आज बहुत उदास है ये मन
बिन आसूं ही रो रहा ये मन
काँच से नाजुक रिश्तों को
कितना मैने संभाला था
दुनिया की बुरी निगाहों से
उसको मैने बचाया था
मगर लगा उसको तो
किसी अपने का ही ग्रहण
आज बहुत……………..
पल भर मे ही लगा कि जैसे
रानी से भिखारिन हो गये
बिन अपराध किये ही तो
हर नजर के अपराधी हो गये
जीते जी ही कर डाला
उसने मेरे भावों का तर्पण
आज बहुत ……….
फिर भी जीवन निर्मम इतना
सासों को नही है त्याग रहा
जाने क्यों अब भी आखों में
उसके ख्वाबों को पाल रहा
बचा ही क्या है जो कर दे
अब उसके चरनों में अर्पण
आज बहुत…………………..
