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गुरुवार, 17 मार्च 2011

बिन आसूं रोया ये मन



आज बहुत उदास है ये मन

बिन आसूं ही रो रहा ये मन


काँच से नाजुक रिश्तों को

कितना मैने संभाला था

दुनिया की बुरी निगाहों से

उसको मैने बचाया था

मगर लगा उसको तो

किसी अपने का ही ग्रहण

आज बहुत……………..


पल भर मे ही लगा कि जैसे

रानी से भिखारिन हो गये

बिन अपराध किये ही तो

हर नजर के अपराधी हो गये

जीते जी ही कर डाला

उसने मेरे भावों का तर्पण

आज बहुत ……….


फिर भी जीवन निर्मम इतना

सासों को नही है त्याग रहा

जाने क्यों अब भी आखों में

उसके ख्वाबों को पाल रहा

बचा ही क्या है जो कर दे

अब उसके चरनों में अर्पण

आज बहुत…………………..



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