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बुधवार, 6 जून 2018

अजनबी हूं




पल दो पल के लिये आया हूं, तेरे शहर में यारों
कुछ ऐसा बोकर जाऊंगा, तुम्हे याद बहुत आऊंगा

कई चेरहे कुछ फीके, कुछ उदास नजर आते है
मुस्कुरा सके दो पल, ऐसी बात दे कर जाऊंगा

माना अजनबी हूं अभी, मगर यकीं है मुझको
जाते हुये रोकोगे, ऐसे जज्बात सी कर जाऊंगा

तेरे दिल के कई जख्म, मुझे मेरे जैसे ही लगे
कुछ सुकूं में आये तू, ऐसी सौगात देकर जाऊंगा

सिलसिले मोहब्बत के, बने न बने कोई गम नही
आरजू मिलने की हो, वो मुलाकात देकर जाऊंगा

यूं तो हक नही मुझे, तुमपर कोई हक जताने का
मुझे मजहब में न टांकना, ये फरियाद करके जाऊंगा

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 07.06.2018 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2994 में दिया जाएगा

    हार्दिक धन्यवाद

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ८ जून २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन उपग्रह भास्कर एक और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  4. आशा और विश्वास से भरी सुंदर पंक्तियाँ...

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  5. वाह लोक हित के उच्च भावों से सजी सुंदर रचना।

    उत्तर देंहटाएं

आपकी राय , आपके विचार अनमोल हैं
और लेखन को सुधारने के लिये आवश्यक

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