जिन्दगी जीने के लिये
इक पागलखाना चाहिये
कोई बन्धन नही, रस्में
नही
रीति नही, जाति नही
सफलताओं असफलताओं
के
तराजू मे तौला हुआ
इंसा नही
मन से मन मिल जाय
एक ऐसा पागल चाहिये
जिन्दगी जीने के लिये
इक पागलखाना चाहिये
अपने ही जहाँ अपने
ना हो
पराये भी पर अपने से
हो
अदृश्य सी दीवारे ना
हो
बंधे हुये जहाँ सपने
ना हो
बेफिक्र सी इस जिन्दगी
को
पागल सा एक पल चाहिये
जिन्दगी जीने के लिये
इक पागलखाना चाहिये
जाने कितनी जंजीरों
में
खुद को बाँधे हम रहे
जीते रहे सबके लिये
और खुद को ही खोते
रहे
खामोश हो चले इस दिल
को
पागल
सी धडकन चाहिये
जिन्दगी जीने के लिये
इक पागलखाना चाहिये
ये भला है, ये बुरा
है
ये है नही तुम्हारे
लिये
ऐसे अनगिनत धागों से
ही
उलझी जिन्दगी बुनते
रहे
खोलने को मन् की ग्रंथियां
थोडा पागलपन तो चाहिये
जिन्दगी जीने के लिये
इक पागलखाना चाहिये
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