मित्र तुम्हे परिभाषित करने का
सामर्थ्य नही मेरी कलम में ।
ये तो जज्बातों का संगम है
जिसमें अविरल विश्वास की धारा बहती है॥
चाह रहा है आज मेरा मन
मित्र तुम्हे उपहार मै कुछ दूँ ।
कोई भौतिक वस्तु नही
अमिट असीमित प्यार तुम्हे दूँ ॥
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बुना था, जो तुम संग सपना ,
नदी किनारे रेत का हमने
बनाया था छोटा सा घर अपना ,
सोच रहा हूँ, मिल कर फिर से
उन सपनों का विस्तार तुम्हे दूँ ॥
चाह रहा है आज...........................
इक सदी सी, गुजर गयी मिले हुये
दुनिया दारी की हैं, बहुत सी उलझन ,
मगर आज दिल कहता, जी ले फिर
खोया हुआ वो, प्यारा अल्लड बचपन ,
धुँधला गये है जो ,यादों के घरौदें
मिलकर, एक नया आकार उन्हे दूँ ॥
चाह रहा है आज...........................
एक अनोखी अदभुद सी, पर दिल की
सुन बात बतलाता हूँ मै तुमको ,
सुख में, अनगिनत रिश्ते साथ थे पर
कठिनाइयों में बस, निकट पाया तुमको ,
दूर होकर भी तुमने, सदा बाँटी तकलीफे
आज अपनी खुशियों का संसार तुम्हे दूँ ॥
चाह रहा है आज...........................
इस जग से सबको मिल जाये ।
पर मिले ना जब तक सच्चा साथी
कुछ कमी - कमी सी रहती है ॥