प्रशंसक

सोमवार, 18 मई 2020

लोग

जग सारा इक मंजर पर, एक खौंफ है आंखों में
फिर भी मन मैले देखे, हमने लोगों की बातों में

कौन रहेगा कौन बचेगा, सवाल खड़ा दरवाजों में
फिर भी दिल छोटे देखे, हमने लोगों की बातों में

अखबारों के सारे काॅलम, लहू चीख से सने मिले
फिर भी झगड़े होते देखे, हमने लोगों की बातों में

सन्नाटा गहरा पसरा गया, गली मोहल्ले शहरों में
फिर भी डर लूटों के देखे, हमने लोगों की बातों में

भटक रहा कोई दर दर, सिसक रहा कोई सड़कों में
फिर भी चर्चे खोखले देखे, हमने लोगों की बातों में

कुदरत ने तो एक कर दिया, मुल्कों को, इंसानों को
फिर भी भेद पनपते देखे, हमने लोगों की बातों में

9 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १९ मई २०२० के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 19 मई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (20-05-2020) को "फिर होगा मौसम ख़ुशगवार इंतज़ार करना "     (चर्चा अंक-3707)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --   
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

    जवाब देंहटाएं
  4. कुदरत ने तो एक कर दिया, मुल्कों को, इंसानों को
    फिर भी भेद पनपते देखे, हमने लोगों की बातों में
    वाह!!!
    बहुत खूब...।

    जवाब देंहटाएं
  5. अखबारों के सारे काॅलम, लहू चीख से सने मिले
    फिर भी झगड़े होते देखे, हमने लोगों की बातों में

    सन्नाटा गहरा पसरा गया, गली मोहल्ले शहरों में
    फिर भी डर लूटों के देखे, हमने लोगों की बातों में... बहुत खूबसूरत ल‍िखा

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत ही सुंदर :( मन को छूती अभिव्‍यक्ति

    जवाब देंहटाएं

आपकी राय , आपके विचार अनमोल हैं
और लेखन को सुधारने के लिये आवश्यक

GreenEarth