अब वक्त नहीं
मिलता
लोगों को मिलने
मिलाने का
जाने कहां रिवाज
गया
हाल पूछने को
घर आने का
हो जाती हैं मुलाकातें,
न हाथ मिलते
हैं न गले
जाने खोया कहां
अदब
चाय पर घर बुलाने
का
उलझाना सुलझी लटों को
उतारना अरमान पन्नों
पर
काश दौर वो लौट
आए
तकियों में ख़त
छुपाने का
आती नही खुशबू खानों की
अब पडोस के रसोईखानों से
दावतों का बदला चलन, गया
मौसम बिठाकर खिलाने का
अदबो लिहाज पिछडेपन की
निशानियां हुयी हैं जब से
दुआ सलाम गुमनाम हुये
हाय बाय से काम चलाने का
पलभर में गहरा इश्क हुआ
पल में ताल्लुक खत्म हुये
पल में फिर दिल लगा कही
है वक्त नही अश्क बहाने का
सच में आधुनिक हुये है या
जा रहें अंधेरी गर्त में सब
जी पलाश तू अपने लहजे से
नही फायदा यहां समझाने का