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रविवार, 11 जनवरी 2015

कहने लगा

अब तो मुस्कराना भी गुनाह सा होने लगा,
कातिल मेरी हसीं को जमाना कहने लगा ।

जो खुली जुल्फ लिये आये महफिल में हम
कोई सावन की घटा कोई जंजीर कहने लगा ।

हौले से ही तो खनकी थी नांदा पायल मेरी,
जिसे देखिये इसे हुस्न की अदा कहने लगा ।

हवा के झोकें ने लहराया जो पीला आंचल,
भंवरा हो जाने को बेताब हर कोई होने लगा ।

ना पूंछा किसी ने हाले दिल पलाश से कभी,
रंग उसके चुरा सिर्फ मन अपना भरने लगा ।

बुधवार, 28 मार्च 2012

दिल से निकली कुछ बाते, जो पन्ने में लिखीं तो गजल बन गयी


शमा कहती नही, खामोश रहकर, मिटती रहती है,
पिघलती मोम ही, उसके, जख्मों की कहानी है ॥

भले मिटना ही है उसके, हाथों की लकीरों में,
मगर सच ये भी कि वो ही, उजालों की निशानी है॥

मोहबब्त में, खुशी की ख्वाइशें, हर कोई रखता है,
मगर ये इश्क का दरिया, तो दर्दों की सुनामी है॥

नही होती मोहब्ब्त सिर्फ, वादों या इरादों से,
बजार- ए - इश्क में कीमत, तो इसकी भी चुकानी है॥

नही होता कोई अब तो दीवाना, मजनूं के जैसा,
मोहब्बत अब नही दिल की, दिमागों की जुबानी है ॥

जमाने में सभी यूँ तो, है दावा प्रेम, का करते,
कई सरकारी वादों से, किसी दिन टूट जानी है ॥

वही बचता है जो, बेखौफ हो, डुबकी लगाता है,
जो बच बच के, उतरता है, खत्म उसकी जवानी है॥
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