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शुक्रवार, 12 जून 2020

अच्छी नहीं



ये जिन्दगी है, जंग का मैदान नहीं।
हर बात में यूं जीत हार अच्छी नहीं॥

मिलते हैं रिश्तें, बहुत खुशनसीबी से।
बात बात पर ये तकरार अच्छी नहीं॥

मना लो हर दफा, जिनसे तुझे चाहत।
दरम्यां दिलों के ये दीवार अच्छी नहीं॥

अहमियत वक्त की पहचान वक्त पर।
किस्मतों की सदा दरकार अच्छी नहीं॥

ना हाथ बढाओ गर दिल नहीं मिलता।
फरेबी कसमों की फुआर अच्छी नहीं ॥

फिक्रमंदी का दिखावा है किसके लिये।
आवाम कह रही सरकार अच्छी नहीं ॥

जिस दर ना हो कद्र तेरे अरमानों की।
पलाश उस ठौर इज़्तिरार अच्छी नहीं॥

** इज़्तिरार= अकुलाहट

रविवार, 7 दिसंबर 2014

कुछ रंग जिन्दगी के


जाने कैसे बना देते हैं लोग
ह्र्दय भी पाषाण का
पिघलना तो दूर
एक लकीर तक नही खिंचती मनुष्यता की

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कोई बना दे यंत्र
जो पहचान सके
सच्चे और झूठे जज्बात
कि बहुत लुटा चुका
सहद्यता के मोती
चील कौंवों  में

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वो क्या समझेंगें
मेरे होने ना होने का मतलब
जिनके लिये
प्यार एक उम्र नही
 है मात्र एक पल खुशी का

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जगह भी वही
मै भी हूँ वही
दिन रात सुबह शाम
सब कुछ तो है वैसा ही
जाने क्या बदला
मैं आदम से खुदा हो गया

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जिसे फेंक दिया
किसी ने
यूं ही कुछ सोचे बिना
कुछ और नही
किसी की जिन्दगी थी,
भूख थी
किसी तडपते
पेट की।
और थी आस,
एक रात जिन्दगी में
भरपेट खा कर सोने की






गुरुवार, 6 नवंबर 2014

इक पागलखाना चाहिये


जिन्दगी जीने के लिये
इक पागलखाना चाहिये

कोई बन्धन नही, रस्में नही
रीति नही, जाति नही
सफलताओं असफलताओं के
तराजू मे तौला हुआ इंसा नही
मन से मन मिल जाय
एक ऐसा पागल चाहिये
जिन्दगी जीने के लिये
इक पागलखाना चाहिये

अपने ही जहाँ अपने ना हो
पराये भी पर अपने से हो
अदृश्य सी दीवारे ना हो
बंधे हुये जहाँ सपने ना हो
बेफिक्र सी इस जिन्दगी को
पागल सा एक पल चाहिये
जिन्दगी जीने के लिये
इक पागलखाना चाहिये

जाने कितनी जंजीरों में
खुद को बाँधे हम रहे
जीते रहे सबके लिये
और खुद को ही खोते रहे
खामोश हो चले इस दिल को
पागल सी धडकन चाहिये     
जिन्दगी जीने के लिये
इक पागलखाना चाहिये

ये भला है, ये बुरा है
ये है नही तुम्हारे लिये
ऐसे अनगिनत धागों से ही
उलझी जिन्दगी बुनते रहे
खोलने को मन् की ग्रंथियां
थोडा पागलपन तो चाहिये
जिन्दगी जीने के लिये
इक पागलखाना चाहिये





गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

उधार की जिन्दगी... A Borrowd Life



रेल की पटरी पर ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार से दौड रही थी, और घोष उस पटरी पर अपनी जिन्दगी की रफ्तार को खत्म करने के लिये उस पर अपनी पूरी रफ्तार से दौड रहा था, कि विघुत गति से एक हाथ अचानक आया और वो पटरी से अलग आ गया।
घोष- आपने मुझे क्यों बचाया, मै जीना नही चाहता, मुझे मरना है, आप मुझे छोड दीजिये..
अजनबी- मगर मुझे आपसे कुछ चाहिये जो सिर्फ आपके ही पास है,
घोष- मगर मैं तो आपको जानता तक नही, और फिर मुझसे आप क्या लेना चाहती हैं
अजनबी- उधार की जिन्दगी, मुझे आपकी जिन्दगी चाहिये, बस कुछ दिन की, फिर आप शौक से मर सकते हैं,
घोष- उधार की जिन्दगी, जिन्दगी भी उधार में दी जा सकता है क्या....
अजनबी- जी हाँ , बिल्कुल दी जा सकती है।बस आज से आप ये सोच कर मत जीना कि आप जी रहे हैं आप आज से मेरे लिये मेरी दुनिया में जियेंगें
घोष- मगर आप ऐसा कैसे सोच सकती हैं कि मै आपकी बात मानूंगा ही, मुझे जाने दीजिये मुझे मरना है
अजनबी- तो आप मान लीजिये ना कि आप मर चुके हैं, और ये आपका नया जन्म है....
घोष- कुछ देर चुप रहने के बाद , चलिये ठीक है मान लेता हूँ, बताइये मुझे कहाँ चलना है
अजनबी- आप मेरे साथ चलिये.....
फिर घोष बाबू, उस अजनबी के साथ रहने लगते हैं
चार महीने बाद..........
फिर वही रेल की पटरी है .............
अजनबी- घोष बाबू आज आप मर सकते हैं मगर जीते जी मैं आपका ये कर्ज नही भूल पाऊंगीं, आपने मुझे मेरे जीवन को एक गति दी है, आज आपसे मैं एक बात कहना चाहती हूँ , मुझे ब्लड कैसर है, उस दिन जिस दिन हमने आपको बचाया था, मैं अपना घर छोड कर यहाँ आयी थी, क्योकि मै रोज हर पल मरना नही चाहती थी, अपनों की आंखों में हर पल मौत का खौफ नही देखना चाहती थी, घर से निकल तो आयी थी , मगर रास्ते भर यही सोचती रही थी कि अकेले कैसे जियूंगीं, जिन्दगी अकेले जीने का नाम नही, प्लेटफार्म पर बैठे उस वक्त भी यही सोच रही थी, कि अचानक आप पर नजर पडी, और लगा था कि आप के साथ ये बाकी पल मैं जी सकती हूँ, आज आप सोच रहे होंगें कि आज क्यों मैने आपको मरने के लिये कहा, दरअसल मुझे कल से अस्पताल में एडमिट होना है , अब घर पर नही रह सकती, बाकी के बचे चंद दिन मुझे अब अस्पताल में ही काटनें होगें, अब मै चलती हूँ
एक के बाद एक ट्रेन निकल रही थी, मगर घोष बाबू के कदम पटरी की तरफ नही फिर से उस अजनबी की तरफ बढ गये, ये कहना मुश्किल था कि वो इस बार उधार देने जा रहे थे या उधार वापस लेने.......

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

कभी कभी.....


कभी कभी भीड भरे मंजर में दिल तनहा रह जाता ,
कभी कभी चाह कर भी मन कुछ कह नही पाता ॥

कभी कभी दूर, बहुत दूर जाने को मन व्याकुल हो जाता,
कभी कभी खुद को भूला देने को, दिल बेकरार हो जाता ॥

कभी कभी बिन बात ही बेवजह ,आसूँ छलक जाता ,
कभी कभी खुद में सिमट के दिल रोने लग जाता ॥

कभी कभी दुनिया मे हर शख्स पराया सा हो जाता,
कभी कभी अपना वजूद भी बेगाना लगने लग जाता ॥

कभी कभी दिल कितना कुछ, चुपके से सह जाता
कभी कभी इक लफ्ज, विषबुझे तीर सा चुभ जाता ॥

कभी कभी लाख कोशिशों पर ,कुछ याद नही आता,
कभी कभी कोई लम्हा, उम्र भर भी भूल नही पाता ॥

कभी कभी इम्तेहां-ए जिन्दगी, खत्म नही होता ,
कभी कभी कोई खुद ही, इक इम्तेहां बन जाता ॥

कभी कभी सब पा कर भी, हाथ खाली रह जाता ,
कभी कभी सब लुटाने पर भी, दामन भर जाता ॥

कभी कभी सावन, निष्ठुर बन आग लगा जाता

कभी कभी तपता रेगिस्तां भी, ना बैरी बन पाता

कभी कभी ख्वाब, इक ख्वाब बन कर रह जाता,

कभी कभी तकदीर से, बहुत ज्यादा मिल जाता ॥

कभी कभी...........................

बुधवार, 13 जुलाई 2011

है चार दिन की जिन्दगी


है चार दिन की जिन्दगी
और करने हजारों काम है ,
फिर भी लोगों को सदा
दूजे के कामों से ही काम है .............

रूठ कर मना लो उन्हे

जो प्यार करते है तुम्हे
कल के भरोसे में तो फिर

बस उदासी भरी कई शाम है...................

जाने कितना वक्त खोया तुने
अपने पराये को समझने में

पर एक ही पल में यहाँ
मिट जाते रिश्तों के नाम हैं.....................

खुशियों को पाने के लिये हैं खोई
जिन्दगी की लाखों खुशी

है हाथ खाली आज भी मगर

ढल गयी जिन्दगी की शाम है ........................
यूँ तो सब बिकता ही है

बेजान दुनिया के बाजार में
पर खरीद पाया कौन वफा

जो कीमती मगर बेदाम है ....................


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