सुनो,
अपना सामान बाँध लो
आया हूँ मैं, तुम्हे लेने
बस रख लो अपनी जरूरी चीजें
बाकी मिलता तो है सब कुछ तो वहाँ
एक बात बताऊं
यहाँ से बहुत
कई गुना अच्छी जगह है
अच्छा ये बताओ
कही जाने में तुमको
लग तो नही रहा डर
वैसे कुछ खास मतलब भी नही
इस सवाल का
और कोई ऑप्शन भी नही है
तुम्हारे पास
शायद तुम भी जानती होगी
वहाँ कोई भी सामान
ले जाने की
नही मिलती इजाजत
मगर फिर भी
तुम रख लो अपना
बिल्कुल जरूरी सामान
मगर हाँ
मै चेक कर लूंगा
रख रही हो तुम क्या क्या
अगर मुझे लगा कि
ये मिल जायगा वहाँ
तो निकाल दूंगा
दो मिनट के लिये
मुझे कुछ समझ ही नही आया
क्या रखूं, क्या न रखूं
कुछ भी न लगा
ले जाने योग्य
जिसे अर्पित कर सकती
प्रभू के चरणों में
कुछ भी न लगा
ले जाने योग्य
जिसे अर्पित कर सकती
प्रभू के चरणों में
उठ कर खडी हो गयी
और बोली
चलिये
वो बोले- ये क्या
तुमने कुछ भी नही की पैकिंग
मैं बोली- प्रभू
क्या करूंगी-
इस जहाँ के नश्वर सामान को
उस जहाँ में ले जाकर
कही हमारी तरह आप भी
न उलझाने लगे
अपने जीवन को
इन सामानों के बीच
और भूलने लगे
अमूल्य रिश्तों की कीमत
ये माया ही तो है
जो भटका देती है मन
कर देती है दूर
मानवता को मानव से
और हाँ कहाँ चल रही हूँ
ये माया ही तो है
जो भटका देती है मन
कर देती है दूर
मानवता को मानव से
और हाँ कहाँ चल रही हूँ
मै खाली हाथ
ले चल रही हूँ अपने साथ
अपने भले बुरे कर्म
मै भी बटाऊंगी
आपका हाथ
खोलने में
अपने कर्मों की पैकिंग
आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' ०५ फरवरी २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/
जवाब देंहटाएंटीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।
वाह
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर सृजन
सादर