मधुर
अपने विघालय का एक सीधा सादा, होनहार छात्र और माता पिता का आज्ञाकारी बेटा था, इसी
वर्ष उसके पिता अपने परिवार सहित गाँव से शहर नौकरी के लिये आये थे। जब उसके पिता को अपने साथ काम करने
वाले लोगो से पता चला कि सिटी मॉन्टेसरी लखनऊ के चुनिंदा विघालयों में से है तो उन्होने
मधुर का दाखिला वहीं कराने का निश्चय किया। शायद मधुर का भाग्य प्रबल था या उसके पिता
की इच्छा शक्ति, मधुर की माँ को जहाँ बर्तन सफाई का काम मिला वह सिटी मॉन्टेसरी की
प्रधानाचार्या का घर था। एक दिन जब दोनो पति – पत्नी ने उनसे हाथ जोड कर विनम्र निवेदन
किय तो उन्होने कहा- वृंदा, वैसे तो दाखिले का फार्म भरने की तारीख निकल चुकी है मगर मै फिर भी तुम्हारे बेटे के लिये फार्म दे दूंगी मगर यहाँ केवल फार्म भरने से दाखिला नही मिलता, उसके लिये इम्तेहान पास करना होता है। अगर तुम्हारा बेटा वो इम्तेहान पास कर लेता है तभी उसको दाखिला मिलेगा। और फिर वृंदा के पति को तरफ देखते हुये बोली, कल सुबह स्कूल आ जाना, मै फार्म दिला दूंगी।
उस रात पति पत्नी दोनो ही स्वप्न लोक में विचरण करते रहे क्योंकि ना तो वहाँ जाने के लिये कोई टिकट लेनी पडती है और न ही गति का बंधन होता हैं, मधुर के माता पिता भी आकांक्षाओ के
रथ पर सवार हो अपने बेटे के उज्जवल भविषय की कल्पना करने लगे किन्तु मधुर छोटा होते हुये भी
हकीकत से परिचित था, वह जानता था कि यह कोई आसान काम नही था, और उससे शाम को घर आते ही पिता जी ने कहा था - बच्चा सात रोज है, खूब मन लगा के पढ लेओ, मैडम जी के स्कूल में दाखिला मिल गया तो जिन्दगी बन जाई। भले ही उसने सिटी मॉन्टेसरी का नाम नही सुना था मगर उसे पता
था कि गांव के मुखिया जी का लडका जिसे सारे गाँव में सबसे तेज मना जाता था उसे पिछले
साल मुखिया जी ने शहर के स्कूल में दाखिले के लिये पूरे छः महीने कोचिंग कराई थी, मगर
फिर भी उसे कही दाखिला नही मिला था, और फिर उसे वही गाँव के स्कूल में भर्ती कराया
गया था। फिर भी मधुर ने हार न मानने का निश्चय करते हुये अपनी पढाई शुरु की। वह अपने
माता पिता की कोशिश को व्यर्थ जाने नही दे सकता था।
परीक्षा
देने के बाद मधुर कुछ कुछ आश्वस्त तो था किन्तु पूर्णतया विश्वस्त नही। अक्सर वह अपनी माँ के
साथ ही चला जाता था, व घरों में काम करते माँ का यथासम्भव हाथ बटाता था। परीक्षा के
बाद का एक एक दिन सब लोग गिन गिन कर काट रहे थे। उसकी माँ रोज सोचती की आज बडी मैडम
से वह पूछेगी कि परिणाम कब आया, मगर फिर सोचती कि कही उनको बुरा न लगे, वो जब आयगा
तो खुद ही बता देंगी। आज जब वॄंदा काम करके घर जाने लगी तो अरुन्धती ने रोकते
हुये कहा- वॄंदा आज तुम्हारे मधुर का रिजल्ट आ गया। बडी उत्सुकता से वॄंदा बोली मैडम
जी मिल जायगा न मधुर को दाखिला। वॄंदा की आंखों में उभर आयी चमक को देखकर प्रिन्सिपल
मैडम जो विघालय में एक तेज तर्राक, और हदयहीना महिला समझी जाती थी, यह साहस नही कर
पा रही थी कि कैसे मै इस माँ और बच्चे की आशाओं के दिये को अपने निर्मम उत्तर से बुझा
दूँ। तभी उस अनपढ वॄंदा को समझ आ गया कि उसके सपनों के पंख कट चुके है, बहुत धीरे से
अपने बेटे के सर पर हाथ सहलाती हुयी बोली- मैडम जी क्या बहुत खराब परचा किया था मेरे
बेटे ने। नही वॄंदा खराब नही किया था, तुम्हारा बेटा होशियार है, मगर हम अपने स्कूल
के नियम नही तोड सकते, मघुर को परीक्षा में जितने नम्बर चाहिये था, उसमे एक नम्बर कम
रह गया। तुम चिन्ता मत करो, मै किसी और स्कूल मे तुम्हारे बेटे का दाखिला करवा दूंगी।
मधुर चुपचाप खडा बाते सुन रहा था, उसका मन भी निराश हो गया था, इस बात से नही कि वह
परीक्षा पास नही कर सका था , उसे इस बात पर खेद हो रहा था कि उसने अपने माता पिता की
कोशिश बेकार कर दी, तभी उसकी आंखे चमक उठी, वह प्रिन्सिपल मैडम थोडा निकट जा कर बोला-
मैडम जी क्या आप एक नम्बर मेरी कोशिश को भी नही दे सकती। अरुन्धती उस बच्चे की बात
का मतलब न समझ पाई- बोली बेटा कोशिश तो सभी बच्चे करते है न, मगर नम्बर तो कॉपी में
लिखने के मिलते है न।
मधुर
ने भी जैसे आखिरी तक हार न मानने का निश्चय कर लिया था- बोला जी मैडम जी आप सही कह रही है, मगर बहुत सारे बच्चों ने तो इस इम्तेहान के लिये कोचिंग की थी, उनमे से कई
बहुत से अच्छे स्कूलों से पढकर भी आये थे, और मैडम जी अगर मै गाँव से एक महीने पहले भी
आ जाता न, तो मै सच कहता हूँ, मै और अच्छे नम्बर ले कर आता। और फिर बिल्कुल रुआसा सा होकर
बोला- मैडम जी मेरे पास तो पढने के लिये अच्छी वाली किताबे भी नही थी।
अरुन्धती
अब तक समझ चुकी थी कि ये नन्हा सा मधुर उसे वो बात समझा चुका था जो वह स्वयं अपने जीवन के पचपन
बर्षो से भी नही समझ सकी थी।
बस
इतना बोली- वॄंदा तुहारा बच्चा वाकई होनहार भी है और समझदार भी, और ऐसे बच्चे को मै
जरूर अपने स्कूल में पढाउंगी।
ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 19/06/2019 की बुलेटिन, " तजुर्बा - ए - ज़िन्दगी - ब्लॉग बुलेटिन“ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रस्तुति का लिंक 20.6.19 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3372 में दिया जाएगा
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
आपकी लिखी रचना "पाँच लिंकों का आनन्द" में गुरुवार 20 जून 2019 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंव्वाहहहह..
जवाब देंहटाएंसादर..
मधुर वाकई समझदार ह़ै...
जवाब देंहटाएंअच्छी कहानी.
सुन्दर प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंवाह!!बहुत खूब!
जवाब देंहटाएंअच्छी कहानी।
जवाब देंहटाएंसार गर्भित मन को छू लेने वाली कहानी मूल्यों से भरी।
जवाब देंहटाएंअच्छी कहानी
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर ! इस पहलू से भी तो सोचा जाना चाहिए।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर और सार्थक।
जवाब देंहटाएंसुन्दर प्रस्तुति।
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