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रविवार, 31 दिसंबर 2023

प्रेम और जीवन

 


जब रातों में चुपके से सिरहाने आकर

महबूब ना फेरे बालों में उगलियां

जब प्रियतम ना पढ सकें वो आंखें,

जिनमें बसा हुआ है वह स्वयं

जब ना महसूस हो उसके दूर जाने की

दिल को घडी घडी टीस

जब कहने के लिये, मन की बात

खुद से ही कई कई बार करनी पडे बात

जब तुम्हारे होने के मायने

खत्म हो जाये उसके लिये,

जिसे माना हो तुमने सबकुछ

समझ लेना उस रोज

मर चुका है प्रेम

और प्रेम कभी अकेले नहीं मरता

मरता है उसके साथ

आत्मबल

आत्मविश्वास

मर जाती है चाहत

मर जाते हैं सपने

हां जो जीता है वो होता है

यह मिट्टी का शरीर

वो शरीर जो बस मैदान हैं

जिसमें खेल रहीं हैं सांसें

खेल – बस आने जाने का

शनिवार, 20 मार्च 2021

बना दिया

मस्त निगाहों ने दिल, मस्ताना बना दिया

हमें साकी औ खुद को मैखाना बना दिया  

वो दूर का चांद सही, दूसरा जहान सही

उसे पाने को जीने का, बहाना बना दिया

 ढली उम्र तो, कई रिश्ते नाते भी ढल गये

हमें किताब से, अखबार पुराना बना दिया

 ज़रा सा क्या दूर गये, उनके शहर से हम

अंजान को अपना, हमें बेगाना बना दिया

 जल रहा था रेत सा, ये दिल इश्क़ के बगैर

उनकी दस्तक ने समां, सुहाना बना दिया

 ये बचपन का हुनर है, या मासूमियत उसकी

टूटे हुए डिब्बों को मंहगा, ख़ज़ाना बना दिया

 हमने यूं ही मजाक में, कुछ उनसे कह दिया

ज़रा सी बात का लोगों ने फ़साना बना दिया

 दिले मासूम बेखबर था, तबियत ए मोहब्बत से

हकीम ए इश्क़ ने पलाश को दीवाना बना दिया

सोमवार, 15 मार्च 2021

रात भर

 


क्या जगाकर हमें वो, सो सकेगा रात भर

शमा बुझ गई अंधेरा अब, जगेगा रात भर

कर सका ना हौसल वो, कहने का हाले दिल

महफ़िल में ख्वाबों की अब, कहेगा रात भर

करी कोशिशें मना सका ना, रुठे सनम को

कदम भर की जुदाई ये दिल, सहेगा रात भर

मसरूफ हो किसी तरह, ये दिन गुजरा है

तनहाइयों का बिच्छू अब, डसेगा रात भर

क्यूं न एतबार किया दिलबर की बात का

अफसोस औ मलाल दिल करेगा रात भर

हर बात पहली मुलाकात की, याद आयेगी

सुबह की बाट देखता, अब रहेगा रात भर

 मगरूर हो, ना रोका जरा, जाते पलाश को

खत ना जाने कितने अब, लिखेगा रात भर


रविवार, 14 मार्च 2021

इक बार फिर

 


तुम नहीं आये लो, इक बार फिर

रही कसम अधूरी, इक बार फिर

सुन लेंगें कोई, नई मजबूरी तेरी

समझा लेंगें दिल, इक बार फिर

खुशियां ही दो तुम, जरूरी नहीं

थोडा सिसक लेंगें, इक बार फिर

की कोशिशें कई, न करें शिकायतें

कर बैठे शिकवे मगर, इक बार फिर

तेरी छुअन का जादू चला हम पर

खिल के फूल हुये, इक बार फिर

सोचकर बैठे थे, ना मानेगी पलाश

तेरी बातों में उलझे, इक बार फिर

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

चंद रुमानी एहसास

 


तेरे इश्क पर हम ऐतबार करते हैं

कहें ना कहें तुमसे प्यार करते हैं

मौसम कोई हो, चलेगें साथ तेरे

मूंद आंखें अभी इकरार करते हैं

वो पल जिसमें तुम शामिल नहीं

ऐसी जिन्दगी से इनकार करते हैं

मिले तुमसे जब भी आये जहाँ में

खुदा से ये दुआ हर बार करते हैं

मेरे झगडों से ना दिल इतना दुखा

यूं ही झूठ-मूठ की तकरार करते हैं

रूह पलाश की बसती जिस्म में तेरे

ऐलान आज ये सरे बाजार करते हैं

मंगलवार, 7 जुलाई 2020

गजल अहसासों की - पहली कडी


चांद की तरह वो अक्सर, बदल जाते हैं।
मतलब अली काम होते निकल जाते हैं॥

स्वाद रिश्तों का कडवा, कहीं हो जाय ना
छोटे मोटे से कंकड, यूं ही निगल जाते है

शौक तिललियों का हमने पाला ही नहीं
बस दुआ सलाम करके निकल जाते हैं

हौसले की पतवार हों, हाथों में जिनके।
तूफानों में भी वो लोग, संभल जाते है॥

वो बिछाते है जाल, दिलकश अदाओं से।
जानते है अच्छे अच्छे, फिसल जाते हैं॥

व्यापार चौराहों पर, बच्चों से ये सोचकर।
मासूमों से सख्तदिल भी, पिघल जाते हैं॥

बारिश की बूंदो में छिपी, बचपन की रवानी।
संग बच्चों के जवांदिल भी, मचल जाते हैं॥

शोर बर्तनों का सुनें, हमारे अडोसी पडोसी।
उससे पहले थोडा मकां से, टहल जाते हैं॥

सोच लो तुम पलाश, सच लिखने से पहले।
बडीं बेरहमी से लोग कलम, कुचल जाते हैं॥

सोमवार, 15 जून 2020

मालूम नही


दिन इक और जिया या गुजरा, मालूम नही
खुद से खुश हूं या खफा खफा, मालूम नही

सांसे घडी घडी देतीं, गवाही जिन्दगी की
कितना जिंदा हूँ कितना मरा, मालूम नही

खरीदी फकीर से कुछ दुआएं, हमने भी
हुआ सौदे में घाटा या नफा, मालूम नहीं

छोड पायल उसने, पैरों में घुंघरू पहने
महज शौक है या इक़्तिज़ा, मालूम नहीं

चल तो रहा बाजार में, बहुत जोर शोर से
ये खोटा सिक्का है या खरा, मालूम नहीं

मासूम निगाहों पर, यूं सब कुछ न लुटा
उसने किस किसको है ठगा, मालूम नहीं

कर लिया कुबूल खुशी से, जो भी मिला
रहमत-ए-खुदा है या सजा, मालूम नहीं

नज्में तो उसकी, बहुत पाकीजा लगी
तहखाने दिल में क्या दबा, मालूम नहीं

इलाजे क़ल्ब को बेकरार, है पलाश मगर
हकीमे इलाही को रोग क्या, मालूम नही

क़ल्ब - दिल

इक़्तिज़ा - मजबूरी
इलाही - खुदा

बुधवार, 10 जून 2020

हमेशा अच्छा नही लगता



हर चीज जगह पर होना, हमेशा अच्छा नही लगता
सलीकों में जिन्दगी जीना, हमेशा अच्छा नही लगता

कुछ आवारगी है जरूरी, मस्ती से जीने के लिये
अदबों लिहाज से रहना, हमेशा अच्छा नही लगता

कट कर तो गिरे पतंगें, किसी अजनबी की अटारी
उड के चूमना आसमान, हमेशा अच्छा नही लगता

हों थोडी सी लापरवाहियां, हों हिदायतें बुजुर्गों की
सधे कदमों से चलना, हमेशा अच्छा नही लगता

ओढ़ लो कभी यूं ही, बचपन की नासमझी
अकल का पैरहन, हमेशा अच्छा नहीं लगता

कुछ कच्चा पक्का बने, खाये कुछ मीठे से उलाहनें
उम्दा तारीफों का तडका, हमेशा अच्छा नही लगता

इन्तजार में महबूब, जरा पलकें तो बिछायें
वक्त पर पहुचना, हमेशा अच्छा नही लगता

कुछ नाराजगी भी हैं जरूरी मोहब्बत के लिये
हर बात मान जाना, हमेशा अच्छा नही लगता

शुक्रवार, 29 मई 2020

छोड़ देते हैं

किनारा कर लिया तुमने, 
तो जाओ छोड़ देते हैं
न हमको याद अब करना, 
तेरा दर छोड़ देते हैं।

तुम्हारी सांस में घुलकर, 
मिली थी जिंदगी हमको
तुम्हारे साथ लो अब ये, 
जहां भी छोड़ देते हैं
किनारा ....

तुम्हारे साथ में बीते, 
हुए पल अब सताते हैं
सफ़र मुमकिन नहीं आगे,
ये राहें छोड़ देते हैं 
किनारा ....

निगाहें दूर तक तुमको, 
बुलाने अब न आयेगीं
कदम दो चार क्या चलना, 
यहीं से छोड़ देते हैं
किनारा ....

हमारा रात भर जगना
तुम्हारा दिन ढले मिलना
सुहाने वो हंसी किस्से
अधूरे छोड़ देते हैं
किनारा ....

किनारा कर लिया तुमने, 
तो जाओ छोड़ देते हैं
न हमको याद अब करना,
तेरा दर छोड़ देते हैं।

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