.............

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

जब से...............



हर चीज  खूबसूरत नजर आने लगी, जब से वो बसने लगे  मेरी निगाहों में,
मोहब्बत की रूह से रू-ब-रू हुये तब, जब कही हर बात उन्होने इशारों में।

देखा सुना पढा लिखा भी
यूं तो बहुत इश्क के बारे में....
मगर दिखा ना था अब तक
जो दिखता है अब हर नजारे में
हर बात भली सी लगने लगी जबसे, बसने लगे वो, मौसम के नजारों में,
मोहब्बत की रूह से रू-ब-रू हुये तब, जब कही हर बात उन्होने इशारों में।

महसूस हुआ है अब हमको
कितने तन्हा थे हम, खुद में
क्यो हुये ना थे खुश अब तक
जबकि खडे थे खुशियों के ढेरों में
क्या होता है साथ ये जाना, जब दो कदम साथ चले, सागर के किनारों में,
मोहब्बत की रूह से रू-ब-रू हुये तब, जब कही हर बात उन्होने इशारों में।

ना जाने कहाँ कैसे और कब
खो गया हर डर मेरे मन से
कुछ संवर गये, कुछ निखर गये
कहते है अब तो ये सब हमसे
दुनिया को सिमटते देखा , जब पाया खुद को, उनकी बाहों के सहारों में,
मोहब्बत की रूह से रू-ब-रू हुये तब, जब कही हर बात उन्होने इशारों में।

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