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सोमवार, 31 जुलाई 2017

पागल कौन ??


एक बहुत बडे वैज्ञानिक थे। एक बार उन्होने पागलो पर शोध करने का निश्चय किया। वो नियम से तीन चार घंटे एक पागलखाने जाते और चुपचाप पागलों के व्यवहार को गौर से देखा करते।
वहाँ उन्होने गौर किया कि दो पागल, जो कभी गणित और अंग्रेजी के प्रोफेसर हुआ करते थे, घंटो आपस में बात किया करते थे। उनकी बातचीत में खास बात यह होती कि जब एक बोलता दूसरा चुप रहता और बडे ध्यान से दूसरे को सुनता और जब पहला चुप होता तो दूसरा बोलता और पहला चुप रह कर उसकी बात सुनता।

वैज्ञानिक को उन दोनो का व्यवहार बहुत अलग लगा। एक दिन वह उन दोनो पागलों के पास गये और बोले- प्रोफेसर साहब, आपसे एक बात पूंछनी थी - मै कई दिनों से देखता हूँ कि आप दोनो जब बात करते हैं तब एक समय में एक ही बोलत है और दूसरा बहुत ध्यान से सुनता है, कोई किसी की बात बीच में कभी नही काटता, ऐसा आप कैसे करते हैं। दोनो मुस्कराये फिर एक पागल प्रोफेसर बोले- यही तो बात करने का उसूल है कि एक बोले और दूसरा सुने इसमें आश्चर्य की क्या बात है। तब वैज्ञानिक जी बोले- नही, इसमें कुछ खास नही मगर मेरे लिये आश्चर्य की बात यह है कि दोनो के बात के विषय अलग अलग होते हैं एक हमेशा गणित की बात करता है और दूसरा हमेशा अंग्रेजी, जब आप एक दूसरे की बात समझते ही नही तो ध्यान से सुनते क्या हैं? 
अब दोनो पागल प्रोफेसर बहुत तेजी से हंसे फिर रुक कर एक ने कहा- अरे महोदय हमे पागल समझा है क्या? मुझे दुनिया में कोई दो व्यक्ति दिखा दो जो सच में एक दूसरे को सुनते हो।

शनिवार, 29 जुलाई 2017

आईना- मेरा दस्तावेज


कल सुबह 
उठा था
कुछ अलसाया अलसाया सा।
प्रतिदिन की तरह
उठ चुकी थी पत्नी
शायद बनाने गयी थी चाय।
तभी नजर गयी
उस आइने पर
जो इस कमरे में
एक अरसे से
सोता जागता था
मेरे साथ।
जिसने देखा था 
खामोशी से
कदम रखते मुझे
जवानी की दहलीज पर,
जिसने भाँपे थे सबसे पहले
मुझमें हो रहे परिवर्तन,
जिसने सिखाया
खुद से नजरें मिलाना,
जिसने जगाया
मेरा सोया आत्मविश्वास,
जिसे भूल गया
वक्त के साथ।
मगर देखता रहा वो
इस उम्मीद पर
देखूंगा मै
एक दिन।
कल एक बारगी
उसे पहचान न सका
कुछ बदल सा गया था
क्योंकि
निकल आयी कुछ झुर्रियां
उसके चेहरे पर
बाल भी हो गये थे
कुछ पके अधपके से
नजरे मिलते ही
कुछ खिंचता सा गया।
ठीक उसी तरह जैसे
अठ्तीस चालीस साल पहले
खिंचा था
माया को देखकर
कितना स्वाभाविक था
वो खिंचाव
उस चुम्बकीय आकर्षण में
गति थी
मेरे जीवन की
शायद तभी
मेरे अंतःकरण में बसा
हनुमान
राम से शिवभक्त बन
करने लगा था तप
पाने को अपनी गौरा।
अचानक मुझे लगा
जैसे उसके सफेद बालों को
किसी ने रंग दिया
गोदरेज हेयर कलर से
किसी ने अदॄश्य रूप से
लगा कर एंटीरिंकल क्रीम
मिटा दी उसकी झुर्रियां
बन गया वो
मुझसा
जाने कैसे उसे देख
मेरे मन के भाव
प्रौढ से युवा हो गये
धुंधली आँखो में चढ गया
गौगल, चश्में की जगह 
कितने ही स्वर्णिम स्वप्न
तैर गये आंखों में
कुछ परेशानियां भी
उभर आयीं
सपनों को साकार करने की।
तभी महसूस हुआ
एक आत्मीय स्पर्श
जो दे रहा था सम्बल
फिर किसी कोने से
गूंजने लगी
कुछ किलकारियां
जो दे रही थी आधार
जीवन को
हाथों में आ रहा था
कोई छोटा सा हाथ।
तभी अनुभव हुआ
समाहित हो रहे हैं
ये सभी मुझमें
जो जगा रहा था
मेरी सुषुप्त चेतना
दे रहा था खाद पानी
निर्जीव हो चले वॄक्ष को
जिसमें शेष थी
आस
उगने की
नयी कोपलें
मिल गया था वापस
मुझे मेरा बीता कल
जो था
ऊर्जा से
अभिसंचित
दे रहा था प्रेरणा
अन्तिम क्षण तक
जीवन युद्ध में
संघर्ष करने की।
और तभी
बरसों से चिर परिचित
ध्वनि आयी
सुनो सुबह हो गयी है
आओ चाय साथ पीते हैं॥
चल दिया मैं
चाय की दिशा में
देकर वचन
अन्तिम श्वांस तक
साथ निभाने का
अपने अजीज दोस्त
अपने आइने को

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

गुलाबी कागज के टुकडे


वो गुलाबी कागज का टुकडा
जो, पड गया है पीला
जैसे
पड गयी है फीकी
मेरी गुलाबी चमक
वक्त के साथ ।
रखा है, आज भी सहेज कर
कुरान की आयतों में
जिसमें
अल्फाज़ नही
लिख कर दिये थे तुमने
अहसास ।
जिसमें लिखते रहे 
हम तुम 
हर लम्हा
और बनती गयी ज़िन्दगी
एक खूबसूरत ग़ज़ल ।
सच
कितना आसान हो जाता है
कुछ कहना
कुछ लिखना
अहसासों की जुबान में
जहाँ
लफ्ज़, दीवार नही बनते
न गुंजाइश रहती है
गलतफहमियों की
बस बहते जाते हैं 
एक ही रौ में
हाथों में हाथ लिये
कहते जाते हैं
सुनते रहते हैं।
नही करना पडता इन्तज़ार
कहने के लिये
चुप होने का
एक ही पल में
दोनो कहते हैं
दोनो सुनते हैं
और लिखते रहते हैं
उसी, गुलाबी कागज के टुकडे में
जो पड गया है पीला
जिसे सहेज कर रखा है
कुरान की आयतों में।

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

लघुकथाः तो अब देख लेंगे।


क्लास में सभी बच्चे और टीचर भी यह जानते थे कि अंजली की आर्ट बहुत खराब है। एक दिन क्लास में टीचर ने सभी बच्चों से अपने मन की कोई भी ड्रांइग बनाने को कहा। अंजली भी बहुत मन से अपनी कॉपी पर ड्रांइग बनाने लगी। अंजली बहुत मन से ड्रांइग बना रही थी, उत्सुकतावश टीचर उसकी सीट तक ये देखने गयीं कि वो क्या बना रही है। अंजली ने कॉपी पर कुछ आढी तिरछी लाइने बना रखी थी ये देख टीचर ने उससे हतोत्सहित करने के भाव से पूंछा- ये क्या बना रही हो, अंजली ने बडी सरलता से कहा- भगवान। तब टीचर ने ऊंची आवाज में उसका मजाक बनाते हुये कहा- मगर भगवान को तो अभी तक किसी ने भी देखा नही, फिर उनका ड्रांइग कैसे बनाओगी?

अंजली ने बडी मासूमियत से उत्तर दिया- तो अब देख लेंगें। 
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