जब रातों में चुपके से सिरहाने आकर
महबूब ना फेरे
बालों में उगलियां
जब प्रियतम
ना पढ सकें वो आंखें,
जिनमें बसा
हुआ है वह स्वयं
जब ना महसूस
हो उसके दूर जाने की
दिल को घडी
घडी टीस
जब कहने के
लिये, मन की बात
खुद से ही कई
कई बार करनी पडे बात
जब तुम्हारे
होने के मायने
खत्म हो जाये
उसके लिये,
जिसे माना हो
तुमने सबकुछ
समझ लेना उस
रोज
मर चुका है
प्रेम
और प्रेम कभी
अकेले नहीं मरता
मरता है उसके
साथ
आत्मबल
आत्मविश्वास
मर जाती है
चाहत
मर जाते हैं
सपने
हां जो जीता
है वो होता है
यह मिट्टी का
शरीर
वो शरीर जो
बस मैदान हैं
जिसमें खेल
रहीं हैं सांसें
खेल – बस आने
जाने का









