अब तो मुस्कराना भी गुनाह सा होने लगा,
कातिल मेरी हसीं को जमाना कहने लगा ।
जो खुली जुल्फ लिये आये महफिल में हम
कोई सावन की घटा कोई जंजीर कहने लगा ।
हौले से ही तो खनकी थी नांदा पायल मेरी,
जिसे देखिये इसे हुस्न की अदा कहने लगा ।
हवा के झोकें ने लहराया जो पीला आंचल,
भंवरा हो जाने को बेताब हर कोई होने लगा ।
ना पूंछा किसी ने हाले दिल पलाश से कभी,
रंग उसके चुरा सिर्फ मन अपना भरने लगा ।