प्रशंसक

रविवार, 19 सितंबर 2021

दो चोटी वाली



राहुल आज जब स्कूल से लौटा तो बहुत अनमना सा दिखाई दे रहा था, रोज की तरह आते ही ना तो उसने मम्मी से खाने के बारे में पूंछा और ना ही अपने स्कूल की कोई बात की। बस सीधा आकर बैग और जूते उतार सोफे पर उल्टा लेट गया। राधिका के मन में थोडी चिंता हुयी। ममता भरे हाथ से उसका सिर अपनी गोद में लेते हुये बोली- क्या हुआ राहुल, दोस्तों से कुछ झगडा हुया क्या या टीचर से किसी बात पर डांट पडी। 

राहुल मां की गोद से अपना सिर फिर से सोफे पर रखते हुये बोला- नही मां कोई बात नहीं। बस ऐसे ही।

मां अपने व्याकुल होते मन को समेटते हुये फिर लाड से बोली तो फिर क्या हुआ मेरे लाल को, अच्छा चल बात बाद में बता देना, तुम हाथ मुंह धुल लो, मै तेरा खाना लगाती हूं।

नहीं मां मुझे भूख नहीं, कह कर राहुल दीवाल की तरफ मुंह घुमा लेट गया।

अब तो हर मां की तरह राधिका भी समझ गयी कि बात कुछ ऐसी है जिससे उसके बच्चे का मन अंदर तक दुखी है।

राहुल का चेहरा अपनी तरफ करती हुयी बोली- राहुल बोलो ना बेटा, मेरी कोई बात तुमको अच्छी नहीं लगी क्या, सच सच बता क्या हुआ आज स्कूल मेंं ?

राहुल भी आखिर कितनी देर बात मन में रख पाता, आखिर था तो अभी दस ग्यारह वर्ष का बालक ही।

रुआसा सा हो बोला- मम्मी मैं आपकी सारी बात मानता हूं ना

राधिका- हां, तू तो मेरा बहुत अच्छा बेटा है।

राहुल् - मां, अगर मै आपसे कुछ कहूं तो आप मान जायेंगीं क्या?

राधिका को लगा शायद के राहुल कहीं कोई बडी चीज की डिमांड तो नहीं करने वाला, पता लगे वो प्रॉमिस तो कर दे मगर पूरी ना कर सके, तब राहुल को और दुख होगा।

बच्चे को कई बार जब मां कोई चीज नहीं देती तो पिता से कह लेते हैं या पिता कोई जिद पूरी नहीं करते तो किसी तरह मां कर देती है, मगर राहुल की तो मां भी वही है और पिता भी वही।

किस्मत ने रुष्ट हो कर राहुल के अबोधपन में ही उसके पिता को उससे दूर कर दिया था। शायद सॄष्टि रचयिता की कहीं कुछ कृपा थी जो राहुल के पिता एक सरकारी विभाग में क्लर्क थे, जिनके जाने के बाद राधिका को जीपनयापन की कटु कठिनाइयों का सामना नहीं करना पडा था, मगर वह अपने बच्चे की हर अभिलाषा पूरी करने में समर्थ हो ऐसा भी नहीं था। 

यही सब सोच उसने कहा- तेरी मां के लिये संभव होगा तो क्यूं नही मानेगी अपने बेटे की बात।

राहुल अब तक सोफे से उठकर बैठ चुका था

सिर नीचे किये हुये धीरे से बोला- मम्मी आप ना ये दो चोटियां ना किया कीजिये, आपको नहीं पता सब लोग अपने घर को दो चोटी वाली का घर, और मुझे दो चोटी वाली का बेटा कहते हैं, मम्मी मुझे ये सुनना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।

राधिका मोहल्ले वालों के अपने प्रति इस संबोधन से अनभिज्ञ हो ऐसा नही था किंतु यह शब्द राहुल भी सुनता होगा और उसका मन दुखी भी हो सकता है यह बात क्यों उसके संज्ञान में स्वतः ही नहीं आई, इसका उसे दुःख हो रहा था।

उसने कहा- अरे बस इतनी सी बात थी क्या जिसके लिये मेरा बेटा इतना दुखी था। मै तो सोच रही थी कुछ बडी सी बात होगी जिसके लिये मेरा समझदार बेटा परेशान हो रहा है।

राहुल स्कूल से आते समय यही सोच सोच कर परेशान था कि वो यह बात अपनी मम्मी से कैसे कहेगा, कहीं उनको मेरी बात से दुख ना हो। मगर मम्मी तो जरा भी परेशान नहीं हुई।

राधिका की बात से वह सामान्य हो चुका था- थोडा चहकते हुये बोला- आपको मेरी बात बुरी नहीं लगी मां।

राधिका- अपने बच्चे की बात भला मां को बुरी भी लग सकती है क्या, मगर हां अगर अब फटाफट तुमने खाना नहीं खाया तो मां जरूर नाराज हो जायगी।

राहुल- मै बस अभी आया मां

खाना खिलाने के उपरांत, राधिका नें राहुल को सुला दिया। शाम को जब राहुल सो कर उठा तो देखा ड्रांइग रूम में राधिका कुछ पढने में व्यस्त थी और सामने मेज पर कुछ एलबम और कुछ पत्रर खे हुये थे।

राहुल- क्या पढ रही हो मां, और ये एलबम कौन से हैं?

राधिका - आओ आज तुमको वो पत्र दिखाती हूं, जो तुम्हारे पिता जी ने मुझे शादी से पहले लिखे थे।

राहुल ने अपने हाथ में पत्र ले लिया। पत्र का पहला शब्द था- मेरी प्रिय दो चोटी वाली

तभी राधिका ने एक दूसरा पत्र राहुल को पकडाया

राहुल ने पढा उसमें भी पहला शब्द यही लिखा था

अब तो एक एक कर राहुल खुद ही और पत्र उत्सुकतावश उठाता और पढता गया।

सभी में यही शब्द पहला शब्द था।

तब राधिका ने प्यार से राहुल के सिर पर हाथ फेरते हुये, अपने हाथ में ली एक तस्वीर उसे दिखाई जिसमें वो और राहुल के पिता जी थे, उसमें भी उसकी मां ने दो चोटियां कीं थी।

तब राधिका बोली- राहुल पता है- तुम्हारे पापा और मै, एक साथ पढते थे, जब पहली बार तुम्हारे पापा ने मुझे देखा तब भी मैने दो चोटियां की थी।

तुम्हारे पापा को मेरा दो चोटियां करना बहुत पसंद था।

फिर जब तुम्हारे पापा मुझे शादी करके अपने साथ ले आये,  तब मै दो की जगह एक चोटी करने लगी, जैसे सभी लोग करते हैं, तब तुम्हारे पापा ने मुझसे कहा- मुझे तुम्हारा दो चोटियां करना ही पसंद है, तुम यही किया करो,

तब मैने कहाँ - कल आस पास के लोग ही आपको चिढायेंगे वो जा रहा है दो चोटी वाली का पति तब अच्छा लगेगा आपको।

तब तुम्हारे पापा ने कहा- मुझे इस बात की कभी चिंता नहीं कि लोग क्या कहते हैं, हमे एक दूसरे की खुशी का ख्याल रखना चाहिये बस। लोगों का क्या है, उनको ये बात नही मिलेगी, तो कोई और बात ढूंढ लेंगें। और हम जब किसी की बात पर ध्यान देते हैं, तभी दुख होता है, तो इसलिये मै ऐसी बातों पर ध्यान ही नहीं देता। 

और तबसे ना कभी तुम्हारे पापा ने ये ध्यान दिया ना हमने कि लोग क्या कहते हैं, मगर मुझे कभी ये ख्याल ही नही आया, कि मेरा नन्हा सा बच्चा इस बात के कारण इतना दुखी हो रहा है। 

अबसे फिर कभी इतना परेशान मत होना, जो बात हो तुरंत बता देना।

चलो अब स्कूल का होमवर्क करा देती हूं फिर खाना खायेंगें। 

अगली सुबह जब राधिका ऑफिस के लिये तैयार हो रही थी, राहुल उठकर उसके कमरे में आया, उसने देखा राधिका ने एक चोटी की हुयी थी। 

आकर मां के गले लग गया, और बोला मम्मी पापा बिल्कुल सही कहते थे- आप दो चोटी में ही अच्छी लगती हो, प्लीज अबसे वही कीजियेगा।

थोडा मुस्कुराते हुये राधिका ने कहा- अच्छा, और फिर तुम्हारे दोस्त.........

तुरंत राहुल ने कल पापा वाला वाक्य अक्षरशः दुहरा दिया- मुझे इस बात की कभी चिंता नहीं कि लोग क्या कहते हैं, हमे एक दूसरे की खुशी का ख्याल रखना चाहिये बस।

राधिका ने कस कर अपने बडे होते राहुल को हदय से लगा लिया, और अश्रुधारा को रोकने का असफल प्रयास करने लगी।

शनिवार, 18 सितंबर 2021

कौन जाने

 

दुआयें कब असर दिखायें, ये कौन जाने

कहर आहों का क्या ढाये, ये कौन जाने

रश्क करते हैं लोग, जिनके मुकद्दरों पर

दर्द कितने उनके दामन में, ये कौन जाने

झूम रही लौ अलमस्त, संग मस्त हवाओं के

उम्र चिराग की मगर कितनी, ये कौन जाने

वादा तो कर दिया उसने, साथ चलने का

वक्त ए राह क्या रंग दिखाये, ये कौन जाने

मुस्कुराते चेहरे अक्सर, हिजाब से ही लगे

जख्म कितने दफन दिल में, ये कौन जाने

दुश्मनों से भी मिला करिये जरा दोस्ती से

सांप आस्तीन से कब निकलें, ये कौन जाने

ख्वाब देख लो मगर, उसका चर्चा न करो

दिल कितने खाक हो जाय, ये कौन जाने

मोहब्बत कुछ नही, है जिंदगी का जुआ

मांझी पार लगाये या डुबाये,ये कौन जाने

ना डूब यूं, गमो फिक्र के सागर में पलाश

लहर कौन सी खुशी दे जाये, ये कौन जाने

शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

किसे पता

 


मंजिल अभी और दूर कितनी, किसे पता है

मिलेंगें राह में कांटें या कलियां, किसे पता है

फर्ज मुसाफिर का सिर्फ चलते चले जाना

मिले किसे मोड, हमसफर, किसे पता है

दिये जला दिये राह में, भूले भटकों के लिये

कितनी उम्र मगर चिराग की, किसे पता है

कसूर किस्मतों का या कमीं कोशिशों में

सिवा तेरे वजह शिकस्त की किसे पता है

दिखा रहा है खौफ, मासूमों मजलूमों को

खुद भी है वो डरा डरा मगर किसे पता है

ख्वामखाह घुलता आदम, फिक्रे जिंदगी में

होनी कब किस करवट बैठे, किसे पता है

बुलंदियों के खातिर ये खूनो खराबा कैसा

ढल जाये सूरज किस घडी, किसे पता है

पलाश करती नहीं भरोसा, बंद आंखों से

शक्लो सूरत जयचंद की भला किसे पता है

मंगलवार, 14 सितंबर 2021

कितनी आसानी से

 


कितनी आसानी से कह दिया उसने

आखिर क्या किया ,आपने मेरे लिए

जो भी किया,वो तो सब करते हैं

आज अगर मैं कुछ हूं

तो वो है परिणाम,

मेरी मेहनत का

मेरे पुरुषार्थ का

मेरे भाग्य का

या फिर मेरे पुण्य कर्मो का

मैं चुपचाप सुन रहा हूं

इसलिये नहीं कि नहीं कुछ भी

मेरे पास कहने को

नहीं चाहता मैं कोई

तर्क कुतर्क

नहीं चाहता मैं

बलपूर्वक बोना, भावनाओं के बीज

भावशून्य पथरीले रेगिस्तान में

मैं हूं धरा के अंत: स्थल में,बैठा बीज

बोलना मेरा धर्म है, ना ही स्वभाव

फिर चंचल शाखाओं को

समझाया भी तो नहीं जा सकता

हां समय अवश्य पढ़ा देता है

हर किसी को सच का पाठ

कल उस शाख पर भी 

खिलेंगें पुष्प, उगेंगें फल,

फिर जन्म लेगा बीज

फिर वो खो कर अपना अस्तित्व

जन्म देगा एक वृक्ष को |

इतनी ही आसानी से

चंचल, चपल शाखाओं द्वारा

फिर दोहराया जायेगा

यही प्रश्न

आखिर क्या किया,आपने मेरे लिए ?

शनिवार, 4 सितंबर 2021

मर्जी




मिस्टर बख्शी, क्या आप मुझे बतायेंगें कि मेरी मर्जी के बिना आपने आज १० बजे मीटिंग कैसे बुला ली?

बेचारे बख्शी जी  जो पिछले दो सालों से मिसेज माथुर के साथ से सह प्राध्यापक के रूप में काम कर रहे थे, नियत और धीरे स्वर में बस इतना ही कह सके मैडम, आप हमेशा ही १० बजे का समय ही मीटंग के लिये रखती हैं और कल शाम मैं आपसे मीटिंग का समय पूंछना भूल गया था, आगे से पूंछ लिया करूंगा।

मीटिंग मे कुछ मुद्दों पर बात चल ही रही थी कि चपरासी प्रधानाचार्या माथुर के कक्ष में सभी के लिये चाय ले कर आ गया।

मिसेज माथुर एक बार फिर असामान्य हुयी और मैथ्स के अध्यापक पांडे जी से बोली- पांडे जी सब अपनी मर्जी से ही करेंगें क्या?  टी क्लब की देखरेख का जिम्मा आपका है तो क्या आप ही तय करेंगें कि मीटिंग्स में क्या आएगा?

बेचारे पांडे जी का मुंह लटक गया, उन्हे समझ नही आया कि आज ऐसा क्या हुआ, हमेशा ही तो मीटिंग्स में चाय आती है।

बोले सॉरी मैडम, आइंदा से आपसे पूंछ कर ही मंगाई जायगी। आपके लिये कॉफी मंगाएं क्या?

मिसेज माथुर - नही रहने दीजिये, चलिये मिस्टर बासू बतायें आप क्या कह रहे थे।

आज कॉलेज में मीटिंग में देर हो गई थी, लंच भी नही हुआ था। घर आते ही रसोइये गिरधारी से बोलीं – बहुत भूख लगी है, जल्दी से चाय के साथ पकौडियां निकाल दो, मगर गिरधारी की रसोई में तो पोहा पहले से ही बन चुका था, दरअसल कल मिसेज माथुर ने ही आज शाम पोहा बनाने को कहा था। गिरधारी बोला- मैडम वो पोहा बनाया था आपने ……..। इससे पहले कि बेचारा गिरधारी अपनी पूरी बात कहता, मैडम झुंझलाते हुये बोली – तुमको भी अब अपनी ही मर्जी का करना है, तुम बताओगे मुझे कि मै क्या खाऊं, क्या नहीं, नही खाना मुझे पोहा, जाइये पकौडिया बनाइये जा कर।

गिरधारी चुपचाप रसोई में चला गया।

मिसेज माथुर ने सामने टेबल पर रखा पानी पिया और आंख बंद करके खुद से बोलने लगी- जानती हूं मिस्टर बख्शी जी, पांडे जी आप लोगो ने आज कुछ भी गलत नही किया, गिरधारी, मै जानती हूं कल मैने ही तुमको पोहा बनाने को बोला था, मगर क्या करूं कहां पूरी करूं अपनी मर्जी, किससे कहूं अपनी मर्जी, किसे समझाये कि उसे विछोह नही सुकून होता है जब जब उमेश लम्बे लंबे बिजीनेस टूर पर जाते हैं, किसको बताऊं कि हर रात रोता है मेरा मन जब मेरा अपना ही मेरी मर्जी को नहीं समझता, या समझ कर भी नासमझ बनते हुये, मेरे मन को मसल कर करता है पूरी सिर्फ अपनी मर्जी, कौन समझेगा कि समाज की ये सशक्त मिसेज माथुर जो बडी से बडे समस्या से नहीं हारतीं,  हार जातीं है हर रात अपने उस पति से जिसे समाज में लोग बहुत समझदार, केयरिंग, लविंग हसबैंड के रूप में जानते है, शायद हमारे इस समाज में कोई नही जो यह स्वीकर भी कर सके कि पति भी करते हैं कई कई बार अपनी पत्नी का शोषण, जो कभी भी नही पूंछते अपनी लविंग पत्नी से उसकी मर्जी।

तभी उसके मोबाइल पर एक नोटिफिकेशन की टोन बजी, अपने आपसे चल रहे वार्तालाप से बाहर आते हुये उन्होने मोबाइल उठाया और देखा, उनके पति ने उन्हे यह मैसेज भेजा था 


एक लंबी निराश उफ के साथ इस बार वो बिल्कुल निढाल सी सोफे पर लुढक गयीं और सोचने लगी – आखिर उमेश उसे क्या बताना चाहता है,  क्या  कल रात  के हुये वार्तालाप का ये पूर्णविराम है, या  हमेशा के लिये चुप रहने का सांकेतिक आदेश, 
क्या कभी कोई दिन ऐसा होगा, जब पत्नी की मर्जी को भी मान्यता मिलेगी, क्या कोई सरकार समझेगी, एक पत्नी की मर्जी, क्या कभी शामिल होगा अपना देश भी इन १०४ देशों की पंक्ति में या सिर्फ पुरुष को ही रहेगा अधिकार इस पत्नी नाम के खिलौने से अपनी मर्जी मुताबिक खेलने का……………..

मंगलवार, 31 अगस्त 2021

छुट्टी

 

ओ वसू, यार एक कप बढिया सी चाय पिला दो, आज ऑफिस में बहुत थक गया हूं। ऑफिस से साथ आई वसू फटाफट हाथ पैर धुल किचन में चाय चढा अभी ऊपर अपने कमरे की तरफ चेंज करने बढी ही थी कि आवाज आई- बहू कल से दो दिन नही आयगी तुलसी, कह रही थी उसके मामा की बिटिया की शादी है। बोझिल मन और थके तन से वो केवल इतना ही बोल पाई- अच्छा मां जी।

अभी सासू और सुनील को चाय का कप दे ही रही थी कि सुनील बोले क्या जी दो चार पकोडी छान लेती, बारिश के मौसम में पकौडी का अपना ही मजा है। अच्छा कहती हुयी वसू अपना चाय का कप ले  किचन की तरफ चल दी। वो जानती थी कि पकौडी का मतलब एक और चाय है, ये सोच उसने दूसरे चूल्हे पर दुबारा चाय चढा दी।

तभी कमरे से आवाज आई – बहू मै कह रही थी कि दो दिन के लिये तुम ऑफिस से छुट्टी ले लो,  मेरे से नहीं संभलेगी तुम्हारी ये रसोई वसोई, ये पोछा वोछा। इससे पहले कि मै कुछ कहती , सुनील मां की बात का समर्थन करते हुये बोले - अरे मां आप क्यों चिंता कर रहीं है, वसू ले लेगी ना छुट्टी, आप तो बस आराम से पक़ौडिया खाइये, अरे वसू बन गयी क्या .........

और किचन से पकौडियां लाती हुयी वसू सोचने लगी कि क्या वाकई अगले दो दिन उसकी छुट्टी है?

शनिवार, 28 अगस्त 2021

शूल को फूल बनाया जा सकता नहीं

 


बीते लम्हों को बुलाया जा सकता नहीं

डूबी कश्ती को बचाया जा सकता नहीं

 

भरम है मेरा वो याद अब ना आयेगा

वो एक खास भुलाया जा सकता नहीं

 

बेहर था ना जगाते  अरमान दिल में

जगी रैन को सुलाया जा सकता नहीं

 

मिलते है नसीबों से, फिक्र करने वाले

लकीरों को तो मिटाया जा सकता नहीं

 

कई लोग  दिखावों में ही खुश रहते है

इश्क सबको सिखाया जा सकता नहीं

 

असर खामोशी का जरा आजमां के देख

उसके लफ्जों को दबाया जा सकता नहीं

 

सीख जाते हैं परिंदे भी साथ रह रह कर

मगरूरो को कुछ बताया जा सकता नहीं

 

साथ रहते हैं गुल के, मगर पैर चीरते हैं

हां शूल को फूल बनाया जा सकता नहीं


यकीन आज भी मां की परवरिशों पर

सच्चे बंदे को झुकाया जा  सकता नहीं

 

क्यों करती हो पलाश इंतजार हर घडी

बुत में अहसास जगाया जा सकता नहीं

शुक्रवार, 27 अगस्त 2021

हमारी तरह

तू भी हमारी तरह

घिरा है अनगिनत तारों से

इनमें से कई हैं अंजाने

कुछ से हूं मै परिचित

मगर कोई एक है जो है

मेरे बहुत करीब 

मगर ये हाथ भर की दूरी

सदियों से अपनी जगह है

ना मैं छोड़ पा रही हूं, 

झूठा अभिमान

ना तुम भूल पा रहे हो, 

कड़वा अतीत

किन्तु टूटता भी नहीं

प्रेम का बन्धन

ना तुमने कोई और राह चुनी

ना मैं कहीं मुड़ कर गई

समय निरपेक्ष रूप से

करता रहा मूल्यांकन

हमारे भावों और स्वभावों का

और फिर कर दिया हमें, 

चेतन से जड़

अब चाह कर भी नहीं हो सकते

हम एक इकाई

बस चिरकाल तक

समय से बंधे, 

जड़त्व से बंधे

एक हाथ की इस दूरी से

निभाते जाना प्रेम 

तू भी हमारी तरह

गुरुवार, 26 अगस्त 2021

तोल के बोल



आज कक्षा में एक विद्यार्थी को डांटते हुये जब मैने ने कहा- कि तुम पढाई में बिल्कुल भी मन नही लगाते हो, तभी तुम्हारे अंक बिल्कुल भी अच्छे नहीं आते। खेल कूद के अलावा जरा पढाई पर भी ध्यान दो। तो वह नन्हा सा बच्चा मासूमियत से बोला- मैडम जी ये बिल्कुल भी क्या होता है? एक पल को तो मुझे बहुत गुस्सा आया, लगा जैसे मेरा मजाक बनाते हुये यह प्रश्न पूंछ रहा है, मगर दूसरे ही पल मेरे मन ने कहा- कौशल्या, जरा देख तो इसकी उम्र, क्या बहुत मुंकिन नही कि इस पांच् छः साल के बच्चे को वाकई इसका मतलब ना पता हो। 
तब हल्का सा मुस्कुराते हुये मैने कहा- रोहन जाओ तो अपना टिफ़िन ले कर आओ। 
रोहन जल्दी से अपनी सीट पर गया और टिफिन ला कर मुझे दे दिया। 
लंच का पीरियड इस क्लास के तुरंत बाद था। 
मैने रोहन का टिफिन खोलते हुये पूंछा- तुमने अभी कितना टिफिन खाया है?
रोहन को कुछ समझ नही आ रहा था कि उसकी टीचर ऐसा क्यों पूंछ रही हैं जबकि लंच तो इस क्लास के बाद होगा।
उसके चेहरे पर एक बडा सा प्रश्नवाचक तैर रहा था, उसी मनः स्थिति में उसने धीरे से कहा- मैडम जी, टिफिन तो लंच  पीरियड में खाता हूं ना, अभी तो मैने बिल्कुल भी नही खाया। 
मैने उसके सिर पर हाथ फेरते हुये कहा- हां रोहन जब किसी काम की हम शुरुआत ही नही करते, या कोई चीज़ होती ही नही है तब उसे कहते हैं बिल्कुल भी नही। 
ऐसा लगा जैसे रोहन इस बात को बहुत अच्छे से समझ गया हो, उसी भोलेपन से बोला- मैडम जी- तब तो आप बिल्कुल भी सही नहीं कह रहीं थी क्योकिं मै थोडा थोडा सा तो पढता हूं और थोडे थोडे से नंबर भी लाता हूं। 
तभी लंच की बेल बज गयी। रोहन मुझसे पूंछकर अपनी सीट पर जा कर टिफिन खोलने लगाऔर मै बिल्कुल भी नहीं का सही प्रयोग ढूंढते हुये क्लास से बाहर आ गयी। 

शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

पराया अपना

 


बडी अजीब सी कशकमश में हूं

कैसे बनता है कोई अपना किसी का

और कौन से मापदंड है जो

परिभाषित करते है किसी को पराया

क्या मै ये मान लूं कि रक्त की बूंद ही है

जो एक शरीर को दूसरे शरीर से

अपने शब्द के बंधन में जोड देती है

फिर वो अदॄश्य सी बूंद किस चीज की है

जो मन पर गिरती है, और पिघलकर

जुड जाते है दो  पराये मन

क्या तब भी विलुप्त नही होती

परायेपन की दीवार

आखिर क्यों होता है ऐसा

कि जिसे मन अपने के रूप में करता है स्वीकार

समाज उसे पराये की संज्ञा देता है

और कई कई बार उम्र के अंतिम छोर तक

तन बंधा तो रहता है अपने शब्द की डोर से

मगर अंतर्मन हर पल उसे पराये से ही

करता रहता है संबोधित

काश किसी दिन कही से कोई आकर

बता जाये कोई ऐसा विकल्प

जिससे बन सकूं किसी का संपूर्ण अपना

या संपूर्ण पराया

कि ये आधे अपने आधे पराये

के बीच खोता झूलता

थकता जा रहा है मन

और मेरा स्वयं का अपना मन ही

होता जा रहा है मुझसे पराया

गुरुवार, 12 अगस्त 2021

बवाल हो जायेगा

रही खामोश तो सवाल हो जायेगा

कही जो बात तो बवाल हो जायेगा

आंख नम हो तो छुपा लेना चश्मे में

दिखीं उदास, तो बवाल हो जायेगा

बात दिल की पन्नो पे उतारिये ना

पढेगें अपने तो बवाल हो जायेगा

पलट के सोच ना अब बीती बातों को

ख्वाब फिर लिपटे तो बवाल हो जायगा

जो भी सामने है, बस वही मंजिल तेरी

काश की आस में ,बवाल हो जायेगा

तकदीर के रास्ते, तेरी हथेली में पलाश

पकड मेहनत की बांहे, बवाल हो जायेगा

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

हाँ याद तेरी आती बडी

 हर बात नहीं तुमको बताते हैं बाबू जी,

छुपाते हैं बाबू जी, पर याद तेरी आती बडी

हर जिद मेरी, खुशी खुशी, पूरी करीं तुमने

सपने मेरे अपने किये जो देखे थे मैनें

अब किससे करे जिद ये बताओ ना बाबू जी, समझाओ न बाबू जी

हाँ याद तेरी आती बडी

हर बात नहीं तुमको बताते हैं बाबू जी,

छुपाते हैं बाबू जी, पर याद तेरी आती बडी

कहते तो थे, बिटिया नहीं बेटा हूं मै तेरा

रौनक हूं तेरे घर की औ टुकडा हूं मै तेरा

फिर क्यूं तेरे आंगन नही रह पाई बाबू जी, बतलाओ ना बाबू जी

हाँ याद तेरी आती बडी

हर बात नहीं तुमको बताते हैं बाबू जी,

छुपाते हैं बाबू जी, पर याद तेरी आती बडी


जब रोये कभी झूठ- मूठ, तुमने मनाया

गोदी में बिठाकर, मुझे लड्डू भी खिलाया

है कौन तेरे जैसा दुनिया में बाबू जी, दिखलाओ ना बाबू जी

हाँ याद तेरी आती बडी

हर बात नहीं तुमको बताते हैं बाबू जी,

छुपाते हैं बाबू जी, पर याद तेरी आती बडी


जन्मी तुम्हारे घर में, रही फिर भी पराई

ससुराल में भी मन की कभी कर नही पाई

आखिर कहाँ अधिकार जताऊं मै बाबू जी, बतलाओ ना बाबू जी

हाँ याद तेरी आती बडी

हर बात नहीं तुमको बताते हैं बाबू जी,

छुपाते हैं बाबू जी, पर याद तेरी आती बडी
* चित्रों के लिये गूगल का आभार

रविवार, 28 मार्च 2021

अबके होली


अबके होली, ना रंग लगाना

ना टोली बनाना

ये मौसम करोना का है-२

श्याम दूर से ही फाग गाना,

ना मौज मनाना

ये मौसम करोना का है-२

राधे ,मनवा तो माने नही है

हां तोरी बतिया सही है

ये मौसम करोना का है-२

कान्हा पीना नही तुम भंग

ना कीजो हुडदंग

ले ग्वालों को संग

ना पड जाय रंग में भंग

गिरधारी ओ गिरधारी ना यमुना में जाना

ना गोपी बुलाना

ये मौसम करोना का है-२

राधे, मनवा तो माने नही है

हां तोरी बतिया सही है

ये मौसम करोना का है-२

कान्हा दिल में करो ना मलाल

अरे अगले साल

मचेगा धमाल

उडेगा फिर सतरंगी गुलाल

बनवारी, ओ बनवारी जरा घर तो आना

है टीका लगाना

कि मौसम करोना का है-२

राधे, मनवा तो माने नही है

मगर बतिया सही है

ये मौसम करोना का है-२

अबके होली, ना रंग लगाना

ना टोली बनाना

ये मौसम करोना का है-२

बुधवार, 24 मार्च 2021

बात

 


बाते, खिला सकती है, मुरझाई बगिया

बाते दे देती कभी न भरने वाला घाव

सुनी थी माँ से बचपन में एक कहावत

बातन हाथी पाइये, या बातन हाथी पाव

बात का बन भी सकता है बडा बतंगड

बात बात में बन भी जाती उलझी बात

बातों ही बातों में अक्सर जुड जाते दिल

जब बात-बात में बन जाती किसी से बात

हाँ बात के नही होते यूं तो सिर या पैर

मगर निकलती तो दूर तलक जाती बात

कहती पलाश सबसे सौ बात की इक बात

सोच समझ कर सदा कहो किसी से बात

सोमवार, 22 मार्च 2021

नही फायदा यहां समझाने का



अब वक्त नहीं मिलता

लोगों को मिलने मिलाने का

जाने कहां रिवाज गया

हाल पूछने को घर आने का

हो जाती हैं मुलाकातें,

हाथ मिलते हैं गले 

जाने खोया कहां अदब

चाय पर घर बुलाने का

उलझाना सुलझी लटों को

उतारना अरमान पन्नों पर

काश दौर वो लौट आए

तकियों में ख़त छुपाने का

आती नही खुशबू खानों की

अब पडोस के रसोईखानों से

दावतों का बदला चलन, गया

मौसम बिठाकर खिलाने का

अदबो लिहाज पिछडेपन की

निशानियां हुयी हैं जब से

दुआ सलाम गुमनाम हुये

हाय बाय से काम चलाने का

पलभर में गहरा इश्क हुआ

पल में ताल्लुक खत्म हुये

पल में फिर दिल लगा कही

है वक्त नही अश्क बहाने का

सच में आधुनिक हुये है या

जा रहें अंधेरी गर्त में सब

जी पलाश तू अपने लहजे से

नही फायदा यहां समझाने का 

GreenEarth