प्रशंसक

#life लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
#life लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 31 दिसंबर 2023

प्रेम और जीवन

 


जब रातों में चुपके से सिरहाने आकर

महबूब ना फेरे बालों में उगलियां

जब प्रियतम ना पढ सकें वो आंखें,

जिनमें बसा हुआ है वह स्वयं

जब ना महसूस हो उसके दूर जाने की

दिल को घडी घडी टीस

जब कहने के लिये, मन की बात

खुद से ही कई कई बार करनी पडे बात

जब तुम्हारे होने के मायने

खत्म हो जाये उसके लिये,

जिसे माना हो तुमने सबकुछ

समझ लेना उस रोज

मर चुका है प्रेम

और प्रेम कभी अकेले नहीं मरता

मरता है उसके साथ

आत्मबल

आत्मविश्वास

मर जाती है चाहत

मर जाते हैं सपने

हां जो जीता है वो होता है

यह मिट्टी का शरीर

वो शरीर जो बस मैदान हैं

जिसमें खेल रहीं हैं सांसें

खेल – बस आने जाने का

शनिवार, 18 सितंबर 2021

कौन जाने

 

दुआयें कब असर दिखायें, ये कौन जाने

कहर आहों का क्या ढाये, ये कौन जाने

रश्क करते हैं लोग, जिनके मुकद्दरों पर

दर्द कितने उनके दामन में, ये कौन जाने

झूम रही लौ अलमस्त, संग मस्त हवाओं के

उम्र चिराग की मगर कितनी, ये कौन जाने

वादा तो कर दिया उसने, साथ चलने का

वक्त ए राह क्या रंग दिखाये, ये कौन जाने

मुस्कुराते चेहरे अक्सर, हिजाब से ही लगे

जख्म कितने दफन दिल में, ये कौन जाने

दुश्मनों से भी मिला करिये जरा दोस्ती से

सांप आस्तीन से कब निकलें, ये कौन जाने

ख्वाब देख लो मगर, उसका चर्चा न करो

दिल कितने खाक हो जाय, ये कौन जाने

मोहब्बत कुछ नही, है जिंदगी का जुआ

मांझी पार लगाये या डुबाये,ये कौन जाने

ना डूब यूं, गमो फिक्र के सागर में पलाश

लहर कौन सी खुशी दे जाये, ये कौन जाने

शनिवार, 20 मार्च 2021

बना दिया

मस्त निगाहों ने दिल, मस्ताना बना दिया

हमें साकी औ खुद को मैखाना बना दिया  

वो दूर का चांद सही, दूसरा जहान सही

उसे पाने को जीने का, बहाना बना दिया

 ढली उम्र तो, कई रिश्ते नाते भी ढल गये

हमें किताब से, अखबार पुराना बना दिया

 ज़रा सा क्या दूर गये, उनके शहर से हम

अंजान को अपना, हमें बेगाना बना दिया

 जल रहा था रेत सा, ये दिल इश्क़ के बगैर

उनकी दस्तक ने समां, सुहाना बना दिया

 ये बचपन का हुनर है, या मासूमियत उसकी

टूटे हुए डिब्बों को मंहगा, ख़ज़ाना बना दिया

 हमने यूं ही मजाक में, कुछ उनसे कह दिया

ज़रा सी बात का लोगों ने फ़साना बना दिया

 दिले मासूम बेखबर था, तबियत ए मोहब्बत से

हकीम ए इश्क़ ने पलाश को दीवाना बना दिया

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

चंद रुमानी एहसास

 


तेरे इश्क पर हम ऐतबार करते हैं

कहें ना कहें तुमसे प्यार करते हैं

मौसम कोई हो, चलेगें साथ तेरे

मूंद आंखें अभी इकरार करते हैं

वो पल जिसमें तुम शामिल नहीं

ऐसी जिन्दगी से इनकार करते हैं

मिले तुमसे जब भी आये जहाँ में

खुदा से ये दुआ हर बार करते हैं

मेरे झगडों से ना दिल इतना दुखा

यूं ही झूठ-मूठ की तकरार करते हैं

रूह पलाश की बसती जिस्म में तेरे

ऐलान आज ये सरे बाजार करते हैं

मंगलवार, 7 जुलाई 2020

गजल अहसासों की - पहली कडी


चांद की तरह वो अक्सर, बदल जाते हैं।
मतलब अली काम होते निकल जाते हैं॥

स्वाद रिश्तों का कडवा, कहीं हो जाय ना
छोटे मोटे से कंकड, यूं ही निगल जाते है

शौक तिललियों का हमने पाला ही नहीं
बस दुआ सलाम करके निकल जाते हैं

हौसले की पतवार हों, हाथों में जिनके।
तूफानों में भी वो लोग, संभल जाते है॥

वो बिछाते है जाल, दिलकश अदाओं से।
जानते है अच्छे अच्छे, फिसल जाते हैं॥

व्यापार चौराहों पर, बच्चों से ये सोचकर।
मासूमों से सख्तदिल भी, पिघल जाते हैं॥

बारिश की बूंदो में छिपी, बचपन की रवानी।
संग बच्चों के जवांदिल भी, मचल जाते हैं॥

शोर बर्तनों का सुनें, हमारे अडोसी पडोसी।
उससे पहले थोडा मकां से, टहल जाते हैं॥

सोच लो तुम पलाश, सच लिखने से पहले।
बडीं बेरहमी से लोग कलम, कुचल जाते हैं॥

गुरुवार, 25 जून 2020

जाने दो




कह दो जो मन में तेरे, नदियों को बह जाने दो
मत रोक उसे जो जाता है, जो आता है आने दो

दो चार दिनों का मेला है, रुकना है निकलना है
तोडो रस्मों की जंजीरे, उजले कल को आने दो

छोटी छोटी सी बातों में, उलझों ना दुनियादारी में
कदम बढा जग जीतो, जो खोया खो जाने दो

खुशी और गम दोनों में, मेहमां बनकर आते
मत रोको इन अश्कों को, जो बहते है बह जाने दो

उगते सूरज संग दुनिया, डूबे के अपने बेगाने
चलता जा तू मस्ती में, जो जलता है जल जाने दो

क्या कहा, क्यूं कहा, इस हिसाब में भला क्या रखा
भूलों कडवे किस्सो कों, वापसी के कुछ बहाने दो

जीवन इक झूठी माया, मरने से कैसा घबराना है 
क्यूं डर डरकर यूं जीते हो, जो होता है हो जाने दो

मन चाहा न मिले अगर, समझ मर्जी खुदाया की
परेशां क्या होना पलाश, रौशन सुबहों को जाने दो

शनिवार, 20 जून 2020

मन्नत के धागे



पहन लेती वो खामोशी, जब नाशाद होती है।
तहजीबें हार जातीं, जब हया बर्बाद होती है॥

देखे इन आंखों ने, सरहदों जमीं के बटवारें।
हर खबरो बवालों की, इक मियाद होती है॥

चढा कितनीं ही चादर, बांध मन्नत के धागे।
कहाँ कबूल हर छोटी बडी, फरियाद होती है॥

घडी दो घडी भर के, ये मातम, और मलालें।
उमर भर किसी की कब, कही याद होती है॥

उजड जायें तूफानों में, बस्तियां तो क्या।
हौसलों की मिट्टी से, वो फिर आबाद होती है॥

ये सितम तेरा, मेरे जिस्म तक मुमकिन।
रूह तो जुल्म ए जहाँ से, आजाद होती है॥

रहे इकबाल, गालिब तो, फाका परस्ती में।
यहाँ अबस से शेरों पर, ढेरों दाद होती है॥

इनायत खुदा की, मिलना रहनुमाया का।
रहमतों से पलाश, इख्लास ईशाद होती है॥

दाद - प्रशंसा          नाशाद - निस्र्त्साह
ईशाद - पथपर्दशन     असब- तुच्छ
इख्लास - सच्ची 

सोमवार, 15 जून 2020

मालूम नही


दिन इक और जिया या गुजरा, मालूम नही
खुद से खुश हूं या खफा खफा, मालूम नही

सांसे घडी घडी देतीं, गवाही जिन्दगी की
कितना जिंदा हूँ कितना मरा, मालूम नही

खरीदी फकीर से कुछ दुआएं, हमने भी
हुआ सौदे में घाटा या नफा, मालूम नहीं

छोड पायल उसने, पैरों में घुंघरू पहने
महज शौक है या इक़्तिज़ा, मालूम नहीं

चल तो रहा बाजार में, बहुत जोर शोर से
ये खोटा सिक्का है या खरा, मालूम नहीं

मासूम निगाहों पर, यूं सब कुछ न लुटा
उसने किस किसको है ठगा, मालूम नहीं

कर लिया कुबूल खुशी से, जो भी मिला
रहमत-ए-खुदा है या सजा, मालूम नहीं

नज्में तो उसकी, बहुत पाकीजा लगी
तहखाने दिल में क्या दबा, मालूम नहीं

इलाजे क़ल्ब को बेकरार, है पलाश मगर
हकीमे इलाही को रोग क्या, मालूम नही

क़ल्ब - दिल

इक़्तिज़ा - मजबूरी
इलाही - खुदा

शनिवार, 13 जून 2020

छोड़ भी दे



डॉ.रूप चन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी का हार्दिक आभार, जिन्होने यह गजल पढने के बाद मेरे ब्लाग पर न केवल टिप्पणी के माध्यम से मुझे सुधार बताये बल्कि मेरे अनुरोध पर उन्होने गलज लिखने की मूल्यवान जानकारी भी साझा की। चाचा जी, मेरा मार्गदर्शन करने हेतु आपको मेरा प्रणाम और धन्यवाद। 



चाह आसरों की रखना छोड़ भी दे
सूखे शाखों से लिपटना छोड़ भी दे 

खुश रखना खुद को तेरी जिम्मेदारी
ये रोना धोना सिसकना छोड़ भी दे

चांद का झूला महज किताबी कहानी
जज़्बातों में बहके रहना छोड़ भी दे

होते नहीं ख्वाब ख्यालों से मुकम्मल
लकीरें ताबीजें आजमाना छोड़ भी दे

बेमतलब के रिश्ते हुए गुजरा जमाना
बेमकसद घुलना मिलना छोड़ भी दे

दो पल भी दुनिया नहीं याद करेंगी
तू ख्वाइशें दफन करना छोड़ भी दे

नकाबपोशी का चलन है जोरों पर
खामख्वाह चेहरे पढ़ना छोड़ भी दे

झुकती है दुनिया शोहरतों से पलाश
अब पत्थर नींव का बनना छोड़ भी दे

बुधवार, 10 जून 2020

हमेशा अच्छा नही लगता



हर चीज जगह पर होना, हमेशा अच्छा नही लगता
सलीकों में जिन्दगी जीना, हमेशा अच्छा नही लगता

कुछ आवारगी है जरूरी, मस्ती से जीने के लिये
अदबों लिहाज से रहना, हमेशा अच्छा नही लगता

कट कर तो गिरे पतंगें, किसी अजनबी की अटारी
उड के चूमना आसमान, हमेशा अच्छा नही लगता

हों थोडी सी लापरवाहियां, हों हिदायतें बुजुर्गों की
सधे कदमों से चलना, हमेशा अच्छा नही लगता

ओढ़ लो कभी यूं ही, बचपन की नासमझी
अकल का पैरहन, हमेशा अच्छा नहीं लगता

कुछ कच्चा पक्का बने, खाये कुछ मीठे से उलाहनें
उम्दा तारीफों का तडका, हमेशा अच्छा नही लगता

इन्तजार में महबूब, जरा पलकें तो बिछायें
वक्त पर पहुचना, हमेशा अच्छा नही लगता

कुछ नाराजगी भी हैं जरूरी मोहब्बत के लिये
हर बात मान जाना, हमेशा अच्छा नही लगता

सोमवार, 18 मई 2020

लोग

जग सारा इक मंजर पर, एक खौंफ है आंखों में
फिर भी मन मैले देखे, हमने लोगों की बातों में

कौन रहेगा कौन बचेगा, सवाल खड़ा दरवाजों में
फिर भी दिल छोटे देखे, हमने लोगों की बातों में

अखबारों के सारे काॅलम, लहू चीख से सने मिले
फिर भी झगड़े होते देखे, हमने लोगों की बातों में

सन्नाटा गहरा पसरा गया, गली मोहल्ले शहरों में
फिर भी डर लूटों के देखे, हमने लोगों की बातों में

भटक रहा कोई दर दर, सिसक रहा कोई सड़कों में
फिर भी चर्चे खोखले देखे, हमने लोगों की बातों में

कुदरत ने तो एक कर दिया, मुल्कों को, इंसानों को
फिर भी भेद पनपते देखे, हमने लोगों की बातों में
GreenEarth