दिल्ली
- जिसे कभी दिल वालों की नगरी कहा जाता था, कब और कैसे इस शहर में बेदिल लोग आ कर रहने
लगे और इस दिल्ली के दिल को इस कदर कुचल दिया कि आज दिल्ली का दिल सिसक रहा है और बेबसी
से वक्त की ओर देख रहा है - कि कब इस धरती पर ऐसे पुत्र पैदा नही होंगे, जिनको जन्म देने
का अफसोस उनकी माँओं को होगा ।
जरूरत
आज सिर्फ ये नही कि ऐसे लोग जो इक स्त्री के दामन को दागदार करते हैं उनको क्या सजा
दी जाय, जरूरत ये भी है कि उस मानसिकता को समझा जाय जो ऐसे लोगों के जेहन में पनपती
हैं ।
स्त्री
का पुरुष और पुरुष का स्त्री की ओर आकर्षण प्रकृति की एक सामान्य सी सौम्य सी प्रवत्ति
है मगर जब इसमें विकृति आ जाती है तब यह प्रकृति के विपरीत होने लगता है। हमें इस बात
पर गहन अध्ययन की आवश्यकता है कि इस सोच का अंकुर कैसे जन्म लेता है, कहाँ से इसे हवा
पानी मिलता है और फिर कैसे धीरे धीरे यह बढती बढ्ती एक जहरीली बेल का रूप लेकर समाज के उस
कोमल अंग को अपनी जकड में लेती है जिसके पास समाज को ना केवल जन्म देने की शक्ति है बल्कि जीवन का आधार भी है ।
हमें
सोचना होगा, और जाना होगा उस काल में जिसे लोग राम राज्य कहते हैं । सूक्ष्मता से देखना
होगा उस युग को, जब व्यक्ति का व्यक्तित्व मात्र धन दौलत सम्पदा या शक्ति से नही वरन
आचरण से मापा जाता था । समाज में वही पूज्यनीय था जिसके लिये शुद्ध आचरण ही उसके जीवन
का आधार था , और उस व्यक्ति का समाज में कोई स्थान नही होता था जो पतित था ।
समाज
में आखिर आज ऐसा क्या हुआ कि नारी को देवी समझे जाने वाले देश में सिर्फ उसे भोग्या
ही समझा जाने लगा । जिस देश में निष्प्राण सी नदी को भी देवी तुल्य माना गया , गाय
को माँ के समरूप रक्खा गया, सम्पूर्ण देश को माता कहा गया । फिर कैसे और क्यों ये परिवर्तन
हो गया कि अब पिता अपनी पुत्री में भी सिर्फ एक नारी के रूप को देखने लगा । जन्म दाता,
संरक्षण कर्ता ही उसे अपना ग्रास बनाने लगा ।
कमी
कहाँ है ??
कमी
आई है जीवन के मूल्यों में, बदल गये हैं जीवन के लक्ष्य जीवन का आधार , विचार धारा
, और उसका रूप ले लिया है असंतुष्टि ने ।
हमारे
लिये मुश्किल नही है समाज से ऐसे दानवों को मिटाना मगर उसके लिये किसी को तो देव बनना
होगा , किसी को तो आहवाहन करना होगा एक बार फिर से उस दुर्गा का जो सर्वनाश कर दे ऐसे
दैत्यों का ।
सिर्फ
अखबार के पन्नों पर चन्द रोज की खबर बना कर इस समस्या का हल नही निकाला जा सकता । स्त्री
को सिर्फ दिलासा दिला कर उसके दर्द को कम नही किया जा सकता ।
समाज
को सोचना होगा और मानना भी होगा कि यदि स्त्री कोमल है तो यह उसकी कमजोरी नही , उसकी
शक्ति है , और जब यह शक्ति प्रचंड रूप लेती है तो यह फूल से फूलन भी बन जाता है । जरा
सोच कर देखिये यदि समाज में फूल से ज्यादा फूलन हो गयी तो , स्वयं को सामर्थ्य की धुरी
समझने वाले पुरुष का वर्चस्व ही खतरे में पड जायगा , और परिणाम फिर चाहे कुछ भी हो
, हारेगा तो जीवन की ही होगी क्योकि प्रहार भी तो जीवनदात्री पर ही किया जा रहा है

