प्रशंसक

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

उधार की जिन्दगी... A Borrowd Life



रेल की पटरी पर ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार से दौड रही थी, और घोष उस पटरी पर अपनी जिन्दगी की रफ्तार को खत्म करने के लिये उस पर अपनी पूरी रफ्तार से दौड रहा था, कि विघुत गति से एक हाथ अचानक आया और वो पटरी से अलग आ गया।
घोष- आपने मुझे क्यों बचाया, मै जीना नही चाहता, मुझे मरना है, आप मुझे छोड दीजिये..
अजनबी- मगर मुझे आपसे कुछ चाहिये जो सिर्फ आपके ही पास है,
घोष- मगर मैं तो आपको जानता तक नही, और फिर मुझसे आप क्या लेना चाहती हैं
अजनबी- उधार की जिन्दगी, मुझे आपकी जिन्दगी चाहिये, बस कुछ दिन की, फिर आप शौक से मर सकते हैं,
घोष- उधार की जिन्दगी, जिन्दगी भी उधार में दी जा सकता है क्या....
अजनबी- जी हाँ , बिल्कुल दी जा सकती है।बस आज से आप ये सोच कर मत जीना कि आप जी रहे हैं आप आज से मेरे लिये मेरी दुनिया में जियेंगें
घोष- मगर आप ऐसा कैसे सोच सकती हैं कि मै आपकी बात मानूंगा ही, मुझे जाने दीजिये मुझे मरना है
अजनबी- तो आप मान लीजिये ना कि आप मर चुके हैं, और ये आपका नया जन्म है....
घोष- कुछ देर चुप रहने के बाद , चलिये ठीक है मान लेता हूँ, बताइये मुझे कहाँ चलना है
अजनबी- आप मेरे साथ चलिये.....
फिर घोष बाबू, उस अजनबी के साथ रहने लगते हैं
चार महीने बाद..........
फिर वही रेल की पटरी है .............
अजनबी- घोष बाबू आज आप मर सकते हैं मगर जीते जी मैं आपका ये कर्ज नही भूल पाऊंगीं, आपने मुझे मेरे जीवन को एक गति दी है, आज आपसे मैं एक बात कहना चाहती हूँ , मुझे ब्लड कैसर है, उस दिन जिस दिन हमने आपको बचाया था, मैं अपना घर छोड कर यहाँ आयी थी, क्योकि मै रोज हर पल मरना नही चाहती थी, अपनों की आंखों में हर पल मौत का खौफ नही देखना चाहती थी, घर से निकल तो आयी थी , मगर रास्ते भर यही सोचती रही थी कि अकेले कैसे जियूंगीं, जिन्दगी अकेले जीने का नाम नही, प्लेटफार्म पर बैठे उस वक्त भी यही सोच रही थी, कि अचानक आप पर नजर पडी, और लगा था कि आप के साथ ये बाकी पल मैं जी सकती हूँ, आज आप सोच रहे होंगें कि आज क्यों मैने आपको मरने के लिये कहा, दरअसल मुझे कल से अस्पताल में एडमिट होना है , अब घर पर नही रह सकती, बाकी के बचे चंद दिन मुझे अब अस्पताल में ही काटनें होगें, अब मै चलती हूँ
एक के बाद एक ट्रेन निकल रही थी, मगर घोष बाबू के कदम पटरी की तरफ नही फिर से उस अजनबी की तरफ बढ गये, ये कहना मुश्किल था कि वो इस बार उधार देने जा रहे थे या उधार वापस लेने.......

शनिवार, 29 सितंबर 2012

संगम किनारे जन्मी एक प्रेम कथा...........


अब मुझे खुद पर ही गुस्साआ रहा था, आखिर मैने क्या सोच कर उससे मिलने के लिये हाँ कर दी थी, पाँच साल बाद अचानक उसका फोन आया था, और उसकी एक काल पर मैं मिलने को तैयार हो गयी थी, कहाँ गया था मेरा वो मान, कैसे भूल गयी गयी थी मैं उन सभी बातों को, 


सोचते सोचते मैं वक्त की नदी के उस छोर पर पँहुच गयी जहाँ अभिजीत से पहली बार मिली थी। उस दिन मेरा मूड कुछ खराब था, और जब भी ऐसा होता था मैं संगम की सीढियों में आकर बैठ जाती थी, उसकी लहरों को देखते देखते कब मेरे मन का दुख दर्द उसकी लहरें अपने में समेट कर ले जाती थी, मुझे पता ही नही चलता था। उस दिन भी मैं लहरों में खोई हुयी थी कि अचानक से वो आया , और बोला- मैम अगर आपको तकलीफ ना हो तो क्या आप अपनी कार से मेरे चाचा जी को अस्पताल पहुँचा सकती हैं, मैने नजर उठाकर देखा तो पास ही कुछ ऊपर की सीढी पर एक आदमी लेटा हुआ था , शायद उसको माइल्ड हार्ट अटैक हुआ था। बिना कुछ सोचे वक्त गवायें मैं बाहर की तरफ आ गयी, वो कुछ और लोगों के साथ अपने चाचा जी को लेकर पीछे की सीट पर बैठ गया। सिविल लाइन्स के नाजरथ हास्पिटल में उसको ले गयी, क्यों कि पिता जी वहाँ सीनियर डाक्टर थे । उस दिन के बाद फिर तो पता नही कैसे मुलाकातें होने लगी, और एक दिन अहसास हुआ कि अभिजीत मेरी जिन्दगी का हिस्सा ही नही, मेरी जिन्दगी है। पर इससे पहले की मैं या वो मुझसे अपनी बात कहता, संगम की लहरों की तरह ना जाने कँहा खो गया । और मैं बस खुद को ठगा सा महसूस करने के सिवा कुछ ना कर सकी । 

आज भी मैं उसी संगम के तट पर उससे मिलने जा रही थी, एक एक पल मुझे एक दिन से कम ना लग रहा था, लग रहा था कि काश उड सकती तो उड के पहुँच जाती, कीडगंज से संगम का रास्ता इससे पहले कभी लम्बा ना लगा था, एक मन कहता क्यों उसके बताये ठीक वक्त पर या उससे पहले पहुँचना चाहती हूँ , वो क्या कभी तुम्हारे बताये या कहे समय पर आया भी है, आज भी जाकर तुमको ही इन्तजार करना पडेगा जो पाँच साल पहले किया करती थी, मगर फिर भी गाडी की रफ्तार मैं कितनी तेज कर चुकी थी , ये तब पता चला जब बगल से निकलती कार से टकराते टकराते बची।

सरस्वती घाट पर किनारे कार लगाई और लगभग भागते हुये सीढियों की तरफ कदम बढाये, एक सरसरी निगाह से लगभग यही सोचते हुये देखा कि वो अभी नही आया होगा, मगर निगाहें उसे देखेते ही बस ठ्हर सी गयी, कदमों में ऐसा लगा जैसे किसी ने बेडियां डाल दी हो , दिल शताब्दी से भी ज्यादा रफ्तार से चल रहा था, मन में इतनी हलचल थी, कि शायद ही सागर के हदय में तब भी इतनी हलचल नही उठी होंगीं, जब सागर मन्थन हुआ होगा । अब तक वो मेरे सामने आ चुका था । मेरी तन्द्रा तब टूटी जब उसने कहा- कैसी हो लेखा? 

रास्ते भर कितना सोच कर आयी थी कि  चाहे कुछ भी हो जाय उसके सामने मैं अपनी किसी भावना को , किसी कमजोरी को प्रकट नही करूंगीं । दिखा दूंगीं उसको कि मैं उसके बिना भी खुश हूँ और पहले से कही ज्यादा । मगर दिल भी कब खुद को ही दगा दे जाय ये कोई नही जान सकता, उसके प्यार भरे एक वाक्य ने मुझे बिखेर कर रख दिया, आंखें छलक आयी, खुद को संभालते हुये बोली- अच्छी हूँ और तुम , आज यहाँ इतने लम्बे अरसे बाद ............ कुछ और कहना चाह रही थी मगर सारे शब्द गले में ही रुक कर रह गये। 

लेखा तुम्हारे सारे सवालों का जवाब देने ही तो आया हूँ, मुझे यकीन था तुम जरूर आओगी। और कहते ही उसने दो कागज मेरे सामने कर दिये । पहला कागज मैने खोला, ये तो मेरे पापा की लिखावट थी, ये क्या मेरे पापा ने उससे वचन लिया था- जब तक मैं डाक्टर ना बन जाता लेखा से किसी भी तरह का सम्पर्क नही करूँगा। और अगर मैने ऐसा किया या ये कहा कि मैं डाक्टर नही बन सकता तो आप अपनी बेटी के  भविष्य का कोई भी निर्णय लेने से पहले मेरा विचार नही करेंगें  और नीचे अभिजीत के दस्तखत थे। तभी मैने दूसरा कागज देखा ये थी उसकी डाक्टर की डिग्री। 

इससे पहले की मैं सोचती कि पापा ने मुझे कुछ क्यों नही बताया अभिजीत ने कहा- लेखा तुम्हारे पापा ने जो किया वो हमारी और तुम्हारी भलाई के लिये ही तो था। आज उनके कारन ही मैं एक इन्सान बन सका, वरना तुम ही सोचो क्या था मैं पाँच साल पहले। आज मैं इस लायक हूँ कि उनसे तुम्हे मांग सकूं, क्या तुम इस बीमार डाक्टर के दिल का इलाज करोगी डाक्टर लेखा......

मैने संगम की लहरों की और देखा, जो मेरे इस संगम की साक्षी बन रही थी, और उसकी कलकल की ध्वनि अपनी सहमति प्रकट कर रहीं थी ।





गुरुवार, 27 सितंबर 2012

कह दो साथी मन की बात............


बीत गयी है आधी रैना
और बची है आधी रात
तोड के अब तो खामोशी
कह दो साथी मन की बात.............

 तेरी चंचल आँखों की तिरछी
चितवन में बसे हैं राज अभी
तेरी पायल की छमछम में
बसते जीवन के राग सभी
अब तो परिभाषित कर दो
जो दिल में हैं तेरे जज्बात

बीत गयी है...................

तेरी झील सी गहरी निगाहों में
अक्सर पाता, बिम्ब मैं अपना
तेरे नीरज से कोमल अधरों पे
बसता हूँ मैं ही, ये देखूं सपना
मरुभूमि से हदय पे, अब तो 
आकर कर दो प्रीत की बरसात
बीत गयी है...............

शनिवार, 22 सितंबर 2012

तो ना चल इश्क की राहों में..........


जो  सोचने को है कुछ अब भी

तो ना चल इश्क की राहों में

जो दुनिया का खौफ है अब भी

तो ना चल इश्क की राहों में

जो परेशां होना, देता सुकू नही

तो ना चल इश्क की राहों में

जो चाहत है सिर्फ खुशियों की

तो ना चल इश्क की राहों में

जो जज्बातों में है दुनियादारी

तो ना चल इश्क की राहों में

जो नैनों में नीर का सागर नही

तो ना चल इश्क की राहों में

जो नही यकी तुझे खुद पर ही

तो ना चल इश्क की राहों में

जो किस्मत आजमाने शौक नही

तो ना चल इश्क की राहों में

जो खुद को खोने का हौसला नही

तो ना चल इश्क की राहों में

 
GreenEarth