प्रशंसक

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

स्वयं की खोज- A Discovery for Self


बहुत दिनों से सोच रही थी कि कुछ दिन के लिये कही घूम आऊं, मगर न तो अविजीत को ऑफिस से छुट्टियां मिल पा रहीं थीं और ना ही माँ जी की तबियत इतनी अच्छी थी कि उन्हे छोड कर जा सकती। कहने को तो शादी को अभी एक साल ही हुआ था मगर लगता था जैसे बरसों से इस दहलीज से बंधी हुयी हूँ। शादी से पहले तो जब मन आता था छुट्टी ले लेती थी। साल में दो तीन बार तो घूमना हो ही जाता था, कभी घर वालों के साथ तो कभी दोस्तों के। शादी के बाद नौकरी के साथ साथ छुट्टी लेने की आजादी भी जाती रही। कहाँ मिलती है छुट्टी हम घर संभालने वाली औरतों को। बचपन से लिखने पढने का तो ऐसा शौक था कि पापा ने घर में मेरे लिये एक लाइब्रेरी ही बनवा दी थी। शादी से पहले, सनडे की दोपहर मेरी लाइब्रेरी में ही बीतती थी। रेहाना, कहने भर को ही काम वाली थी, सारे घर पर उसका हुकुम चलता था। जब मायके जाती तो कहती- बीबी जी कहो तो आपकी ये किताबे आपकी ससुराल पहुंचा दे, यहाँ तो किताबें अब धूल ही खाती हैं, और मैं हँस कर कह देती, अरे! रेहाना बेगम अब तो हम भी तुम से ही हो गये हैं, वहाँ भी किताबें अब धूल ही खायेंगीं।
शादी की सौगात में मुझे मिला था – एक लाडला देवर जिसका मेरे बगैर कोई काम ना चलता था, माँ जैसी सांस जिनका बस चलता तो मुझे पल भर को नजरों से ओझल ना होने देती और पति जिनका पहला जीवनसाथी था – उनका काम। यूँ तो महीने में दो तीन टूर उनके हो ही जाते थे, मगर मुझे कभी साथ ले जाने की शायद उन्होने कल्पना भी नही की थी। अगर कभी मैं कह देती कि इस बार मुझे भी साथ लेते चलो तो कह देते- क्या करोगी चल कर मै दिन भर काम और शाम को पार्टीज में बिजी रहूंगा, और तुम बोर होती रहोगी।
कहने को कोई दुःख ना था, मगर शायद इन जिम्मेदारियों के बीच मैं खुद को खोती जा रही थी। एक अजीब सा भय मन को घेरने लगा था। महीनों हो जाते थे अपना नाम सुने, कभी कभी सोचती कही एक दिन मै खुद अपना नाम ही ना भूल जाऊं।
कभी सोचती कि आखिर मेरे बिना कैसे चलता था ये घर, क्या दो चार दिन अब नही चल सकता। क्यो कोई मेरे मन को जानने की कोशिश नही करता। मुझे काम करने या गॄहस्थी संभालने से कोई गुरेज ना था, बस खुद को खो देने से डरती थी।  
आज अचानक सफाई करते करते जब मुझे एक पुराना अखबार मिला, जिसमे मेरी कहानी छपी थी, तो एक बार फिर से मन व्याकुल हो उठा। शादी के बाद बस यही एक कहानी लिखी थी| सभी ने तारीफ जरूर की थी मगर प्रोत्साहन कभी किसी से ना मिला।
सफाई करते करते मन की धुंध भी साफ हो रही थी। मैने खुद को खुद में खोजने का निश्चय। किसी से अपेक्षा करने से बेहतर था मै स्वयं ही स्वयं की अपेक्षायें पूरी करूं। मुझे स्वयं के लिये समय निकालना ही होगा। कुछ पल खुद को देने ही होंगे।

आज अपने जीवन की दूसरी पारी की शुरुआत कर रही हूँ, इस आशा के साथ की अपनों से भले ही प्रोत्साहन मिले ना मिले, मगर स्वयं को दुबारा जरूर पा रही हूँ। 

शनिवार, 15 अगस्त 2015

आजादी


रात के बारह बजने का संदेश घंटाघर पर लगी घडी के घंटे की आवाज ने दे दिया। आज शहर की सडकों पर पुलिस की गस्त बढा दे गयी थी। कल पन्द्रह अगस्त थी। अभी चार दिन पहले ही शहर में दो जगह बम ब्लास्ट हुये थे। सौभाग्य से दो चार जाने ही गयीं थी। प्रशासन को पूरी आशंका थी कि आज की रात कुछ गडबड हो सकती थी। रीति की आंखों में नींद दूर दूर तक नही थी। उसका पति भी पुलिस विभाग में था। वो अपनी ड्यूटी के प्रति कितना समर्पित है ये तो वो नही जानती थी, मगर उसके प्रति वो समर्पित तो क्या, उसके लिये एक दैत्य से कम ना था। शादी के चार सालों में वो कितनी बार पिट चुकी थी, ये गिनती करना तो उसने बहुत पहले ही छोड दिया था। निर्धनता उसका सबसे बडा दोष था। दो रोटी और एक छत के लिये , वो सब कुछ चुपचाप सहन कर लेती थी, मगर अब सब्र का बाँध भी टूट रहा था। वो आजादी चाहती थी, मगर आजाद होकर जाती कहाँ? विदाई के समय ही उसकी विधवा माँ ने कहा था - रीति तेरा घर तो बस गया बस अब तेरी दोनो बहनों को उनका ससुराल मिल जाय तो मै अपनी जिम्मेदारियों से आजाद हो जाऊंगी। ऐसे में भला कैसे वो अपनी माँ को अपनी विपत्तियां बताकर चिन्ता के जाल में उलझाती। आज की रात उसने फैसला कर लिया था कि सुबह होने से पहले वो आजाद हो जायगी। कमरे की छत पर लटके पंखे को बार बार देखती, हर बार पूरी हिम्मत जुटाती मगर उस पर झूल जाने का साहस ना जुटा पाती। तभी उसके कानों में कई बरस पहले उसकी एक अध्यापक के कहे शब्द गूंज उठे- आजादी सबसे प्यारी चीज है। देश की युवा पीढी आजाद देश में सांस ले सके , इसके लिये लाखों ने अपनी जान हसते हसते दे दी। अब इस आजादी को सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है।आजादी का मतलब है- अन्याय से आजादी, सोच की आजादी।
रीति जिस साडी को हाथ में लिये पंखे पर डालने के लिये बैठी थी, वही छोडकर उठ खडी हुयी। हाथों में अपनी डिग्रियां और कुछ रुपये लेकर घर से बाहर निकल आयी, अपने नये आकाश की तलाश में जिसमे वो आजादी की सांस ले सकेगी।


मंगलवार, 4 अगस्त 2015

महिला आरक्षण बिल - सच या स्वप्न


स्त्री और पुरुष- समाज की दो इकाई, जिनसे मिलकर बनता है समाज। समाज की कल्पना के साथ ही आते है कुछ नियम, कुछ कानून, जो आवश्यक होते है समाज को सुचरु रुप से चलाने के लिये । जिस तरह से एक घर की पूर्णता तभी सम्भव है जब उसमें स्त्री और पुरुष दोनो की ही सहभागिता हो , उसी प्रकार आदर्श सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने के लिये  दोनो ही इकाइयों का बराबर अनुपात मे सहभागी होना आवश्यक है ।
एक तरफ जहाँ देश में विभिन्न मंचो से स्त्रियों को बराबरी का दर्जा देने की बात की जाती है, उसी देश में ३३% आरक्षण की क्या प्रासंगिकता है। यह एक बहुत अहम विषय है, जिस पर खुले मन से विचार और विवेचना होनी चाहिये। ये सोचना होगा कि किन लोगो ने महिलाओ को ३३% आरक्षण देने की बात की पहल की। क्या वास्तव में देश में आरक्षण लागू किये बिना महिलाओं की स्थिति मे सुधार असंभव है। इसके लिये हमे थोडा सा अपने राजनीतिज्ञों के कथनों और कार्यकलापों के बीच के अनुपात की सूक्ष्मता से व्याख्या करनी होगी। पिछले एक दशक में देश, दो बार लोकसभा, करीब द्स बारह विधान सभा के चुनावों को देख चुका है। यदि छोटी और मझले कद की पार्टियों को छोड दे, और राजनीति मे बडा कद रखने वाली राजनीतिक पार्टियों को देखे, तो कुछ मुख्य बिन्दु हमारे सामने आते हैः
·         ज्यादातर जिन महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया गये, वो या तो पहले से राजनीति में अपना अहम स्थान रखती थी, या धुरंधर राजनीतिज्ञों के परिवार से थी।
·         किसी भी पार्टी ने ३३ % तो क्या २० % भी महिला उम्मीदवारों को टिकट नही दिये।
·         किसी नये महिला उम्मीदवार पर वोटरो का भी भरोसा कम होता है।
उपरोक्त बिन्दुओं के आधार पर कहा जा सकता है कि आज देश को आरक्षण लागू करने से ज्यादा जरूरत इस बात की है कि वो महिलाओं की सोच, उनकी कार्यक्षमता, उनकी कार्यशैली पर अपना विश्वास बनाये।
महिला आरक्षण की त्रासदी
देश में महिलायें, देश आजाद होने के बाद से ही प्रतिनिधित्व की लडाई लड रही है। करीब दो दशक पहले यह हमारे सामने महिला आरक्षण बिल के रूप मे सामने आया। ऐसा नही कि यह बिल को केवल महिलाओं का ही समर्थन प्राप्त था, पुरुष प्रधान राजनीतिज्ञ सामने से तो हमेशा ही बिल के पास होने की वकालत करते रहे किन्तु मंशा हमेशा यही रही कि उसके राजनीतिक स्थान मे महिलाओं का कम से कम प्रवेश हो। १९९६ से देवेगौडा जी के कार्यकाल से लेकर आज तक करीब १० बार यह विधेयक संसद पटल पर रखा गया , और हर बार शोर शराबे मे साथ ही इस बिल का विरोध कर दिया गया। कभी भी एक स्वस्थ बहस का माहौल नही बना। किसी ने यह तर्क नही दिये कि क्यो इस बिल को पारित नही होना चाहिये।
ऐसा नही कि केवल भारतीय महिलायें ही राजनीति मे अपना स्थान बनाने के लिये संघर्षरत हैं, विश्व के ज्यादातर सभी देशो की लगभग यही स्थिति है। आखिर क्या है इस विडम्बना का समाधान? जब सोच ही स्वच्छ और निरपेक्ष नही है तो समस्याओ का उल्मूलन एक स्वप्न मात्र ही है।
महिला आरक्षण की आवश्यकता
बहुत से लोगो का यह सोचना हो सकता है कि आखिर महिला आरक्षण की जरूरत क्यों है। क्यो राजनीति में महिलाओ की अधिक भागीदारी आवश्यक है?
आजादी के शुरुआती दौर में देश मे बहुत सी समस्याये थी, महिलाये और पुरुष दोनो अपने अपने स्तर से देश को उन्नत करने की कोशिश कर रहे थे। मगर इस समके बीच एक और समस्या जन्म ले रही थी। पुरुष राजनीतिज्ञ चाहता था कि देश की बागडोर सदैव उअसके ही हाथ रहे। घर की चार दीवारों मे बन्द स्त्री को वह अपने बराबर देख पाने का हौसला नही कर पा रहा था। धीरे धीरे उसके बढते साहस ने महिलाओं की राजनीति मे भूमिका को हाशिये पर ला कर खडा कर दिया। एक लम्बे अरसे से यह महसूस किया जाने लगा कि मानसिकता को बदलना लगभग मुश्किल सा ही है, इसे सिर्फ कानून या आरक्षण से सहारे ही सुधारा जा सकता है।
·         आकडें बताते है कि राजनीति मे पुरुषों के भ्रष्टाचारी होने का अनुपात महिलाओं से कई गुना भी ज्यादा है। जिससे साफ अर्थ निकलता है कि महिलाये स्वच्छ राजनीतिक वातावरण देने में पुरुषों से ज्यादा सक्षम है।
·         महिलाओं की त्याग और समर्पण की भावनाओं पर प्रश्न चिन्ह नही लगाया जा सकता।
·        
संसाधनों का इस्तेमाल भी महिलाएँ पुरुषों की तुलना में अधिक बेहतर ढंग से करती हैं। पंचायत राज संस्थानों में 'महिला सरपंच' के लिए स्थान बनाते समय इन्हीं मुद्दों पर गंभीरता से विचार हुआ था। अब संवैधानिक संस्थानों के लिए भी ऐसी व्यवस्था की जरूरत महसूस हो रही है।

फिलहाल १६वीं लोकसभा में महिलाओं की बढती संख्या एक शुभसंकेत के रूप मे देखी जा सकती है। और भविष्य में महिला बिल की स्वप्न कथा को हकीकत की धरा पर देखने की उम्मीदे करना एक दिवा स्वप्न नही होगा। 

शुक्रवार, 5 जून 2015

रिस्टोरेशन...............


सर्दी की छुट्टियां चल रही थी। दुनिया में शायद ही कोई हो जिसे छुट्टियों का इन्तजार ना होता हो, मगर मेरे लिये ये बोझ सी ही होती थीं, जिन्हे बस यदा कदा काटना होता था। तीन दिन से सूरज देवता ने भी दर्शन नही दिये थे, जैसे वो भी इस ठंड में बादलों की रजाई में दुबक कर सो रहे थे। ड्राइंग रूम में बैठी अखबार पढ रही थी तभी लगा जैसे खिडकी से झांकती हुयी धूप मुझे लॉन में आने का निमंत्रण दे रही है। लता एक कप चाय बना कर बाहर ही ले आ, पता नही कितनी देर के लिये निकली है ये धूप, ठंड से तो लगता है हाथ पैर में जान ही नही है, कहते हुये मै धूप में पडी कुऱसी पर बैठ गयी ।
लता चाय दे कर फिर अपने काम में लग गयी थी और मैं एक शिवानी का नॉवेल चौदह फेरे पढने लगी थी। तभी लता ने आवाज दी – दीदी रोटी सेंक दूं या थोडी देर में खायेंगी। कभी दो बजे से पहले खाती हूं क्या? तुम्हारा सारा काम हो गय क्या? तुमको भूख लगी है तो खा लो मै बाद में खाऊंगी। क्या दीदी दो तो कब के बज गये, उसके कहते ही मैने रूम में सामने लगी घडी पर सरसरी सी नजर दौडाई, सच में दो तो कब के बज चुके थे, शायद शिवानी जी को पढते पढते मुझे समय का पता ही ना चला था। मन ही मन खुद की गलती का अहसास करते हुये मैने थोडा प्यार से कहा- लता तुम खा लो मेरे लिये बना कर रख दो, मै थोडी देर में खा लूंगी। ना दीदी अभी हमको भी भूख नही। मै यही आ कर स्वेटर बुन लेती हूँ तब तक आप अपनी ये किताब भी पूरी कर लीजिये।
मैं दुबारा से नॉवेल में डूब गयी। और लता अपने काम में। पढते पढते मेरी नजर लता पर गयी, वो एक पुराने स्वेटर को उधेड रही थी। मैने कहा लता ये क्या कर रही हो – तुमको तो राजू के जन्म्दिन के लिये स्वेटर बनाना था ना, पुरानी ऊन से बनाओगी क्या? अरे मुझसे कह देती मैं कल बाजार से नयी ऊन ला देती।
अरे नही दीदी, इसकी क्या जरूरत है, ये स्वेटर राजू को अब नही होता और कई जगह से फट भी गया है। इसको उधेड कर ऊन को भाप दे कर उसकी गन्दगी साफ हो जायगी, यही एकदम नयी सी लगने लगेगी। फिर इस बार कोई नयी सी डिजाय्न डाल दूंगी। बिल्कुल नयी ऊन जैसा बन जायगा ये भी।
अच्छा मगर इसमें जो पचासों गांठ लगाओगी तब, मेरे कहते ही वो बोली, अरे दीदी गांठ तो पीछे रहेंगी ना, देखियेगा तब पूरा तैयार होगा तो आप भी नही पहचान सकोगी कि ये पुरानी जोड्दार ऊन से बना है।
सही ही तो कह रही थी लता। मैं ही मूरख थी जो पिछले तीन सालों से अपने हर रिश्ते को थोडी थोडी उलझनों के कारण तोडती आ रही थी। कब से मन में बना कर रखा है उन टूटे रिश्तों का गोला जिसमें कितनी ही खट्टी मीठी बातें है। क्यों नही निकाल देती कडवी बातों को मन से जैसे लता बीच बीच में तोड कर निकाल देती है कमजोर बेकार ऊन को जो बुनाई को कमजोर बना सकती है। क्यों नही कर रही थी कोशिश रिश्तों को फिर से बुनने की। क्यों नही बुन सकती मै फिर से आकाश के साथ अपना रिश्ता। क्या प्यार की ऊष्मा में नही उड सकती वो कडवाहटें जो हम दोनो के मन में बैठ गयी है? क्या मन में बनी चंद गांठो को छुपाया या मिटाया नही जा सकता?
अब और इन्तजार नही करूंगी। बुनना मेरा धर्म भी है और कर्तव्य भी। हाँ मुझे भी बुनना होगा अपने रिश्ते का स्वेटर उसी पुरानी ऊन को लेकर नयी आशाओं की डिजायन के साथ। 
* Restoration - पुनरनिर्माण
GreenEarth