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गुरुवार, 7 मार्च 2019

लो फिर आ गया महिला दिवस



ओह !
फिर चला आया महिला दिवस
फिर कुछ भाषण, कुछ संगोष्ठियां
कुछ प्रतियोगितायें, कुछ आयोजन
और फिर अन्त में, कुछ चिन्तन
जहाँ जताया जायगा खेद
महिलाओं की स्थिति पर
बताये जायेगें आँकडे
भ्रूण हत्या और बलात्कार के
कुछ गिरगिट बदल कर अपना रंग
लेंगे शपथ परिवर्तन की
कुछ मगरमच्छ बहायेगें आंसू
महिलाओं की दुर्दशा पर

नही बतायेगा कोई
कि वह भी है उसी समाज का हिस्सा
जो नही देने देता 
बराबरी तक का अधिकार
जो सिर्फ देखता है 
स्त्री में मादक देह
जिसके शब्दकोश में भरे हुये है
महिलाओं वाले अपशब्द
जो नही रोक पाता 
देहज लोलुपता
ओह !
फिर चला आया महिला दिवस
फिर सजेंगे कुछ मंच
फिर खिचेंगी कुछ तस्वीरे
फिर बनेंगे कु्छ स्लोगन
फिर सांझ ढलते ढलते
बिखर जायेंगा दिन भर का शोर
रात ढलते ढलते फिर हो जायेंगे
रोशन अंधेरे बाजार
जहाँ एक कोने में
सिमटी दुबकी निवस्त्र
स्वयं को बचाती दिखेगी
महिला दिवस की तकदीर

4 टिप्‍पणियां:

  1. नही बतायेगा कोई
    कि वह भी है उसी समाज का हिस्सा
    जो नही देने देता
    बराबरी तक का अधिकार
    जो सिर्फ देखता है
    स्त्री में मादक देह
    लाजवाब रचना...
    एकदम सटीक
    वाह!!!

    जवाब देंहटाएं
  2. और फिर चला गया फिर आने के लिये। सुन्दर।

    जवाब देंहटाएं
  3. रात ढलते ढलते फिर हो जायेंगे
    रोशन अंधेरे बाजार
    जहाँ एक कोने में
    सिमटी दुबकी निवस्त्र
    स्वयं को बचाती दिखेगी
    महिला दिवस की तकदीर
    यथार्थ ,बेहतरीन रचना ......

    जवाब देंहटाएं
  4. महिला दिवस से महिलाओं की तकदीर का फैसला नहीं होना है , ये तो बस मनाने के लिए है , अच्छी रचना

    जवाब देंहटाएं

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