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गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

काश और शायद


काश और शायद
शब्द हैं, कुछ ना हो पाने के
फर्क है, सिर्फ अहसासों का
एक में नाउम्मीदी का कफन
दूजे में उम्मीद की सूरत दिखती है

काश! मुझे वो मिल जाते
शायद, वो मुझको मिल जाये
एक में ना मिल पाने का दुख
दूजे में मिलने की आस झलकती है

काश ! ऐसा हो जाता
शायद ऐसा हो जाय
एक में हताशा निराशा
दूजे में कर्मठता की राह निकलती है

काश ! ये दिन बदल जाते
शायद ये दिन बदल जाये
एक में जीवन की अन्तता
दूजे में अनन्त जिन्दगी मिलती है

काश डुबाये अन्धकार में
शायद भोर का तारा है
एक काल चक्र में खोया
दूजे में गति की कल्पना संवरती है

काश है वो परछाई जो
पीछे पीछे चलती है
शायद ऐसा साया जिसमें
आगे बढने की इच्छा पलती है

काश और शायद तो
दो पहलू है जीवन जीने के
एक कहता और भरता आहे
दूजे में हौंसलों की पिटारी खुलती है
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