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मंगलवार, 12 मई 2020

अजेय आस

घिर सकता, घनघोर तिमिर, 
निष्फल हो सकता प्रयास
डिग सकता, अडिग संयम, 
पर उम्मीदें खत्म नहीं होती

ना समय कभी कोई ठहरा, 
ना विजयी होता अंधियारा
ना संकट कोई अमिट रहा, 
ना साहस किसी काल हारा
हिल सकता, दृढ़ धीरज, 
पर दृढ़ता खत्म नहीं होती
डिग सकता, मन का संयम, 
पर उम्मीदें खत्म नहीं होती

बना नहीं वो आकाश जहां, 
ना पहुंच सकेगा उजियारा
धरा का ना कोई छोर जहां, 
बह सकती नहीं सर धारा
थक सकता, दुर्बल बदन, 
पर क्षमता खत्म नहीं होती
डिग सकता, मन का संयम, 
पर उम्मीदें खत्म नहीं होती

है जब तक जीवित मानवता, 
पृथ्वी जननी कहलायेगी
होगी परास्त विपदा समस्त, 
प्रकृति जयघोष सुनायेगी
गिर सकता, झड़ में वरक, 
पर टहनी खत्म नहीं होती
डिग सकता, मन का संयम, 
पर उम्मीदें खत्म नहीं होती

*वरक - पत्ता, झड़ -पतझड़, सर- जल

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 14.5.2020 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3701 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।

    धन्यवाद

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  2. बहुत सुंदर नव गीत।
    सार्थक सृजन।

    जवाब देंहटाएं
  3. है जब तक जीवित मानवता,
    पृथ्वी जननी कहलायेगी
    होगी परास्त विपदा समस्त,
    प्रकृति जयघोष सुनायेगी
    गिर सकता, झड़ में वरक,
    पर टहनी खत्म नहीं होती
    डिग सकता, मन का संयम,
    पर उम्मीदें खत्म नहीं होती... बहुत ही सुंदर सृजन 👌

    जवाब देंहटाएं
  4. पर टहनी खत्म नहीं होती
    डिग सकता, मन का संयम,
    पर उम्मीदें खत्म नहीं होती...वाह बेहतरीन बहुत ही सुंदर सृजन 👌

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