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मंगलवार, 22 मार्च 2022

कुछ गुलाब कुछ कांटे

जाने क्यूं जलते लोग,बुलंदियों के आ जाने पर

बदल जाते क्यूं रिश्तें, गुरबत के आ जाने पर


हटे नकाब अनदिखे, उजले चमके चेहरों से

खुल गई सभी बनावटें, तूफां के आ जाने पर


अरसा हुआ देखे उन्हें, जो रोज मिलने आते थे

दिखे नहीं दिया भी तो, अंधेरों के  छा जाने पर


घर से आंगन खत्म हुये, बैठकें खत्म दुआरों से

मिलना-जुलना खत्म हुआ,मोबाइल के आने पर


इतराते हैं वो तो इसमें, नहीं ख़ता ज़रा उनकी

नजाकत आ ही जाती है, हुश्न के आ जाने पर


दौर वो खोया जब मेहमां, हफ्तों हफ्तों रहते थे

दिन गिनते हैं अपने ही, अपनों के आ जाने पर


सोने चांदी गहनों की, चाहत मां कब रखती है 

खिल जाती है बच्चों सी, बच्चों के आ जाने पर


अभी तलक वो मेरा है, क्यूं कि वो मेरे जैसा है 

जाने पलाश क्या होगा शोहरत के आ जाने पर

मंगलवार, 15 मार्च 2022

अर्धविराम



जब तक है श्वासें इस तन में

मै पूर्णविराम नहीं लगाऊंगा

जीवन की हर इक घटना को 

मै अर्धविराम ही बतलाऊंगा


इस जग में किसे अभाव नहीं

किंतु रुकना मेरा स्वभाव नहीं

प्राण यात्रा के प्रत्येक लक्ष्य को

मै अर्धविराम ही बतलाऊंगा

जब तक है श्वासें इस तन में

मै पूर्णविराम नहीं लगाऊंगा


भिक्षुक बन क्षण कभी आता

कभी दाता रूप में दे जाता 

जीवन की रिक्तता पूर्णता को 

मै अर्धविराम ही बतलाऊंगा

जब तक है श्वासें इस तन में

मै पूर्णविराम नहीं लगाऊंगा


सफलता की कोई माप नहीं

असफलता खाली हाथ नहीं

सुखदुख के क्षणभंगुर क्षण को 

मै अर्धविराम ही बतलाऊंगा

जब तक है श्वासें इस तन में

मै पूर्णविराम नहीं लगाऊंगा

शुक्रवार, 11 मार्च 2022

गिर जाना होता हार नही

 


निशा घनी जितनी होगी

भोर धनी उतनी होगी

काले बादल छाये तो क्या

बारिश भी रिमझिम होगी

 

गिर जाना होता हार नही

क्यूं नियति स्वीकार नहीं

है प्रयास तुम्हारे हाथों में

क्यों भुज का विश्वास नहीं

 

ह्र्दय का मत यूं संताप बढा

बन जरा सत्य में लिखा पढा 

अब झांक जरा अंतर्मन मे

औरों के माथ ना दोष चढा

 

हर मार्ग बंद जब होता है

साहस भी साहस  खोता है

वह पल होता है परीक्षा का

तब कर्म ही कारक होता है

 

तो चल समेट ले बल अनंत

सोये सामर्थ्य को जगा तुरंत

है धरा तेरी, यह नभ भी तेरा

कर स्वयं अपने विषाद अंत

 

 

रविवार, 20 फ़रवरी 2022

तूफानों में पलते पलते



दो से देखो वो एक हो गये, चलते चलते

राही अंजान हमसफर हुये, चलते चलते


मौसम तो आये कई मुश्किलों के मगर

कोयले से खरा कुंदन हुये जलते जलते


बडी आजमाइशे की मुकद्दर ने तो क्या

मंजिले पा ही गये शाम के ढलते ढलते


फासले मिटाने को हंसके गले मिलते रहे

आखिर दुश्मन थक ही गये छलते छलते


फंदे पाबंदियों के छुडा, छू लिया आसमां

और रह गये लोग बस हाथ  मलते मलते


क्या डराते हो तुम आंधियों के मिजाजों से

चलना सीखा हमने तूफानों में पलते पलते


जो भी है दिल में पलाश आज ही कह दो

बात बन जाती है फ़साना यूं टलते टलते

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