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सोमवार, 22 मार्च 2021

नही फायदा यहां समझाने का



अब वक्त नहीं मिलता

लोगों को मिलने मिलाने का

जाने कहां रिवाज गया

हाल पूछने को घर आने का

हो जाती हैं मुलाकातें,

हाथ मिलते हैं गले 

जाने खोया कहां अदब

चाय पर घर बुलाने का

उलझाना सुलझी लटों को

उतारना अरमान पन्नों पर

काश दौर वो लौट आए

तकियों में ख़त छुपाने का

आती नही खुशबू खानों की

अब पडोस के रसोईखानों से

दावतों का बदला चलन, गया

मौसम बिठाकर खिलाने का

अदबो लिहाज पिछडेपन की

निशानियां हुयी हैं जब से

दुआ सलाम गुमनाम हुये

हाय बाय से काम चलाने का

पलभर में गहरा इश्क हुआ

पल में ताल्लुक खत्म हुये

पल में फिर दिल लगा कही

है वक्त नही अश्क बहाने का

सच में आधुनिक हुये है या

जा रहें अंधेरी गर्त में सब

जी पलाश तू अपने लहजे से

नही फायदा यहां समझाने का 

15 टिप्‍पणियां:

  1. ये आधुनिकता नहीं ज़रूरत है
    गले लगने से कोरोना का डर है .
    दूर से ही खुश हो लिया कीजिये ये सोच कर
    कि रहे जिंदा तो तो खुश हो लेंगे गले मिल कर .

    अच्छी प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (24-03-2021) को   "रंगभरी एकादशी की हार्दिक शुफकामनाएँ"   (चर्चा अंक 4015)   पर भी होगी। 
    --   
    मित्रों! कुछ वर्षों से ब्लॉगों का संक्रमणकाल चल रहा है। आप अन्य सामाजिक साइटों के अतिरिक्त दिल खोलकर दूसरों के ब्लॉगों पर भी अपनी टिप्पणी दीजिए। जिससे कि ब्लॉगों को जीवित रखा जा सके। चर्चा मंच का उद्देश्य उन ब्लॉगों को भी महत्व देना है जो टिप्पणियों के लिए तरसते रहते हैं क्योंकि उनका प्रसारण कहीं हो भी नहीं रहा है। ऐसे में चर्चा मंच विगत बारह वर्षों से अपने धर्म को निभा रहा है। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --  

    जवाब देंहटाएं

  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 24 मार्च 2021 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  4. अदबो लिहाज पिछडेपन की
    निशानियां हुयी हैं जब से
    दुआ सलाम गुमनाम हुये
    हाय बाय से काम चलाने का
    सुंदर व्यंग्य१--ब्रजेंद्रनाथ

    जवाब देंहटाएं
  5. पलभर में गहरा इश्क हुआ

    पल में ताल्लुक खत्म हुये

    पल में फिर दिल लगा कही

    है वक्त नही अश्क बहाने का

    बस,लिखों फेकों का जमाना है,कहाँ से ठहराव मिलेगा। हम बचपन के पहली पेन जो पापा देते थे वो भी संभलकर रखते थे
    अब उस जमाने वाले हम कहाँ समझ पाएंगे आज का चलन ,सुंदर भावाभिव्यक्ति ,सादर

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत खूब , सच ही है आदमी के पास आदमी को देने के लिए वक्त नही,हर बात पते की, बहुत ही सुंदर पलाश जी

    जवाब देंहटाएं
  7. Jyoti ji,
    Thanks for visiting and appreciation for writing

    जवाब देंहटाएं
  8. उत्तर
    1. ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत एवं मनोबल बढ़ाने के लिए बहुत बहुत आभार

      हटाएं
  9. पलभर में गहरा इश्क हुआ
    पल में ताल्लुक खत्म हुये
    पल में फिर दिल लगा कही
    है वक्त नही अश्क बहाने का
    वाह...बहुत खूब

    जवाब देंहटाएं

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