क्यो नही रुकता ये सिलसिला
सिलसिला जिसमें चले जाते है सब
धरम की आड में बिना समझे
एक अन्धेरी खोखली गली
सिलसिला जिसमें दिखता है बस
पागल पागलपन और जुनून
बहाने को खून की नदी
सिलसिला जिसमें मिटता है सच
धन बल सत्ता की तलवार पर
सिसकती रह जाती है जिन्दगी
सिलसिला जो कर रहा है संतुष्ट
भूखे वहसी भेडियों की हवस
लूट कर अस्मिता, लाचारी, तिजोरी
सिलसिला जो संकेत है विनाश का
तोड देगी किसी दिन अपना दम
जलती धरती बिलखती मनुजता
सिलसिला कोई तो रोक लो
मनुष्य के दानव बनने का
या बना ही दो, धरा को दानवग्रह