प्रशंसक

गूगल अनुसरणकर्ता

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

जरूरत का फूल



नही दे सकती स्नेह का जल
सीचंने को नवजात जीवन
कि सुनती हूँ उसके रोने में
चीखें तीन जिन्दा, चार मॄत
और दो अंकुरित मादा लाशों की
जानती हूँ अच्छी तरह
निर्दोष है पूरी तरह
ये नन्हा सा जीव
बाहें पसारे आतुर है
मेरे स्पर्श को
जो इसका अधिकार भी है 
और मेरा दायित्व भी
मगर उसके मासूम से चेहरे में
आने लगता है मुझे नजर
मॄत्यु का ताडंव
याद आती है वो यातना
जब मन चीख चीख कर
मना रहा होता था मातम
और नोचा जा रहा था ये शरीर
जहाँ थी मै मात्र एक मशीन 
जिसमे डाला जा रहा था बीज
जबरदस्ती अहंकार के साथ
कि कैसे नही उगेगा इस धरा पर
पुत्र नाम का पौध
यही तो है वो 
जिसके सहारे बढेगी वंश की बेल
जिसे पल्लवित करने के लिये दी गयी बलि
मेरी जन्मी अजन्मी बेटियों की
चारो तरफ से आने वाली बधाइयों में
सुनती हूँ अपनी बेटियों की बेबसी
जिन्हे नही दे सकी अपना हाडं मास
बस धीरे धीरे हर बार थोडा थोडा
मरती रही मेरी ममता
मरता गया मेरा ममत्व
और आज लेबर रूम से बाहर
एक नवजात शिशु के साथ निकली
एक ऐसी जिन्दा औरत
जिसके अन्दर दमतोड़ चुकी थी मां
इस अबोध की आवाज में सुन रही हूँ
अट्टहास एक आदमी का
जो कह रहा है
देखा मै आ गया
जान लो, तुम हो सिर्फ एक औरत
क्या हुआ जो है
जन्म देने का अधिकार तुम्हारे पास
दुनिया में तो वही आयगा जिसे मैं चाहूंगा
रुई के इस फाहे को भूख से बिलखता देख भी
नही फूटता प्रेम का कोई अंकुर
सूख गयी है छाती रेत की तरह
और चट्टान की तरह निष्प्राण हो गया है सीना
फिर भी शायद इस शुष्क तन में 
कहीं बची रह गयी है स्त्री 
जो देगी ही जीवन
इस जरूरत के फूल को

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (29-07-2018) को "चाँद पीले से लाल होना चाह रहा है" (चर्चा अंक-3047) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' ३० जुलाई २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।



    आवश्यक सूचना : रचनाएं लिंक करने का उद्देश्य रचनाकार की मौलिकता का हनन करना कदापि नहीं हैं बल्कि उसके ब्लॉग तक साहित्य प्रेमियों को निर्बाध पहुँचाना है ताकि उक्त लेखक और उसकी रचनाधर्मिता से पाठक स्वयं परिचित हो सके, यही हमारा प्रयास है। यह कोई व्यवसायिक कार्य नहीं है बल्कि साहित्य के प्रति हमारा समर्पण है। सादर 'एकलव्य'

    उत्तर देंहटाएं

आपकी राय , आपके विचार अनमोल हैं
और लेखन को सुधारने के लिये आवश्यक

GreenEarth