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शनिवार, 17 अगस्त 2013

एक बार ..............ONCE


एक बार खता मैने भी की,
दिल किसी से लगाने की,
एक बार गुनाह हुआ हमसे
दिल किसी का चुराने का,

एक बार तमन्ना कर बैठी,
प्यार किसी का पाने की,
एक बार हुआ जी मेरा
इश्क की हद से गुजर जाने का

एक बार दिखा है मुझको भी
चांद दिन के उजालों में
एक बार आया मेरे घर भी
मौसम भीनी मोहब्बत का

एक बार नही दो बार नही
बस तो हर पल एक आलम है
याद आता है बस अब वो सब

जो एक बार हुआ, एक बार हुआ

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

मै कौन हूँ ????




कभी अधूरी प्यास हूँ , कभी खामोश आवाज हूँ ,
कभी धूल मै राहों की , कभी  गीत का साज हूँ

कभी किसी का राज हूँ , कभी किसी का नाज हूँ ,
कभी अनबुझ पहेली हूँ कभी तडपती बात हूँ

कभी आइने सी साफ हूँ , कभी पाकीजा आग हूँ ,
कभी मैं शीतल छाया सी ,कभी प्रतीक्षित सौगात हूँ

कभी बहता झरना हूँ, कभी जंजीरों मे जकडी हूँ,
कभी सुहाना मौसम हूं , कभी मचलती बरसात हूँ

कभी तन्हा जीवन हूँ , कभी महफिल की शान हूँ
कभी हंसी सुबह हूँ तो , कभी बिखरती रात हूँ

कभी रिवाजो की गठरी , कभी काठ की पुतली हूँ
कभी लाज शर्म की मूरत , कभी मै टूटी साख हूँ

कभी बोझ अपनो का हूँ , कभी अमानत परायी हूँ
कभी सिमट्ती धरती हूँ , कभी स्वच्छंद आकाश हूँ

बाबुल की चहेती गुडिया हूँ, खुद के लिये "पलाश" हूँ
पर सदा ही मै एक नारी हूँ, कभी आम कभी खास हूँ

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

पाकर तुमको लगा है ये.................














प्रियवर तुमसे मिली मै ऐसे
जैसे सागर में मिलकर नदिया
पाकर तुमको लगा है ऐसे
जैसे मिल गयी है, सारी दुनिया.....

ना थी मेरी कंचन काया
ना हिरनी से थे नैना
फिर भी तुमने हार के सब
ढूँढे मुझमें अपने चैना

ना दो पल  देखूँ तो, लगता ऐसे
जैसे बीत गयी कितनी सदियां
पाकर तुमको.....

मेरे हर अधूरेपन को
पूर्णता तुमने दे डाली
इस बंजर मन में लाये
तुम सावन बन हरियाली
हर ख्वाब मेरे साकार हुये
महसूस करूँ हर पल खुशियां
पाकर तुमको........

शनिवार, 12 जनवरी 2013

नारी मन


वो ख्वाब किसी की आंखों का, वो शब्द किसी की बातों का,

जीवन के हर क्षण में वो, वो आधार  सभी की सांसों का

रूप बदल बदल वो आये, हर रूप में सबका साथ निभाये

बिन उसके जीना असम्भव, पर सभी को ये समझ ना आये

दुनिया कभी पूजती उसको, कभी करती है उसका अपमान

नादां लोग ना जा सके, है उसके मान में ईश का मान

वो जीवन की धुरी धरा पर, उसका जीवन ही खतरे में

जब प्रहरी भी बन जाते भक्षक, तो बचे वो कैसे पहरे में

गॄहलक्ष्मी को ग्रहण लगाते, आंखों के तारे राहू बन जाते

कहने को ज्ञानी कहलाते, पर "नारी मन" समझ ना पाते
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