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सोमवार, 22 मार्च 2021

नही फायदा यहां समझाने का



अब वक्त नहीं मिलता

लोगों को मिलने मिलाने का

जाने कहां रिवाज गया

हाल पूछने को घर आने का

हो जाती हैं मुलाकातें,

हाथ मिलते हैं गले 

जाने खोया कहां अदब

चाय पर घर बुलाने का

उलझाना सुलझी लटों को

उतारना अरमान पन्नों पर

काश दौर वो लौट आए

तकियों में ख़त छुपाने का

आती नही खुशबू खानों की

अब पडोस के रसोईखानों से

दावतों का बदला चलन, गया

मौसम बिठाकर खिलाने का

अदबो लिहाज पिछडेपन की

निशानियां हुयी हैं जब से

दुआ सलाम गुमनाम हुये

हाय बाय से काम चलाने का

पलभर में गहरा इश्क हुआ

पल में ताल्लुक खत्म हुये

पल में फिर दिल लगा कही

है वक्त नही अश्क बहाने का

सच में आधुनिक हुये है या

जा रहें अंधेरी गर्त में सब

जी पलाश तू अपने लहजे से

नही फायदा यहां समझाने का 

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