हर सुबह इक आस लिये
पढती हूँ अखबार ।
शायद आज ना छपा हो कोई
हत्या लूट का समाचार ॥
हर पेज पर मिल जाता नित्य
दुखद खबरों का अम्बार ।
शेयर से भी तेज बढता जाता
देश में अब व्याभिचार ॥
मौन खबरों में छुपी होती
चीख दर्द और हाहाकार ।
ताक पर धरे जा रहे
प्रतिदिन भारतीय संस्कार ॥
लड रहे संसद में नेता
बिखर रहे परिवार ।
पर आर्थिक पृष्ठ कहता
बढ रहा देश में व्यापार ॥
फिर भी यही आस लिये
पढती हूँ अखबार ।
शायद आज ना छपा हो कोई
हत्या लूट का समाचार ॥
चित्र के लिये गूगल का आभार
पलाश सिर्फ अपनी डाल पर लगता है और खिल कर धरती पर गिर जाता है। वह सिर्फ अपने लिए अपनी डाल पर ही सीमित रहता है। और डाल से अलग होते ही अपने अस्तित्व को समाप्त कर देता है। यही है उसका पूर्ण समर्पण उस डाल के प्रति जिसने उसको जीवन दिया ।
शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010
गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010
मुकद्दर की हकीकत
लाख हम चाहे हर सपना ,हकीकत बनता नही ।
जो मुकद्दर में न हो ,वो हासिल होता नही ॥
हालात कभी किसी के ,एक से रहते नही ।
कौन सा जख्म है , जिसकी दवा वक्त होता नही ।।
जिन्दगी में सिर्फ सुख मिलें, ये मुमकिन होता नही
अश्क के आये बिना तो ,खु्शियां भी पूरी होती नही ।।
जो मिला है हमें , वो भी कम तो नही ।
क्यों गिने वो जो , हाथ में आया ही नही ॥
अक्सर जो सोचते हैं, वो पूरा होता नही ।
और जो देता है खुदा, उसे हम सोच पाते ही नही ॥
माना मुड के देखने से वक्त को , मुकदर बनता नही
मगर मुकद्दर बनाने की खातिर बीता वक्त भूलना कभी नही
शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010
एक भूली बिसरी याद
कल मै अपनी माँ को अपना एक ब्लाग पढ कर सुना रही थी , तभी उनको अपनी लिखी एक रचना जो उन्होने आज से करीब चालीस साल पहले लिखी थी , आधी अधूरी सी याद आयी । और बहुत कोशिश के बाद उनको वो थोडी सी याद आयी और थोडी उन्होने कल लिखी । ये मेरा सौभाग्य है कि हम अपनी माँ की भूली बिसरी गजल को अपने ब्लाग पर लिख रहे है ..........
मालिक ने बनाया इंसा को
इंसा ने उसे मजबूर किया |
जब जी चाहा मचला कुचला
जब जी चाहा तब प्यार किया ||
जीने की तमन्ना हर दिल में
हर दिल में गुजारिश होती है |
जीवन के थपेडों को सह कर
मोहब्बत की ख्वाइश होती है ||
मालिक ने .................................
कहने को वफायें करते है
कुछ पाने को मैखानों में |
परदे के पीछे तो कुछ है
जानो उसको अनजानों में ||
मालिक ने.............................
पर सत्य कहे तो जीवन में
हर पल है एक खजाने मे |
चाहो तो उसे बर्बाद करो
चाहे रखो तहखाने में ||
मालिक ने ............................
इक सीख हमारी भी सुन लो
जीवन को सजाओ सपनों में |
सपनों को फिर साकार करो
तुम सफल रहोगे इस जीवन में ||
मालिक ने ..................
सोमवार, 18 अक्टूबर 2010
ऐसा क्यों होता है इस देश में ??
जून की तपती धूप में
वो बना रही थी मकान |
अपने कलेजे के टुकडे को
दे कर कुछ टूटा समान ||
उन पत्थर के टुकडों से
वो खेल रहा था ऐसे |
उसके हाथों में आया हो
कुबेर का खजाना जैसे ||
पर हाय ये क्या हुआ
वक्त को ये रास ना आया |
काला नाग बन करके
बालक के सामने आया ||
नजर पडी माँ की नाग पर
और मालिक की उस माँ पर |
दौडी वो बच्चे की तरफ
और मालिक झपटा उस पर ||
एक ही पल में विधाता नें
कैसा संग्राम रचाया |
उस बेचारी माँ को
ऐसा कठोर पल दिखलाया ||
उधर नाग ने डसा जीव को
इधर मानुष ने मानुष को |
हतप्रभ थे सभी देख वक्त की
ऐसी निष्णुर साजिश को ||
माना नाग से नही कर सकते
हम उम्मीदें मानवता की |
पर क्या ये उचित है कि तजे
इंसा मर्यादायें सब मानवता की ||
हाय ! बन क्यों जाता मानुष
इतना भीषण दानव |
क्या आने वाली पीढी कहेगी
कल सच में तुमको मानव ||
कैसे बन जाता है इंसा
हैवान इंसान के भेष में |
ईश्वर की इस धरती पर
ऐसा भी होता है इस देश में ||
वो बना रही थी मकान |
अपने कलेजे के टुकडे को
दे कर कुछ टूटा समान ||
उन पत्थर के टुकडों से
वो खेल रहा था ऐसे |
उसके हाथों में आया हो
कुबेर का खजाना जैसे ||
पर हाय ये क्या हुआ
वक्त को ये रास ना आया |
काला नाग बन करके
बालक के सामने आया ||
नजर पडी माँ की नाग पर
और मालिक की उस माँ पर |
दौडी वो बच्चे की तरफ
और मालिक झपटा उस पर ||
एक ही पल में विधाता नें
कैसा संग्राम रचाया |
उस बेचारी माँ को
ऐसा कठोर पल दिखलाया ||
उधर नाग ने डसा जीव को
इधर मानुष ने मानुष को |
हतप्रभ थे सभी देख वक्त की
ऐसी निष्णुर साजिश को ||
माना नाग से नही कर सकते
हम उम्मीदें मानवता की |
पर क्या ये उचित है कि तजे
इंसा मर्यादायें सब मानवता की ||
हाय ! बन क्यों जाता मानुष
इतना भीषण दानव |
क्या आने वाली पीढी कहेगी
कल सच में तुमको मानव ||
कैसे बन जाता है इंसा
हैवान इंसान के भेष में |
ईश्वर की इस धरती पर
ऐसा भी होता है इस देश में ||
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