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शुक्रवार, 7 जनवरी 2022

अंकुर

इतवार की सुबह थी, चाय नाश्ता हो चुका था, अखबार भी पढा जा चुका था। राधिका की कल से परीक्षा थीं इसलिये श्रीमती जी उसको पढानें में व्यस्त थी, भले ही वह फस्ट क्लास में थी मगर हमारी श्रीमती जी को इतनी चिंता थी जैसे उसकी बोर्ड की परीक्षा हो। ऐसे माहौल में टीवी चला लेना किसी गुनाह से कम ना था, डांट पढना संम्भावित नहीं, सुनिश्चित था। हम और मिंटू दोनो को ही कोई काम समझ नहीं आ रहा था। तभी मुझे सामने अलमारी में   फूल और सब्जियों के बीज का पैकेट दिखा जो मै श्रीमती जी के कई बार कहने के बाद लाया था, और शायद कुछ व्यस्तता के कारण वो अभी तक इन्हे बो नहीं पाईं थीं। कोई और दिन होता तो मै भी यह उलाहना जरूर देता - कि जब तक बीज ना लाया था, लोगों ने कह कह कर मेरी नाक में दम कर दिया था, और अब लगता है रक्खे रक्खे ही फूल सब्जी उग आयेंगें। मगर मुझे तो अभी यह एक अवसर सा लगा, एक पंथ दो काज जैसा- मेरा थोडा समय भी कट जायेगा, और श्रीमती जी भी खुश हो जायेंगीं।

मैने मंटू से कहा- आओ बेटा हम लोग गार्डेन में चलते हैं। मंटू जो कुछ देर पहले ही शोर मचाने के कारण मां से डांट खाकर, सोफे पर उल्टा लेटा था, गार्डेन का नाम सुन कर मेरे साथ चल दिया।

दोनो पिता पुत्र ने चार गमले तैयार किये। मंटू बडे ध्यान और मन से मेरे साथ लगा हुआ था। मैने उसको मिट्टी में खाद को अच्छे से मिलाने का काम दिया था, और वह अपने नन्हे हाथों से खूब अच्छे से यह कर रहा था। जैसे ही मैने गमले में बीज डाल कर उनके ऊपर थोडी सी मिट्टी और पानी डाला, मंटू उदास होकर बोला- पापा आपने तो सब गडबड कर दी। मुझे समझ नहीं आया कि मैने क्या किया जिसके लिये मंटू अचानक से उदास भी हो गया और ऐसा क्यों बोल रहा है। मैने उसको अपने पास लाते हुये बोला- क्या हुआ बेटा, मैने क्या गडबड कर दी। ऐसा लगा जैसे मंटू को लगा कि उसके पापा ने जानबूझ कर गलती नहीं की जैसे अभी थोडी देर पहले जब वह पानी का ग्लास सिंक में रखने जा रहा मगर वह छूट कर गिर गया था और राधिका की किताब गीली हो गई थी और फिर मम्मी से उसको डांट पडी थी। 

मासूमियत और समझदारी के मिश्रित लहजे में बोला- पापा आप तो कह रहे थे कि बीजों  से पेड बनेगा, उसमें सुंदर सुंदर फूल आयेंगें मगर आपने तो इनको मिट्टी में दबा दिया, अब ये बेचारे तो अंदर मर जायेंगें, इनको तो हवा भी नहीं मिलेगी। फिर कैसे इसमे से फूल निकलेंगें?

मैं मिंटू के अंदर पनपे मानवीय गुण को देख रहा था। उसके मासूम से प्रश्न में असीम जिज्ञासा छिपी हुई थी।

मैने कहा- दरअसल ये बीज जब मिट्टी के अंदर जायेगा। तभी इससे अंकुर निकलेगा, फिर धीरे धीरे इसमें पत्तियां आयेंगी, फिर नन्ही सी कली और फिर निकलेगा एक दिन सुन्दर सा फूल।

मगर मंटू को शायद मेरी बात समझ नही आ सकी या मै मंटू की समझ तक जाकर उसको समझा नही पाया था।

मंटू का प्रश्न वहीं का वहीं था। बोला- लेकिन पापा मिट्टी के अंदर से ये कैसे बाहर आ पायेगा, इसके पास तो पैर भी नहीं हैं। और पापा ये अंकुर क्या होता है?

तभी मुझे याद आया कि शायद रसोई में कुछ अंकुरित मूंग अभी रखी हो, जो मै रोज सुबह लिया करता हूं।

मैने कहा- तुम यही रुको बेटा , मै बस एक मिनट में आता हूं।

सौभाग्य से रसोई में थोडी अंकुरित मूंग बची हुयी थी, मै अंकुरित मूंग के दाने लिये हुये जब गार्डेन आया तो देखा-  मंटू बोये हुये फूलों के बीजों को मिट्टी से निकाल कर उन पर पानी दे रहा था।

मैने पूछा- बेटा आपने ये बीज क्यो निकाल दिये, और इन पर पानी क्यो डाल रहे हो?

मंटू- पापा इनकी ना सांस अंदर रुक गई होगी, मै इसलिये इनको पानी पिला रहा हूं।

मुझे मन ही मन उसकी इस मासूमियत पर हंसी आ रही थी, मगर मंटू बहुत गंभीर था।

मैने कहा- ये तो आपने अच्छा किया, मगर आपको कैसे पता कि इनकी सांस अंदर रुक गई थी।

बेटा दरअसल, मिट्टी तो इनका घर होता है, और हवा पानी वैसे ही होते है जैसे तुम्हारे लिये हम और मम्मी है।

मिट्टी के अंदर तो यह अपने मम्मी पापा के साथ रहेगा, और फिर धीरे धीरे बडा होकर वापस निकलेगा, वैसे ही जैसे पहले तुम जब बिल्कुल छोटे से थे, अपनी मम्मा की गोद में ही रहते थे, अब थोडा बडे हुये हो ना, तो अब तो आप नही रहते ना मम्मा की गोद में।

आओ तुमको कुछ और दिखाता हूं, फिर एक हाथ में लिये हुये मूंग केअंकुरित दाने मैने उसको दिखाये।

पापा- ये देखो मंटू इसको कहते हैं अंकुर, जिसका मतलब होता है नन्हा सा। जैसे तुम हमारे अंकुर हो और यह मूंग का। आओ हम लोग फिर से इन बीजों को इनके घर पहुंचा देते हैं।

मै फिर से मिट्टी में बीज डालने लगा, इतने में मंटू ने जोर जोर से कहा - मम्मा मम्मा प्लीज यहां आओ ना....

आवाज सुन कर श्रीमती जी के गार्डेन आते ही मंटू ने कहा - मम्मा मम्मा, आज से ना मै मंटू नहीं, अंकुर हूं, है ना पापा, और फिर मेरी तरफ मुड कर मेरी स्वीकृति की प्रतीक्षा करने लगा।

गुरुवार, 6 जनवरी 2022

सूखा गुलाब

 


कितनी मुश्किलों से, हमे उसने भुलाया होगा

जली होगीं उगलियां, जब खत जलाया होगा

 

भूल जाने की कोशिशों में, जाने कितनी दफा

हंसी लम्हों को जेहन में, रो रो दोहराया होगा

 

छोड दी होगीं कई, पसंदीदा चीजें ओ जगहें

संग मेरे उसने जहां, दो पल भी बिताया होगा

 

मिटा दी होंगीं तकरीबन सभी, निशानियां लेकिन

कुछ एक को जतन से, कोह्नूर सा  छुपाया होगा

 

सुन के वो गीत जो कभी, साथ हमने गुनगुनाये

पल भर को तो मन, उस दौर टहल आया होगा

 

छिडें होगें जो कभी किस्से, गुजरे हुये जमानों के

जरूर चेहरा मेरा खयालों में, उभर आया होगा

 

रिमझिम बारिशों से लिपट जब जब भीगा ये मन

हुआ अहसास खिला गुलाब कहीं मुरझाया होगा

 

कुछ भुला देता है वक्त, कुछ हालात भुला देते हैं

यकीं फिर भी दुआओं में, मेरा जिक्र आया होगा

 

अरसे बाद इत्तेफाकन हो गया था आमना सामना

पलाश किस तरह हमें उसने, अंजान बताया होगा

मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

दद्दा

कितने बरस बाद आज वो अपने बडे दद्दा से मिलने जा रही थी। कब से मां बाऊ जी से सुनती आ रही थी दद्दा की सफलता की कहानियां। और आज जब उसका मुम्बई के एक नामी कालेज में दाखिला हुआ तो उसको दाखिले की खुशी से ज्यादा दद्दा से मिलने की खुशी थी।

दद्दा दरअसल कोई बुजुर्ग व्यक्ति नही, पैतीस चालीस के आस पास का नवजवान युवक था। बीस बाईस की उमर में ओमी कुछ काम की तलाश में मुंबई आ गया था और आज अपने अथक परिश्रम से मुंबई जैसे शहर में अपना खुद का एक फ्लैट खरीद लिया था। किसी भी तरह भी बुरी लत उसे उसी तरह ना छू सकती थी जैसे चंदन पर लिपटे सर्पों का असर नहीं होता। उसका स्वप्न कलाम की तरह एक बडा वैज्ञानिक बन कर देश की सेवा करना था, इसीलिये घर वालों के लाख समझानें के बावजूद उसने स्वयं को वैवाहिक बंधनों से मुक्त रखा था। चूंकि उस समय अपने परिवार और गांव के बच्चों में ओमी बडा था, इसीलिये सभी बच्चे उसे दद्दा बुलाते थे।

ओमी जितना पढाई लिखाई में होशियार था उतना ही स्वभाव से सौम्य। गांव का हर परिवार अपने बच्चों को ओमी जैसा बनाना चाह्ता था।

रजनी भी अपने ओमी दद्दा को अपना आदर्श मानती थी, उन्ही की तरह वो भी अपने गांव अपने परिवार का नाम रौशन करना चाहती थी। ये उसकी लगन और परिश्रम का ही परिणाम था कि उसे आई. आई. टी मुंबई में इजीनियरिंग के लिये दाखिला मिला था, घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी ना थी, और फिर ओमी सबसे लिये परिवार के सदस्य सा ही था, सो यह तय हुआ था कि रजनी को यहां गाडी में बिठा दिया जायगा, और आगे की सारी जिम्मेदारी संभालने के लिये ओमी स्टेशन पर आ कर ओमी को ले लेगा।

रजनी पहली बार घर से निकल कर इतनी दूर जा रही थी, मगर मन में डर के लिये लेषमात्र भी स्थान ना था। नन्ही आंखें, बडे बडे सपने देख रहीं थी।

गाडी जैसे ही मुंबई स्टेशन के प्लेट्फार्म पर पहुंची, खिडकी से ही रजनी ने ओमी को देख लिया।

एडमीशन की सारी औपचारिकतायें पूरी हो चुकीं थी। आई आई टी से ओमी का फ्लैट कुछ ज्यादा दूरी पर ना था। अतः ओमी के सुझाव पर रजनी के माता पिता ने रजनी को ओमी के फ्लैट पर रहने की बात स्वीकार कर ली।

घर परिवार गांव के सभी लोग एक तरफ ओमी की तारीफ करते ना अघाते थे, रजनी के माता पिता के लिये तो वह ईश्वर का साक्षात रूप था, जिसने बिना किसी लोभ लालच के उनकी हर संभव मदद की थी। रजनी के हॉस्टल की फीस बचने के कारण वो अपने छोटे बेटे को भी अच्छे स्कूल में पढा पा रहे थे, मगर इन सबके बीच एक शख्स था, जो दिन प्रतिदिन खुद से लडता था, हकीकत को भी बुरा स्वप्न समझने की कोशिश करता था, बेचैन मन मछली की तरह तडप कर रह जाता था, हर दिन कॉलेज जाते समय वापस ना आने का निर्णय करता, और शाम तक यह निर्णय पानी के बुलबुले सा टूट जाता। रजनी का अंतर्मन धीरे धीरे घुल रहा था, गल रहा था, टूट रहा था, क्योंकि वह एक ऐसी काल कोठरी में आ चुकी थी जो दुनिया की नजर में देवस्थल था, मगर सबका ग्राम देवता उसके लिये अब दद्दा नही सिर्फ दानव था।

अब उसका एक ही लक्ष्य था। समय के साथ अपनी उन शक्तियों को एकत्रित करना,  जिनसे वह इस दानव को पराजित कर अपनी स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के साथ साथ उसके इस रूप को अपनों को, समाज को दिखा सके क्योंकि वह भली भांति जानती थी कि यह समाज बहुत आसानी से चरित्रहीन पुरुष के दोषों को किसी भी मासूम निर्दोष लडकी पर आरोपित कर उसे कलंकिनी का खिताब देने की कला में निपुर्ण है।


शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

उसकी हर बात

 


खिल जाती खुशी सोच, उसकी हर बात

मासूम कलियों सी लगे, उसकी हर बात


जमाने भर की बात को, करके अनसुना

सुनी मदहोश हो हमने, उसकी हर बात

 

अधूरा हर अफसाना, उनके जिक्र बिना

हर बात का जवाब लगे, उसकी हर बात

 

बेदिली बनी सितम, इस दिले नादां पर

नश्तर सा चुभने लगी, उसकी हर बात

 

तूफां में पतवार तो, अंधेरों में चिराग सी

महफ़िलों की जान है, उसकी हर बात

 

दरवाजे बंद दिलों के, खुलते खुद ब खुद

खोई चाभियां हैं तालों की, उसकी हर बात

 

ना चाहने वाले भी, सुनते हैं उसे गुमसुम

सबकी अपनी बन जाती, उसकी हर बात

 

जाने जादू है, नशा है, या बचपन मासूम

रोते हुओं को हंसा देती, उसकी हर बात

 

मुंकिन नही दुखे दिल, उससे किसी का

सधी सी और सही भी, उसकी हर बात

 

यूं ही तो नहीं पलाश, तलबगार उनकी

खरी ओस की बूंद सी, उसकी हर बात

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