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मंगलवार, 17 मार्च 2015

संतुष्टि


पिछले एक घंटे से मै अपनी बालकनी मे बैठी सामने पार्क में लगे पेडों पर इधर से उधर घूमते चिडिया के एक जोडे को देख रही थी। वो कुछ देर पहले एक साथ एक डाल पर बैठे थे। उनमें से एक, कुछ दूर के दूसरे पेड पर जा बैठी, अगले ही पल दूसरी चिडियां भी पहले के पास ही जा उडी मगर कुछ दूर वाली डाल पर बैठ गयी, फिर थोडी देर में पहली वाली उसके बिल्कुल समीप आ कर बैठ गयी। दोनो चिडियों की गतिविधि देखने से ये तो तय था कि इनमे से एक चिडा था, प्रकृति में ऐसा आकर्षण विपरीत लिंग में ही देखा जा सकता है। शायद दोनो मे बीच कुछ प्यारा सा मनुहार चल रहा था। उनको देखते देखते ऐसा लगने लगा जैसे उनमें से एक मैं और दूसरा आकाश है। काश ये सच हो पाता, कितने निर्बाध और स्वच्छंद हो वो एक दूसरे से भावनाओं का आदान प्रदान कर रहे थे। उन्हे देखते देखते मुझे मनुष्य होने का दुख होने लगा। कितने पहरे कितनी बाधायें है। यहाँ प्रेम करना एक अपराध सा लगता है, आकाश से मिलने के लिये मुझे कितने जतन करने पडते हैं। सहसा मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि मैं उनकी बातों को सुन व समझ सकती हूँ, एक चिडिया दूसरे से कह रही थी- ये मनुष्य जीवन भी कितना अच्छा होता है, छोटा हो या बडा , ये अपना एक घर तो बना पाते है, उसकी सुरक्षा तो कर पाते हैं, एक हम हैं चाहे जितनी मेहनत से हम अपना घरौंदा बनाये मगर जब सुबह को उससे निकलते हैं तो शाम को लौटते समय ये भी नही पता होता कि वो बचा भी होगा, या किसी ने अपने घर की सफाई से समय उसको भी साफ कर दिया होगा। काश कि हम मनुष्य होते तो साथ साथ बिना किसी भय के रह सकते। चलो शाम हो रही है चलते है, और देखते है कि हमे हमारा घर आज सकुशल मिलता है या नही, कहते हुये दोनो पश्चिम दिशा की तरफ उड गये। मैने थोडा और ऊपर को आकाश की तरफ देखा, सूरज भी पश्चिम की गोद में छुप कर चाँद को आने का न्योता दे रहा था। शाम के ढलते ढलते मेरे मन का नैराश्य भी जा चुका था, और मनुष्य होने पर पहले से ज्यादा खुशी का अनुभव हो रहा था।
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