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बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

मुलाकात के बाद


इक मुद्दत के बाद
जब उनसे मुलाकात हुयी

जुबाँ पे एक भी
लफ्ज ना पाया हमने.....

खुशी से आँखे नम
हुयी कुछ इस तरह

जैसे तपती रेत पर
ओस को पाया हमने......

माँग रही थी खुदा से
खुशी चंद लम्हात की

दीदार से तमाम उम्र का
बेशुमार सुकू पाया हमने....

ख्वाब जो हर रात
संजोती थी पलकों तले

हकीकत की जमीं पर
नूर सा पाया हमने.....

खुदा ठुकराता नही
सच्चे दिलों की दुआ

इस बात पर अब यकीं
खुद को दिलाया हमने....

सोमवार, 23 जनवरी 2012

मृत्यु के पार


मिलता नही अवसर कि

देखे कभी मृत्यु के पार,

जीते जी ना कर पाया कोई

मृत्यु से साक्षात्कार,

यूँ तो कहते है सब

कुछ नही मृत्यु के बाद,

पर दो पल हों तो चलो

मेरे संग आज मृत्यु के पार,

जीवन खत्म नही होता है

तन से प्राणों के जाने से,

माना आखँ नही खुलती है

चिर निद्रा में सो जाने से,

पंचतत्व* से ही बनते हम

ये तो सभी मानते हैं ,

छोड के जाना पंच तत्वों ** को

 ये सब नही जानते हैं,

अनन्त उम्र का जीवन

राह देखता खडा मृत्यु के पार,

पर सच्चे जीवन को ही मिलता

अनन्त जीवन का उपहार,

सबको मिलता नही अवसर कि

जाये मृत्यु के पार,

मर कर भी कर पाये वो

जीवन से साक्षात्कार .................

*नभ , जल , वायु, अग्नि, धरती

** विचार , शब्द , आचार , व्यवहार ,कर्म

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

कभी कभी.....


कभी कभी भीड भरे मंजर में दिल तनहा रह जाता ,
कभी कभी चाह कर भी मन कुछ कह नही पाता ॥

कभी कभी दूर, बहुत दूर जाने को मन व्याकुल हो जाता,
कभी कभी खुद को भूला देने को, दिल बेकरार हो जाता ॥

कभी कभी बिन बात ही बेवजह ,आसूँ छलक जाता ,
कभी कभी खुद में सिमट के दिल रोने लग जाता ॥

कभी कभी दुनिया मे हर शख्स पराया सा हो जाता,
कभी कभी अपना वजूद भी बेगाना लगने लग जाता ॥

कभी कभी दिल कितना कुछ, चुपके से सह जाता
कभी कभी इक लफ्ज, विषबुझे तीर सा चुभ जाता ॥

कभी कभी लाख कोशिशों पर ,कुछ याद नही आता,
कभी कभी कोई लम्हा, उम्र भर भी भूल नही पाता ॥

कभी कभी इम्तेहां-ए जिन्दगी, खत्म नही होता ,
कभी कभी कोई खुद ही, इक इम्तेहां बन जाता ॥

कभी कभी सब पा कर भी, हाथ खाली रह जाता ,
कभी कभी सब लुटाने पर भी, दामन भर जाता ॥

कभी कभी सावन, निष्ठुर बन आग लगा जाता

कभी कभी तपता रेगिस्तां भी, ना बैरी बन पाता

कभी कभी ख्वाब, इक ख्वाब बन कर रह जाता,

कभी कभी तकदीर से, बहुत ज्यादा मिल जाता ॥

कभी कभी...........................

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

अपना शहर ……


अजनबी शहर में अपना शहर याद आया |
उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||

जब देखा गली पे बच्चों को खेलते क्रिकेट,
और फिर अपने ही शीशे के टूटने की आवाज |

अपने बचपन का सुहाना दौर याद आया,
उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||


मिला सब यहाँ जो मिला ना था अब तक,

इस शहर ने हर सपने को बनाया हकीकत |

हर उडान पे वो पतंग का उडाना याद आया ,
उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||


घूमा बहुत मैं और देखी भी बहुत दुनिया,

सपनों की नगरी से लगे बहुत से नगर |
पर अपने शहर सा  कोई भी ना शहर पाया,

उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||


सोचते थे प्यार लोगों से होता है जगह से नही,

समझे तब जब उससे मीलों दूर हम आ बैठे |

उसकी मोहब्बत में खुद को जकडा पाया,

उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ||

उसकी हर गली हर एक मोड याद आया ...........
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