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गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

परिवर्तन


मनोहर भइया आज हमार जी मा बार बार रहि रहि के जाने काहे ई बिचार आ रहा है जइसन हम कउनो दगा करा है। हमका कुच्छौ समझ नही आ रहा, का सही है का गलत। अब आपै हमका रास्ता दिखाओ।
रहीम कल से राबर्ट कहलाने वाला था, गाँव में आये मिशनरी के लोगो से उसने घर की रोटियों के लिये धर्म परिवर्तन करने को हांमी तो भर दी थी, मगर अब उसकी आंखों से नींद कोसो दूर थी। मन में उथल पुथल थी, कि कल से जाने क्या क्या बदल जायगा। और अपनी इसी ऊहा पोह को शान्त करने के लिये अपने मित्र मनोहर जिसको वो अपने से भी ज्यादा मानता था, के पास आया था।
कुछ देर तक ऐसा सन्नाटा पसरा रहा कि अगर एक पत्ता भी गिरता तो उसकी आवाज भी दूर तक साफ सुनाई दे जाती। फिर उस सन्नाटे की चुप्पी को तोडते हुये मनोहर ने बहुत गम्भीर मुद्रा में रहीम से कहा- भैया हम गरीब लोगन का एक ही धरम है और वो है अपने परिवार का दुई बखत की रोटी देना। सुख सुबिधा तक तो हम सोच ही नही सकत। हमार नाम राम होय, रहीम होय या राबर्ट का फरक पडत हैं, ई सब तो अमीर लोगन की खातिर है। औ फिर हमका इक बात बताओ तुमहार नाम बदल जाय से का तुम्हार करम बदल जइहै, का तुम्हार भासा बदल जइहै, का तुम कल से इंगलिश मा गिटिर पिटिर करै लगिहो, का हमार तोहार रिशता बदल जइहै, का ई गाँव का हवा पानी बदल जइहै, का तुहार आतमा बदल जइहै | ना भइया कुच्छो ना बदली, कल भी तुम अइसै हमार साथ बैठियो, बतलइहो। बस फरक इत्तै होई कि तुम्हार घरवाली, तुम अउर तुमहार बच्चा भूखे पेट ना सोइहै। भैया हाथ मा चार पैसा आये का चाही। चाहे उई खुदा के घर से आवै, या ईशा के।
तुमका तो खुश होए का चाही कि कल से तुमका काम मिल रहा है। अब तुमहो इंसान हुई जइहो, नही तो गरीब मनई अउर कुकुर मा ज्यादा फरक नही।
अब जाओ और चैन से सो जाओ, अब तुहार दुख के दिन खतम, हाँ ई बात याद रख्खेओ हमार लिये तुम हमार रहीमै रहिहो।

बात तो सोचने की है, आखिर क्या बदल जाता है धर्म परिवर्तन से, क्या वाकई, ईश्वर, खुदा या गॉड गिनती करते होंगे, कि धरती पर कितने लोग है जो उनको मानने वाले हैं। क्या वाकई में कही सबकी अलग अलग सत्ता है, क्या गले में तुलसी की माला डाल कर कोई हिन्दू, या क्रास डाल कर कोई इसाई बन जाता है। क्या कल तक मस्जिद में सजदा करने वाला आज अपनी मुसीबत में, या अल्लाह, या खुदा की जगह ओह गॉड कह पायगा। क्या सुबह उठ कर हनुमान चालीसा पढने वाला, पाँच वक्त की नमाज अदा करते समय राम को याद नही करेगा। और अगर वो ऐसा करेगा तो क्या खुदा या भगवान उससे नाराज हो जायेंगें। हकीकत की जमीन पर क्या क्या बदलेगा धर्म परिवर्तन से.........



गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

अब रक्त धरा पर और नही



चाह रहा मन आज लिखना
जो बचा सके इंसानियत
एक लकीर खींचना उन दिलों में
जो पूज रहे है हैवानियत
कैसे मैं समझाऊं उनको
ये नही खुदा की चाहत
खून बहा कर नही मिली है
कभी किसी को राहत

बहुत हो चुका, अब तो छोडो
बदले की आग में जलना
गोली बारुद के ढेरों पर
अब सौदे मौत के करना
जन्मा नही तुमको माँ ने
बेगुनाहों का रक्त बहाने को
क्यों दागदार फिर करते 
तुम उसके दूध पिलाने को

याद करों उन दिन को जब
तेरे रोने पर माँ रोई थी
तुझे सुलाने की खातिर
रात सारी नही वो सोई थी
बता भला, अब कैसे सोयें वो 
जिनके नन्हों को तूने सुलाया है 
कैसे खुदा बेहरबां हो तुझ पर
बेबस ममता को तुमने रुलाया है

है वक्त अभी भी, कुछ तो सोचो
कुछ तो सच्चे काम करो
छोडो ये बन्दूक तमंचे
इंसानियत का सम्मान करों

रो रो कर कह रहा अल्लाह
अब रक्त धरा पर और नही
मत मार जालिम मासूमों को
सब मेरे बच्चे हैं कोई गैर नही

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

ये कैसी शिक्षा ??





शिक्षा का बाजार बने है
ये विघा के मंदिर
शिक्षा छोड के सब मिलता है
देखो इसके अंदर


अब पहले से नही रहे
गुरुजन द्रोण के जैसे
ढूढे से भी ना मिलते  
शिष्य भी अर्जुन के जैसे 


हाथ में डिग्री उनके होती 
जिनकी जेब में पैसे 
जिसके पास नही हो पैसा
वो पढने को तरसे

विधार्थी बन रहे कस्टमर 
और टीचर बना इम्प्लाई
स्टूडेंट से कुछ कहे तो समझो 
उसकी जीविका पर बन आई 

बच्चो से ज्यादा रिजल्ट की चिंता 
रोज गुरुवर जी  को है सताती 
एक्साम के दिनों में यही सोच कर
गुरु  जी को नीद भी नहीं आती 

सुबह सवेरे मंदिर जाकर
मन्नत टीचर है  मांगे
और बरगद के पेड़ में जाकर 
मोटे धागे भी बांधे 

बिन शिक्षा के फल फूल रहा
देखो शिक्षा का व्यापार
बिन शिक्षित हुए लोग भी पा रहे 
मेडल नौकरी और उपहार 

शिक्षा का बाजार बने है
ये विघा के मंदिर
शिक्षा छोड के सब मिलता है
देखो इसके अंदर



चित्र के लिए गूगल का आभार 

रविवार, 7 दिसंबर 2014

कुछ रंग जिन्दगी के


जाने कैसे बना देते हैं लोग
ह्र्दय भी पाषाण का
पिघलना तो दूर
एक लकीर तक नही खिंचती मनुष्यता की

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कोई बना दे यंत्र
जो पहचान सके
सच्चे और झूठे जज्बात
कि बहुत लुटा चुका
सहद्यता के मोती
चील कौंवों  में

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वो क्या समझेंगें
मेरे होने ना होने का मतलब
जिनके लिये
प्यार एक उम्र नही
 है मात्र एक पल खुशी का

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जगह भी वही
मै भी हूँ वही
दिन रात सुबह शाम
सब कुछ तो है वैसा ही
जाने क्या बदला
मैं आदम से खुदा हो गया

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जिसे फेंक दिया
किसी ने
यूं ही कुछ सोचे बिना
कुछ और नही
किसी की जिन्दगी थी,
भूख थी
किसी तडपते
पेट की।
और थी आस,
एक रात जिन्दगी में
भरपेट खा कर सोने की






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