प्रशंसक

बुधवार, 24 मार्च 2021

बात

 


बाते, खिला सकती है, मुरझाई बगिया

बाते दे देती कभी न भरने वाला घाव

सुनी थी माँ से बचपन में एक कहावत

बातन हाथी पाइये, या बातन हाथी पाव

बात का बन भी सकता है बडा बतंगड

बात बात में बन भी जाती उलझी बात

बातों ही बातों में अक्सर जुड जाते दिल

जब बात-बात में बन जाती किसी से बात

हाँ बात के नही होते यूं तो सिर या पैर

मगर निकलती तो दूर तलक जाती बात

कहती पलाश सबसे सौ बात की इक बात

सोच समझ कर सदा कहो किसी से बात

13 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 25-03-2021 को चर्चा – 4,016 में दिया गया है।
    आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।
    धन्यवाद सहित
    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" ( 2078...पीपल की कोमल कोंपलें बजतीं हैं डमरू-सीं पुरवाई में... ) पर गुरुवार 25 मार्च 2021 को साझा की गयी है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. Ravindra ji, Aap kaise hai? thank you so much for giving me place in "Paanch links ka Anand"

      हटाएं
  3. बात की बात में कितनी अच्छी बात कह डाली ।

    जवाब देंहटाएं
  4. Thank you so much Maa'm, Aapka blog par aana hamesha mere liy sudhad hota hai.
    Thanks for your blessings

    जवाब देंहटाएं
  5. रहिमन जिव्हा बावरी, कहिगी सरग पताल।
    आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥

    जवाब देंहटाएं
  6. बात का सटीक सही आकलन करती सार्थक रचना।

    जवाब देंहटाएं

आपकी राय , आपके विचार अनमोल हैं
और लेखन को सुधारने के लिये आवश्यक

GreenEarth