प्रशंसक

रविवार, 13 मार्च 2011

इनका भी स्वागत कीजिये


आज आप सभी को दो ऐसे ब्लागर्स से मिलवाने जा रही हूँ जिनको पढने के बाद मुझे यह महसुस हुआ कि इनकी बात आप सभी तक भी पहुँचनी चाहिये । ये दोनो ही अच्छा लिखते हैं । अगर आप सभी का प्यार और स्नेह मिले और इनका भी त्साह वर्धन किया जाय तो इनकी लिखनी में और निखार आ सकता है ।

ब्लॉगर – चक्रेश
स्थान - मेरठ 
ब्लॉग - Someone Somewhere


वैसे तो बहुत दिन हो गए देखे हुए तुम्हें
पर आज कुछ अलग बात हुई जा रही हैं
आँखों मैं आंसू तो नहीं हैं पर
न जाने क्यूँ आज मेरी जान जा रही हैं
बहुत दिनों से तुम्हारी बहुत याद आ रही है

कहने को तो बहुत खुश हूँ मैं पर
न जाने क्यूँ धडकन मचली जा रही है
सब कुछ तो हैं मेरे पास पर
जरूरत तेरी बढ़ती जा रही है
बहुत दिनों से तुम्हारी बहुत याद आ रही है

कहने को तो मैं मुस्कराता हूँ महफिल मैं
पर तन्हाई जिंदगी मैं बढ़ती जा रही हैं
जानता हूँ तू न आयेगी अब कभी पर
तेरे आने की उम्मीद बढ़ती जा रही है
बहुत दिनों से तुम्हारी बहुत याद आ रही है

कहने को तो दोस्त और भी बहुत हैं मेरे पर
ऐ दोस्त तू मेरी जिंदगी होती जा रही है
जानता हूँ तू अब किसी और की है पर
नजदीकियां तुमसे बढ़ती जा रही है
बहुत दिनों से तुम्हारी बहुत याद आ रही है

कहने को तो बहुत लोग आए गए है जिंदगी मैं पर
न जाने क्यूँ तेरी याद जिंदगानी बनती जा रही है
यूँ भी नहीं बहुत उदास हूँ मैं पर
यह कैसी बेरुख फिजा नजर आ रही है
बहुत दिनों से तुम्हारी बहुत याद आ रही है

स्थान - दिल्ली 





जिस पथ पर जाना ना हो, उस पर पग ही क्यों धरें ।
राह जो मंजिल की है, कितनी भी मुश्किल क्यों डरें ॥ 
चलते रहना है हमको, मंजिल जब तक ना मिले ।
 जीवन चाहे मिट जाये,  हौसला फिर भी ना हिले  ॥
हम भटकने वालों में से नहीं,  हमें पता अपनी मंजिल ।  
अब हमारा मन भी यही,  यही है हमारा दिल ॥ 
चाहे कितने भी हों प्रलोभन,  चमक और सुख अनेक । 
चलना बस उसी पर है,  चुनी है जो राह एक ॥ 
क्या हुआ जो सुख ना मिले,  ना मिले अपना कोई । 
चलना सच्चाई की राह पर, था मेरा सपना यही ॥ 
क्यों ना आयें पल पल, कांटे अनेकों सामनें ।
सत्य की शक्ति हमेशा, साथ है मुज्ञको थामनें ॥ 
मिलेगी जब मंजिल मुज्ञे, वह क्षण कितना अनुपम होगा । 
यही सोच कर हर पल, चलना प्रतिक्षण होगा ॥ 


बुधवार, 9 मार्च 2011

टिप्पणियों को सिर्फ तारीफ का माध्यम बनाना क्या उचित है ??



हम जब भी कुछ लिखते है तो सबसे पहले चाहते है कि अधिक से अधिक लोग उसे पढ़े , और तारीफ भी करें । तारीफ सुनना हर व्यक्ति को अच्छा लगता है , यह मनुष्य का प्राकृतिक स्वभाव है । हमारे ब्लाग जगत में ऐसे बहुत कम पाठक है जो सिर्फ पाठक ही है , ज्यादातर लोग ब्लॉगर और पाठक दोनो ही है । हिन्दी यूँ तो बहुत सरल भाषा है किन्तु उसका गहन व्याकरण ज्ञान एक सामान्य सी रचना को भी उम्दा बना देता है । और यहाँ पर अच्छे जानकारों की कतई कमी नही । फिर भी हम बस यही क्यों चाहते है कि बस हमने जो लिखा है उसकी सराहना और प्रशंसा ही की जाय ।जहाँ तक हम समझते है ब्लॉग पेज पर टिप्पणी के रूप में कुछ लिखने का स्थान इसीलिये बनाया गया कि हम उस रचना को पढ़ कर अपने विचार व्यक्त कर सकें । एक ईमानदार टिप्पणी करना क्या कोई मुश्किल कार्य है , हम क्यों यह सोचते है कि यदि हम कमी की बात कर देंगें तो ब्लॉगर महोदय/ महोदया को अच्छा नही लगेगा । टिपप्णी सिर्फ तारीफ के आदान प्रदान का ही माध्यम तो नही । अपने विचारों को हमें निर्भय हो कर लिखना चाहिये , और ब्लॉगर्स को भी उसका खुले मन से स्वागत करना चाहिये । एक बार उस पर विचार अवश्य करना चाहिये । जरूरी नही कि जो गलती बताई जाये वो हमेशा ठीक ही हो ।
नये ब्लॉगर्स कई बार ब्लॉग जगत में अपनी जगह बनाने के लिये , ज्यादा से ज्यादा टिप्पणी करके अपनी मौजूदगी बनाने की कोशिश करते है , इसमे कुछ गलत नही , मगर जितनी जिम्मेदारी लेखक की सही और अच्छा लिखने की होती है , उतनी ही जिम्मेदारी पाठक की भी होती है ।लेकिन लोग कभी संकोच के कारण कभी कुछ अन्य कारणों से कुछ गलत दिखते हुये भी सिर्फ प्रशंसा करके ही निकल लेते है ,यह सोच कर की यह तो बहुत बडे ब्लॉगार ने लिखा है ।
आज कल ब्लॉग जगत में हमारी वाणी पर बने रहने के लिये कुछ लोग कुछ भी लिख रहे है , वही कुछ ऐसे ब्लॉगर्स भी है इस बात की बिल्कुल भी फिक्र नही करते । हमें यह भी सोचना होगा कि आखिर मोडरेटर की आवश्यकता एक लेखक को क्यों पडती है , कई बार टिप्पणियां लेख की विषय वस्तु से भटक कर लेखक के व्यक्तिगत जीवन पर आ जाती है । यह एक प्रकार का अदृश्य डर है जो लेखक के मन में रहता है(जो कि नही होना चाहिये) ।
हमे टिप्पणी लिखते हुये कुछ बातों का ध्यान रखना ही होगा , अपने ब्लाग जगत की स्वस्थ उन्नति के लिये ।
  • मेरा सभी जानकार , विद्वान ब्लॉगर्स से अनुरोध है , कि नये ब्लॉगर्स को अपना उचित मार्गदर्शन देने की भूमिका भी निभायें ।
  • पाठकों को जो बात रचना में लिखी समझ ना आयें वह टिप्पणी के माध्यम से पूछे ।
  • ब्लॉगर्स यदि कोई पाठक आपकी किसी कमी के बारे मे लिखता है तो उसे विशाल हदय से लें , मन में कोई बैर भाव ना लायें ।
  • टिप्पणी करते समय स्वस्थ भाषा का ही प्रयोग करें ।
  • टिप्पणियों का केन्द्र लेख ही होना चाहिये , लेखक नही ।
  • अतीव किसी भी आलेख को जिससे आप सहमत ना हो , पर शालीन टिप्पणी करें ।
 
 यह लेख किसी भी व्यक्ति विशेष को ध्यान में रख कर नही लिखा गया है , तो आप सभी से अनुरोध है कि इसे व्यक्तिगत रूप से ना लें , किन्तु एक बार विचार अवश्य करें और अपनी राय दें ।


आपकी राय , आपके विचार अनमोल हैं
और लेखन को सुधारने के लिये आवश्यक





सोमवार, 7 मार्च 2011

पोस्ट एक शीर्षक अनेक



एक बहुत ही जानेमाने ब्लॉगर है । लिखते भी बहुत अच्छा है । और उनके पाठक भी बहुत है । लेखन का विषय भी उन्होने बहुत अच्छा चुना और लेख भी अच्छा लिखा । मगर पता नही उन्होने क्या सोचा या एक नया प्रयोग किया  कि उस एक लेख को कई सारे शीर्षक दे डाले ।और अलग अलग ब्लॉगों पर पोस्ट छाप डाली । कही आप लोग यह तो नही सोचने लगे कि ऐसा वो हमारी वाणी की सूची पर बने रहने के लिये कर रहे है,या अपने सारे ब्लाग्स का प्रचार कर रहे है ,या उनके ब्लॉग पर ज्यादा पाठक नही है ।अरे नही ऐसा बिल्कुल नही है  बल्कि वह यह चाहते थे कि ज्यादा से ज्यादा पाठक इसे पढे और “जागरूक“ हो ।
 हाँ एक बात मुझे समझ नही आई कि शीर्षक का उद्देश्य क्या होता है ? जहाँ तक मेरी समझ मे आता है शीर्षक लेख का आइना होता है , जिसे  पढ़्ते ही पाठक एक अनुमान लगाता है कि लेख किस विषय पर आधारित है । यहाँ पर मैं लेखक को बधाई देती हूँ जिन्होने एक ऐसा लेख लिखा जिसके लिये इतने सारे शीर्षक सटीक बैठते हैं(उनके अनुसार, बाकी आप लोग ही पढ़ कर देख सकते है कि सारे शीर्षक कितने सटीक है कितने नही) ।इतने सारे शीर्षक देख कर स्कूल टाइम याद आ गया जब यह एक प्रश्न होता था , प्रश्न पत्र मे लेख दिया होता था और शीर्षक पूछा जाता था ।
आपकी सुविधा के लिये हम आपको वह लिंक्स दे रहे है , चाहे जो भी क्लिक कर लीजिये (लिखा सभी मे एक ही है) और आप लोग इससे शिक्षा भी ले कि जब भी किसी गम्भीर मुद्दे पर लिखे उसे कई सारे ब्लाग्स पर अलग अलग शीर्षक लिख कर छापे , ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग पढे ,और सीखे ।
 
इतने ही हम देख पाये है यदि किसी शीर्षक को हम नही देख पाये तो लेखक से क्षमा प्रार्थी हूँ ।
यदि आप पाठ्कों को और भी कोई शीर्षक सूझ रहा हो, अवश्य लिखें, स्वागत है ।


शनिवार, 5 मार्च 2011

नही जानती क्यों ……………


चंद रोज पहले बना रिश्ता , जन्मों का बन्धन लगता है ।
नही जानती क्यों लेकिन , अपना सा हमको लगता है ।

कभी तो लग जाते है बरसों ,एक रिश्ते को संजोने में
कभी नही लगते दो पल भी , रिश्तों के बिखर जाने में
ऐसे रिश्तों के अनोखे जहाँ में, क्यों तू मेरे साये सा लगता है
नही जानती क्यों ……………………………….

कभी रुधिर के रिश्ते भी, रक्त के प्यासे देखो हो जाते
कभी अजनबी अचानक ही,अपनों से प्यारे बन जाते
प्रतिपल बदलते लोग यहाँ, क्यो तू मेरे बिम्ब सा लगता है
नही जानती क्यों …………………………………….

रिश्तों की अबूझ पहेली को ,मै मूरख समझ नही पाती
रिश्तों की मिलावट देख देख, रिश्तों के बन्धन से घबराती
ऐसी मुश्किल घडियों मे क्यों , तू मेरा साहस बन मुझमें बसता है
नही जानती क्यों ……………………………………………
GreenEarth