प्रशंसक

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

वो कहता था ...........












वो कहता था
वो कभी झूठ नही बोलता
किसी को धोखा नही देता
वादे निभाना है उसकी आदत
इश्क को मानता है इबादत

वो कहता था
मेरा इन्तजार करना
मुझपे ऐतबार करना
मै बसता हूँ तेरे दिल में
मुझे कभी बेघर ना करना

वो कहता था
मै चाहे कही भी जाऊँ
कितना भी दूर रहूँ
पर आऊँगा लौट कर
ना जाना मुझे छोड कर

आज भी मै कर रही हूँ
उसका इन्तजार
क्योकि उसने किया था
मुझपे ऐतबार

नही बसाया है किसी को
अपने दिल में
क्योकि नही कर सकती
उसको बेघर

खडी हूँ आज भी
मै उसी मोड पर
बरसो पहले जहाँ
गया था छोड कर
जाने किस पल
वो आ जाय
मुझे ना पाकर
कही घबरा ना जाय

बस चाहती हूँ
एक बार सिर्फ एक बार
आ जाय मेरे पास
कह दे एक बार
तुम क्या चाहती हो

क्योकि हमेशा
वो कहता रहा
बस कहता रहा
और मै सुनती रही

कह ना सकी कभी
मन की बात
वरना आज
वो भी कही
किसी से कहता
वो कहती थी …………..




शनिवार, 4 दिसंबर 2010

एक अधूरा खवाब












एक अधूरा खवाब है मेरा ,
पूरा कर दो तुम कर ।
आँचल मेरा खाली कबसे ,
खुशियाँ भर दो तुम कर......

सावन की बरखा में भी,
ये मन प्यासा प्यासा था ।
इस अत्रप्त सी आत्मा की,
प्यास बुझा दो तुम कर…....

जाने कब से पता नही मै ,
तुझमे ख़ुद को खोज रही ।
एक बार ख़ुद से मुझको ,
मिलवा दो बस तुम कर.......

अगर कही हदय में तेरे ,
स्थान नही है मेरी खातिर ।
माथे पर मै सज़ा जिसे लूँ ,
पग धूल ही दे दो तुम कर ….....

सब कुछ पाया है तुझमे ही ,
फिर क्या चाँहू में ईश्वर से ।
क्या मांगूं मै अपने रब से ,
इतना बतला दो तुम कर...........

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

ना जाने क्या सूझा कि













ना जाने क्या सूझा कि ,
दुश्मन से मोहब्बत कर बैठे ।
उनसे दिल को लगाने में ,
अपनो से बगावत कर बैठे ॥

पत्थर से चाहा प्यार और ,
फूलों से शिकायत कर बैठे ।
उडा कर नींदें  आंखो की ,
ख्वाबों की चाहत कर बैठे ॥

खुदा के दर पे ही उनको ,
खुदा कहने की हिमाकत कर बैठे।
उनके नूर से चेहरा को ,
पूनम का चाँद समझ बैठे ॥

अब जब सब टूटे है भ्रम मेरे,
तो सोचे  हम ये क्या कर बैठे ।
उनको पाने की हसरत में ,
हम खुद को ही खो बैठे ॥

ना जाने क्या सूझा कि ,
दुश्मन से मोहब्बत कर बैठे ।।

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

बन्धन सांसों का

सावन की पूरनमासी का दिन है । बाहर बरिश हो रही है , बच्चे खेल रहे है । आज के दिन बहने अपने मायके जाती हैं या भाई बहनों की ससुराल आते है । मगर कमली के लिये आज का दिन किसी आम दिन जैसा भी नही था ।  उसके लिये भी सावन है लेकिन आसुओं की बारिश के सामने मौसम की बारिश का अस्तित्व नगण्य सा प्रतीत हो रहा है ।पिछले पाँच साल में शायद ही कोई ऐसा मंदिर बचा था जहाँ उसने ईश्वर से एक औलाद के लिये मन्नत ना मांगी थी । लकिन आज वो अपनी इस दुआ के लिये पछता रही थी । जैसे ही उसने अपनी सास को यह खुशखबरी दी , उसकी सास ने फरमान सुना दिया - बहुरिआ ई घर मा बिटिया ना अइहै ।  उसे अस्पताल जाना है  मगर वो डर रही है । बस बार बार वो यही प्रार्थना कर रही है कि बेटी ना हो , क्योकि वो उसको बचा पाने में सक्षम नही है ।
थोडी देर मे जब वो अस्पताल पहुँची तो जाँच करने के बाद डाक्टर साहिबा ने बताया कि वो दो बच्चो को जन्म देने वाली है - एक बेटा और एक बेटी ।
ईश्वर ने शायद उसकी फरियाद सुन ली थी । और अब उसे क्या करना है यह उसने तय कर लिया । घर आकर उसने अपनी सास से कहा - अम्मा  ई घर मा एक नाही दुई बच्चा आये वाले है - एक बेटवा और एक बिटिआ । औ हम बेटवा का तबही जनम दैबे जब बिटिया भी जनम लेहे । औ जउन दिना तुम बिटिया का मारै की बात करिहो हम तोहार पोता का मार डारब ।
वो जानती थी कि दादी के प्रान पोते में बसे है और बेटे में बेटी के और बेटी में उसके ।
GreenEarth