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शनिवार, 7 मार्च 2020

दो शब्द


दो शब्द कहूंगी मैं तुमसे
दो शब्द अनकहे समझ लेना
दो शब्द हमारे अधरों से
चुपके से आ कर ले लेना.........

दो शब्द अहसासो के प्रिये
सांसों में थमे थमे से है
दो शब्द सौंप तुम मुझको
अपने बन्धन में कर लेना.......

दो शब्द तुम्हारे मोती से
दो शब्द मेरा श्रंगार बने
दो शब्द तेरे दो शब्दों से मिल
धरा का सुन्दर राग बने........

कहाँ जरूरत कुछ और कहे
सुनने को कहाँ कुछ बाकी
तेरे दो शब्द के सागर में
खुशियों की लहर में साथ बहे.........

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019

खास हो गया..... something special happened......

उसके सुर्ख होंठों ने
छुआ जो मेरे नाम को
आम से ये नाम भी
आज खास हो गया

हम वही हैं आज भी
वही लकीरें हाथ में
हाथ आया हाथ में 
नसीब खास हो गया

दिन वही है उग रहा
शाम वो ही ढ्ल रही
डूबे तेरी चाँदनी में
चाँद खास हो गया

वही जमीं वही शहर
वही कदम वही डगर
साथ जब से वो चला
सफर ये खास हो गया

तलाश खत्म हो गयी
ख्यालों का नगर बसा
जुदा हुआ मै भीड से
शख्स खास हो गया

नजर को मेरी तू मिला
असर हुआ है कुछ नया
चमन हुये हो तुम मेरे
भ्रमर मै खास हो गया

शनिवार, 28 सितंबर 2019

क्या होगा


ठहरे हुये पानी में
वो आग लगा देते हैं
बहती हुयी लहरों का
अंजाम भला क्या होगा

झुकती हुयी नजरों से
वो कयामत बुला लेते है
ऊठती हुयी निगाहो का
अंदाज भला क्या होगा

उलझी हुयी जुल्फो से
वो सुबह को शाम करते है
भीगे हुए गेसुओं से
मौसम भला क्या होगा

हल्की सी एक झलक से
वो तारों को रौशन करते हैं
अंजुमन में उनके आने से
चांद का भला क्या होगा

आहट होती है आने की
और बहारें पानी भरती है
ठहरेंगें जब वो गुलशन में
कयामत का भला क्या होगा

शुक्रवार, 7 जून 2019

ऊष्मा


आज एक बार फिर लिखने बैठा हूं। एक समय था जब लिखे बिना तो नींद ही नही आती थी। प्यार भी कितनी अजीब  चीज है। किसी को शायर बना देता है किसी को काफिर और एक मै था, मेरे जैसे ठीक ठाक कवि के हाथ से ऐसे कलम छूटी कि आज करीब तीस साल बाद उसे छू रहा हूं।  यूं ही एक दिन मैं एक गजल लिखने की कोशिश कर रहा था, और मुझे दिखा ही नही कि वसू कबसे आ कर बैठी है, वो आई भी और चली भी गयी। अगले दिन जब मै उससे कालेज में मिला तो उसका गुस्सा सातवें आसमान पर था।और मै समझ नही पा रहा था कि वो किस बात पर अपनी नाराजगी दिखा रही थी, क्योकि मेरे हिसाब से मै कल उसका इंतजार करता रहा था, और वो आई नही थी। करीब एक हफ्ते तक उसकी नाराजगी खत्म न हुयी। मुझे लगा शायद किसी बात के कारन ही वो उस दिन मिलने भी नही आई, मुझे अपनी भूलने की आदत मालूम थी। इसलिये मै उससे किसी बहस में न उलझता था। अंत में बहुत मिन्नते करने के बाद उसने कहा- तुम या तो मुझे चुन लो या अपनी कलम को, फिर रो पडी और बोली अपने लिखने में तुम मुझे देखना तक भूल गये। ये भूल गये कि तुम मेरा इंतजार कर रहे थे तो फिर कैसे यकीन कर लू कि शादी के बाद अपनी जिम्मेदारियां याद रखोगे।छोटी सी मेरी गलती को उसने बहुत संजीदगी से लिया था, मै जाता था ये उसके प्रेम का ही रूप था। मैने उसे अपनी कलम देते हुये कहा- वसू आज से मेरे हाथों को सिर्फ तुम्हारे हाथ की जरूरत है। इन तीस सालों में कितनी ही बार वसू ने मुझे लिखने को कहा, किसी नाराजगी  के कारण नही मगर  मेरा कभी मन ही न किया, लिखने का। मुझे जिन्दगी भर इस बात पर अफसोस होता रहा कि जो गजल मै उसे खुश करने के लिये लिख रहा था वो उसके आसुओं की वजह बनी थी। मैने अपने अंदर के कवि को मारा नही था, बल्कि वो खुद ब खुद मेरे पास से चला गया था, जैसे तपती रेत में पानी गायब हो जाता है, वसू के प्रेम की ऊष्मा मे मुझे यह याद भी न रहा कि मेरा और कलम का कोई संबंध भी था।
मगर अपनी जिंदगी के आखिरी पल तक शायद बसू को भी ये बात सालती रही कि उसकी नाराजगी ने मेरी अंदर के कवि को दफन कर दिया, तभी उसने इस दुनिया से जाने से पहले मेरे हाथ मे वही कलम देते हुये कहा- नीरज मै जानती हूं तुम मुझसे सबसे ज्यादा प्यार करते हो, मगर अब मेरे हाथो मे तुम्हारा हाथ थामने की सामर्थ्य नही बची। वादा करो मेरे बाद अपने हाथो मे इस कलम को मेरी जगह दोगे।
मै चाह्ती हूं तुम वो गजल पूरी करो जो तीस साल पहले अधूरी रह गयी थी। समय रहा तो इसी जहां में नही तो उस जहां से तुमको पढूंगी।
आज कहने को तो हाथ मे कलम है मगर हाथ अभी भी वसू की ऊष्मा महसूस कर रहा है।

गुरुवार, 7 जून 2018

अंतिम विदा



सोचा न था कभी मैने
होगा कष्टकारी इतना
उनसे अंतिम विदा लेना
उनसे दूर चले जाना

अब जब जाने की वेला में
बस दो क्षण ही शेष रहे
जीवन के कुछ स्वर्णिम पल
इन आंखों में तैर रहे

गुस्से में अक्सर कह देता था
अब साथ नही रहना मुझको
हे ईश्वर मुझ पर दया करो
अब अपने पास बुला भी लो

उधर द्वार पर यमदूत मुझे
ले जाने को आतुर दिखते
इधर शोकाकुल पत्नी के 
नैनों से निर्झर नीर बहे

है याद मुझे वो दिन आता
जब बिछडे थे हम भगदड में
और बच्चे सी रो वो बोली थी
न छोडना कभी अब जीवन में

हे ईश्वर तुम ही मदद करो
न साथ मेरा, उसका तोडो
हम जन्मों जन्मों के साथी है
यूं विरह में न, उसको छोडो

अंतिम इच्छा समझ मेरी
अंतिम मुझ पर उपकार करो
मै आधा हूं, आधी वो है
दोनो पर अपना हाथ धरो
दोनो पर अपना हाथ धरो

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

जिन्दगी - A easiest thing






दुनिया का सबसे आसान काम 
जानते हैं क्या है
जिन्दगी जीना
आप सोचने लगे न
कि गलत कह रही हूँ
कहाँ आसान है जिन्द्गी जीना
ये परेशानियां खत्म हों
तब तो जिये कोई जिन्दगी
कभी पैसों की तंगी
कभी बीमारियां
कभी नौकरी बचाने की चिंता
कभी भविष्य
इन सबमें ही उलझ जाती है 
जिन्दगी
और तब दोष देते है 
कभी अपनों को
तो कभी अपनी किस्मत को 
मगर नही 
फिर भी कहती हूँ
मेरा यकीन कीजिए 
जिन्दगी जीना 
बिल्कुल मुश्किल नही
हम खामखां ही
बना देते हैं इसे मुश्किल
जरा दो पल के लिये
निश्चिन्त हो जाइये
और सोचिए
क्या जिन्दगी ने कभी 
कुछ भी मांगा आपसे 
खुश होने के लिए 
इक प्यार के सिवाय
नही न
और आखिर क्या चाहिए 
प्यार देने या करने के लिए 
सिर्फ और 
सिर्फ
एक अच्छा मन
और बताइये जरा
क्या चाहिए मन को
सुन्दर बनाने के लिए 
बस कुछ अच्छी आदते 
और भला क्या करना है
अच्छी आदतो के लिए 
कुछ भी तो नही
सिर्फ मन की आवाज 

सुनने के सिवाय
हम खामखां
बना देते हैं
इसे मुश्किल जिन्दगी जीना
बिल्कुल मुश्किल नही
हाँ हमेशा रहती है
जिन्दगी हमारे सामने 
हंसती मुस्कुराती
मगर हम
क्या करते हैं हम
करते रहते है डेकोरेट
जिन्दगी को 
ताकि सुन्दर दिखे
सबसे ज्यादा सुन्दर
खुद की नजरों को नही
औरों की नजरों को
और इस क्म्पटीशन में
जिन्दगी मेरे साथ होते हुये भी
हो जाती है हमसे दूर
करते तो है सब कुछ
जिन्दगी को खुश रखने के लिये
मगर क्या चाहिये जिन्दगी को
एक प्यार के सिवाय
खामखां ही
बना देते हैं इसे मुश्किल
जिन्दगी जीना 
बिल्कुल मुश्किल नही

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

गुलाबी कागज के टुकडे


वो गुलाबी कागज का टुकडा
जो, पड गया है पीला
जैसे
पड गयी है फीकी
मेरी गुलाबी चमक
वक्त के साथ ।
रखा है, आज भी सहेज कर
कुरान की आयतों में
जिसमें
अल्फाज़ नही
लिख कर दिये थे तुमने
अहसास ।
जिसमें लिखते रहे 
हम तुम 
हर लम्हा
और बनती गयी ज़िन्दगी
एक खूबसूरत ग़ज़ल ।
सच
कितना आसान हो जाता है
कुछ कहना
कुछ लिखना
अहसासों की जुबान में
जहाँ
लफ्ज़, दीवार नही बनते
न गुंजाइश रहती है
गलतफहमियों की
बस बहते जाते हैं 
एक ही रौ में
हाथों में हाथ लिये
कहते जाते हैं
सुनते रहते हैं।
नही करना पडता इन्तज़ार
कहने के लिये
चुप होने का
एक ही पल में
दोनो कहते हैं
दोनो सुनते हैं
और लिखते रहते हैं
उसी, गुलाबी कागज के टुकडे में
जो पड गया है पीला
जिसे सहेज कर रखा है
कुरान की आयतों में।

बुधवार, 31 मई 2017

वो हंसी मंजर................


बडा हसीं था वो एक मजंर
कि कोई नजरों में बस रहा था
हमारी खातिर ही तुम बने थे
ये जर्रा जर्रा भी कह रहा था…………………………..

बडी अनोखी सी बात है ये
बडा ही मुश्किल है ये फसाना
कि जिससे हमने बनायी दूरी
वो मेरी धडकन में बस रहा था
हमारी खातिर ही तुम बने थे
ये जर्रा जर्रा भी कह रहा था…………………………..

वो कपकपाती सी सर्द रातें
वो तेरा ख्वाबों में आ के जाना
कि जिससे हमने नजर चुरायी
वो मेरी नजरों में बस रहा था
हमारी खातिर ही तुम बने थे
ये जर्रा जर्रा भी कह रहा था…………………………..

खुदाया तेरी है रहमते ये
तेरा करम जो हुआ है मुझ पर
कि जिसको हमने दुआ में मांगा
वो मेरे दिल में ही बस रहा था
हमारी खातिर ही तुम बने थे
ये जर्रा जर्रा भी कह रहा था…………………………..

बडा हसीं था वो एक मजंर
कि कोई नजरों में बस रहा था
हमारी खातिर ही तुम बने थे

ये जर्रा जर्रा भी कह रहा था…………………………..

गुरुवार, 9 मार्च 2017

हर राह में साथ निभाउंगी.................


साथी तुम मेरी नींद बनो
मै स्वप्न में तेरे आउंगी।
इक बार तो मेरे कदम बनो
हर राह में साथ निभाउंगी

सृष्टि में कुछ भी पूर्ण नही
बिन गंध है पुष्प अधूरा सा
दीप प्रज्जव्लित हुआ तभी
जब साथ मिला है बाती का
तुम देखो तो बन बिन्दु मेरा
मै आकार तेरा बन जाउंगी
इक बार तो मेरे कदम बनो
हर राह में साथ निभाउंगी..............................

धरती पर लहलहायी फसल
जब अम्बर ने जल बरसाया
पूजा सबने उस चाँद को तब
जब संसर्ग चाँदनी का पाया
बनकर तो देखो तुम कल्पतरू
मै अभीष्ट भाग्य बन जाउंगी
इक बार तो मेरे कदम बनो
हर राह में साथ निभाउंगी..................................

कुछ भय तुमको भी घेरे है
कुछ मेरा मन भी व्याकुल है
कृष्ण से बिछडी राधा हरपल
चुप सी गोकुल में आकुल है
बंशी बन छेडो तो तान कोई
नित राधा बन रास रचाउंगी
इक बार तो मेरे कदम बनो
हर राह में साथ निभाउंगी.......................................


* Thanks to Google for Image

शुक्रवार, 17 जून 2016

प्रियतम मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ..............



कुछ फर्ज निभाने है मुझको, कुछ कर्ज चुकाने हैं मुझको
प्रियतम मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ, बस कुछ पल थोडा  धीर धरो

कुछ बन्धन मुझे पुकार रहे, खुलनी हैं कुछ मन की गाँठे
हर साँस में बसते हो तुम्ही, बस कुछ पल थोडी पीर सहो

कुछ साये तिमिर के घेरे हैं, मन में भय के कुछ पहरे है
ये कोरा मन तेरा ही है , बस कुछ पल हाथों मे अबीर धरो

कुछ बातें अभी अधूरी हैं, कुछ सुननी कहनी है जग से
ऐ मेरे दिल के अटल नखत, न खुद को नभ की भीड कहो

कुछ दहलीजे रोक रही मुझको, कुछ राहें रस्ता देख रही
विस्वास धरे पलकें मूंदें, बस कुछ पल तुम मेरे साथ बढो

कुछ खोने से मन डरता है, कुछ पाने को मन आतुर है
दिल में अजब बवंडर है, बस कुछ पल थोडी शीत सहो

प्रियतम मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ, बस कुछ पल थोडा  धीर धरो

रविवार, 29 मई 2016

हर मौसम तेरा बनना है


मनमीत मेरे, साथ तेरे, कदम मिला कर चलना है
कभी धूप कभी छाँव बन, हर मौसम तेरा बनना है

जीने को तो जी लेते, बेंमतलब से इस जीवन को
कुछ रोते हसते पा ही लेते, आधे अधूरे सपने को
तेरी नजरों में बस कर , ख्वाब तुम्हारा बनना है
कभी धूप कभी छाँव बन, हर मौसम तेरा बनना है

कैसे बना दिल धीरे धीरे , तेरा दीवाना क्या जानूं
सोच लिया रस्मों रिवाज, दुनिया के मैं ना मानूं
अब हाथों में हाथ लिये, अरमान तुम्हारा बनना है
कभी धूप कभी छाँव बन, हर मौसम तेरा बनना है

मेरे प्यासे तन न पर, जब से पडी छाया तेरी,
खिल गयी मुरझाई कली, फूल बनी काया मेरी
तेरी सांसों को राग बना, संगीत तुम्हारा बनना है
कभी धूप कभी छाँव बन, हर मौसम तेरा बनना है
To watch video click on Palash the Name of Love
https://www.youtube.com/watch?v=xBdA8RaP9Kk

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