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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019

खास हो गया..... something special happened......

उसके सुर्ख होंठों ने
छुआ जो मेरे नाम को
आम से ये नाम भी
आज खास हो गया

हम वही हैं आज भी
वही लकीरें हाथ में
हाथ आया हाथ में 
नसीब खास हो गया

दिन वही है उग रहा
शाम वो ही ढ्ल रही
डूबे तेरी चाँदनी में
चाँद खास हो गया

वही जमीं वही शहर
वही कदम वही डगर
साथ जब से वो चला
सफर ये खास हो गया

तलाश खत्म हो गयी
ख्यालों का नगर बसा
जुदा हुआ मै भीड से
शख्स खास हो गया

नजर को मेरी तू मिला
असर हुआ है कुछ नया
चमन हुये हो तुम मेरे
भ्रमर मै खास हो गया

सोमवार, 29 जुलाई 2019

नही करते



माना कि है एक बरसात, आंखों में तेरी
मगर हर किसी आंगन बरसा नही करते

सुना है बाजार में उतरी है, चीजें कई नई
मगर हर किसी को जरूरी कहा नही करते

आयेगें कई तुमसे कुछ सुनने की आस में
मगर हर कही हाले दिल, बयां नही करते

उसने दे तो दिये कांधे तुझे सहारे के लिये
मगर हर इक ठौर पलाश ठहरा नही करते

मिलेंगें बहुत तुमसे, अजीज रहनुमा बनकर
मगर हर किसी को तबज्जो दिया नही करते

माना तेरी मेजबानी का, सारा जमाना कायल
मगर हर शख्स से हमप्याला हुआ नही करते

शनिवार, 29 जून 2019

मै स्त्री हूँ


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मै स्त्री हूँ
सजीव कल्पना की
परिधि का
केन्द्र बिन्दु
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मै स्त्री हूँ
फूल नही
चाहे जितना कुचलो
जी उठूंगी
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मै स्त्री हूँ
अदा की साम्राज्ञी
नही मुझे जरूरत 
किसी हथियार की
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मै स्त्री हूँ
मकान की पहचान,
पुरुष के नाम 
घर की इज्जत 
मेरे नाम।
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मै स्त्री हूँ
आभूषण मेरा नैसर्गिक प्रेम
और तुम मेरा
प्रथम आभूषण
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मै स्त्री हूँ
मेरा परिचय
ममता प्रेम और त्याग
विशेष आकार नही
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मै स्त्री हूँ
संवेदना की मूरत
मुझे प्रेम चाहिये
पूजा नही
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मै स्त्री हूँ
पुरुष परमेश्वर
उसे पूजा चाहिये
मुझे सिर्फ प्रेम
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मै स्त्री हूँ
एकक्षत्र स्वामिनी
जीवन की
चिर काल से चिर काल तक
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मै स्त्री हूँ
मेरी मुस्कान
कभी जीवन
कभी खंजर
******************            ११    ***************
मै स्त्री हूँ
अर्धनारीश्वर शिव का, 
जप तप और प्रेम
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मै स्त्री हूँ
अश्रु की एक महीन बूँद
मेरा ब्रह्मास्त्र
******************            १३    ***************
मै स्त्री हूँ
सर्ष्टि की
अबूझ पहेली
******************            १४     ***************
मै स्त्री हूँ
नही कर सकती
नर सा बल प्रयोग
किसी भी युग में
******************            १५    ***************
मै स्त्री हूँ
तुम्हारा ये भूलना ही है
समाज के पतन का कारण 
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गुरुवार, 31 मई 2018

हो जाये तो अच्छा


न हँसने का दिल
न रोने का मन
कुछ गुमसुम सी
गुजर जाये तो अच्छा
न दोस्ती का नाता
न बैर का रिश्ता
कुछ अजनबी ही
रह जायें तो अच्छा
न गर्म दोपहर
न स्याह रात
कुछ ठंडी शामे भी
मिल जाये तो अच्छा
न जीने की तमन्ना
न मरने की ख्वाइश
जिन्दगी कुछ यूँ ही
बीत जाये तो अच्छा
न मिलने की आरजू
न खोने की कसक
वक्त कही खुद ही
ठहर जाये तो अच्छा
न गुरुर का नशा
न कमतर का गम
उम्र कुछ दरिया सी
बहती जाये तो अच्छा

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

जिन्दगी - A easiest thing






दुनिया का सबसे आसान काम 
जानते हैं क्या है
जिन्दगी जीना
आप सोचने लगे न
कि गलत कह रही हूँ
कहाँ आसान है जिन्द्गी जीना
ये परेशानियां खत्म हों
तब तो जिये कोई जिन्दगी
कभी पैसों की तंगी
कभी बीमारियां
कभी नौकरी बचाने की चिंता
कभी भविष्य
इन सबमें ही उलझ जाती है 
जिन्दगी
और तब दोष देते है 
कभी अपनों को
तो कभी अपनी किस्मत को 
मगर नही 
फिर भी कहती हूँ
मेरा यकीन कीजिए 
जिन्दगी जीना 
बिल्कुल मुश्किल नही
हम खामखां ही
बना देते हैं इसे मुश्किल
जरा दो पल के लिये
निश्चिन्त हो जाइये
और सोचिए
क्या जिन्दगी ने कभी 
कुछ भी मांगा आपसे 
खुश होने के लिए 
इक प्यार के सिवाय
नही न
और आखिर क्या चाहिए 
प्यार देने या करने के लिए 
सिर्फ और 
सिर्फ
एक अच्छा मन
और बताइये जरा
क्या चाहिए मन को
सुन्दर बनाने के लिए 
बस कुछ अच्छी आदते 
और भला क्या करना है
अच्छी आदतो के लिए 
कुछ भी तो नही
सिर्फ मन की आवाज 

सुनने के सिवाय
हम खामखां
बना देते हैं
इसे मुश्किल जिन्दगी जीना
बिल्कुल मुश्किल नही
हाँ हमेशा रहती है
जिन्दगी हमारे सामने 
हंसती मुस्कुराती
मगर हम
क्या करते हैं हम
करते रहते है डेकोरेट
जिन्दगी को 
ताकि सुन्दर दिखे
सबसे ज्यादा सुन्दर
खुद की नजरों को नही
औरों की नजरों को
और इस क्म्पटीशन में
जिन्दगी मेरे साथ होते हुये भी
हो जाती है हमसे दूर
करते तो है सब कुछ
जिन्दगी को खुश रखने के लिये
मगर क्या चाहिये जिन्दगी को
एक प्यार के सिवाय
खामखां ही
बना देते हैं इसे मुश्किल
जिन्दगी जीना 
बिल्कुल मुश्किल नही

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

सबक



अच्छे कॉलेज में एडमीशन लेना जितना मुश्किल है उससे भी कही ज्यादा मुश्किल होता है वहाँ पर सर्वाइव करना, एक एक नम्बर पाने के लिये दिन रात एक करने पढते है। जब एडमीशन की तैयारी के लिये कोचिंग कर रही थी, तब एक दिन माँ ने कहा था- बेटा बस एक बार मेहनत कर ले, एक बार अच्छे से कॉलेज में दाखिला मिल गया फिर तो बस कोई टेंशन नही। पता नही मै माँ की बात सही से समझ नही पायी थी या माँ को इन कॉलेजों में पढने के लिये की जाने वाली मेहनत का सही अंदाजा नही था, य वो मेरा हौसला बनाये रखने के लिये समझाती थी, मगर आज तो यही लग रहा था कि सेलेक्शन तो एक्साम में अच्छी पोजीसन लाने से कही आसान था।
यही सब सोच कर एक भी मिनट कही बर्बाद नही करती थी, क्लास के बाद सीधा लाइब्रेरी जाकर पढाई करती थी, क्योकि जो मेरी रूम मेट थी उसके पास तो पढाई के अलावा सारे काम थे, कई बार सोचती कि मुझे पढाई की कुछ ज्यादा टेंशन होती है या उसको कुछ कम।
आज क्लास में न्यूमेरिकल एनालिसिस पढाई गयी थी, तो सोचा आज उसके ही कुछ सवाल लगा लूँ, कुछ प्राब्लम हुआ तो कल ही सर से पूंछ लूंगी।
कैलकुलेशन करते करते एक सवाल में फस गयी। दो तीन बार लगा कर देखा, मगर नही हुआ। तभी मेरे सामने सीट पर बैठे एक लडके ने कहा- क्या हुआ, नही आ रहा, कहो तो मै बता दूँ।
अचानक से एक लडके का ऐसा कहना कुछ अटपटा सा लगा, और मन में ये भी आया कि लगता है बच्चू अपना इम्प्रेशन दिखाना चाह रहे हैं। मैने कहा नही- मै कर लूंगी।
उसने कहा- इट्स ओके।
कह कर वो अपनी पढाई करने लगा। और मै सोचने लगी कि वाकई क्या ये पढाई कर रहा है या अब भी मुझे देख रहा है।
मगर अब पढाई पर फोकस नही कर पायी। सोची हॉस्टल चलती हूँ, फिर सोचा अगर अभी उठी तो कही ये साहब भी न चल दे मेरे साथ साथ, सो उसके जाने का इन्तजार करती रही। किसी तरह अपने को दूसरे सवाल में व्यस्त किया।
अचानक से ऐसा लगा जैसे सामने वाली सीट खाली हो चुकी है, मेरा सवाल भी हो चुका था सो मै हॉस्टल चली आयी।
अगले दिन जब लाइब्रेरी में मै ऑपरेटिंग सिस्टम पढ रही थी, वही कल वाला लडका आया और बोला – हाय, आज न्यूमैरिकल एनालिसिस नही।
मैने सरसरी तौर से नजर ऊपर उठायी और बोला नही और वापस पढने लगी। उसने सामने वाली सीट खींची और बैठ गया। थोडी देर बाद शान्ती टूटी, अपनी किताब बन्द करते हुये वो बोला- और कल वाला सवाल हो गया। मन ही मन एक अजीब सा गुस्सा आ रहा था, आखिर क्यों ये मेरे पीछे पड रहा है, मगर लाइब्रेरी में किसी तरह का कोई सीन क्रियेट नही करना चाहती थी, सो बोल दिया – नही अभी नही हुआ।
उसने थोडा मुस्करा कर कहा- ऐसे कल वाला ऑफर आज भी वैलिड है- कहो तो बता दूँ।
मै सोची इसको चुप करने का एक ही तरीका है सवाल दे ही दूँ, चुपचाप करता रहेगा।
मैने कॉपी निकाली और दे दी- लीजिये सॉल्व कर दीजिये।
वो सवाल लगाने लगा और मै वापस से पढने लगी।
मन ही मन सोच रही थी, मिस्टर सवाल न लगा पाये न, तब बताऊंगी।
मगर थोडी देर बाद उसने कहा- लीजिये सॉल्व कर दिया है, देख लीजियेगा। कह कर वो चला गया।
मैने कॉपी देखी, उसने बिना किसी कटिंग के सवाल एक बार में ही कर दिया था, और लास्ट में एक नोट लिखा था- नॉलेज हमे जिस किसी से भी मिले ले लेनी चाहिये, चाहे वो परिचित हो या अनजाना। संकोच पढाई का सबसे बडा दुश्मन है।
मैने अपनी किताब बैग में रखी और उठ कर लाएब्रेरी से बाहर आयी मन में था कि पक्का बाहर मिल जायेगा, मगर वो मुझे कही नही दिखा।
तब से कॉलेज छोडते समय तक हमेशा आते जाते एक नजर उसे ही ढूंढती रही, हर दिन लाइब्रेरी में बैठते समय नजर सामने वाली सीट पर चली जाती, हमेशा सोचती कि काश एक बार वो मिल जाता तो उसे थैंक्स बोल पाती जिसने मुझे जिन्दगी का सबसे बडा सबक दिया।

गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

अपने अपने कर्म या अपने अपने भाग्य

कॉलेज की सीढियां उतर रही थी, मेरे नीचे की सीढियों पर दो गर्भवती स्त्रियां थी- एक मेरे साथ की ही अध्यापिका थीं और दूसरी थी कॉलेज में काम करने वाली एक मजदूर औरत। एक सम्भल सम्भल कर उतर रही थी, तो दूसरी अपने सिर पर रखी मौरंग की बोरी को ज्यादा सम्भाल कर उतर रही थी या अपने गर्भ में पल रही संतान को कहना मुश्किल था। एक बच्चे को भरपूर फल जूस और मेवे मिल रहे थे और दूसरे को सिर्फ माँ का रक्त। तभी सुबह पढी रामायण की चौपाई याद आ गयी
कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करई सो तसि फल चाखा।
मन में एक अजीब सा द्वन्द होने लगा। कौन सा कर्म किया है अलग अलग गर्भ में पल रही संतानों ने। क्या एक जन्म में ये मजदूर की संतान भर पायेगी इस भाग्य की खाई को?
और सोचने लगी कर्म बडा या भाग्य

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

उफ ये बडे आदमी


सुना था
बहुत बडे आदमी थे तुम
फिर क्यों फर्क पढ गया तुम्हे
गर मुझ जैसे छोटे से व्यक्ति ने
नही किया सलाम तुम्हे झुक कर
क्यों रात भेज अपने चार आदमी
बुलवा कर अपनी कोठी
झुका कर अपने पैरों
तुम्हे बताना पडा
तुम वाकई में हो 
बहुत बडे आदमी

*********************

शहर में
शोर है
धूमधाम है
कि जन्मदिन है आज
नेता जी का
लोग कहते हैं जिन्हे
बडे सरकार
जी जान लगा रहे हैं कार्यकर्ता
इन्ताम है
विदेशी सुरा और सुन्दरी का
दिखने को दिख रहा है
उत्साह
मगर
इस उल्लास के पीछे
सहमा है
एक डर
दुबक रही है
एक दहशत
आंखों में सभी की
तैर रहा है
पिछला साल
कैसे एक छोटी सी चूक
के परिणाम में
काटा गया था
रग्घू का सर
केक के बाद

*********************

साहब
आप देवता है
आपकी दया चाहिये
कर रहा हूँ बिटिया की शादी
जो सम्भव ही नही
आपकी मदद के बिना
देवता ने प्रसन्न हो
देखा
चरणों में पडे मनसुख को
चेहरे पर खेल गयी
बहुअर्थीय मुस्कान
शब्द गूंजे
मैं देवता हूँ
तो कहो
क्या लाये हो प्रसाद में
बेचारा मनसुख
पड गया सोच में
आंखों में आ गया
अपनी कुंवारी बेटी का चेहरा
देखा एक बार फिर
आस भरी नजरों से
शायद कुछ हो जाय
वो मानव जिसे बनाया गया था
देवता 
था तो एक मानव ही
आ ही गयी उसे दया
ओढ मुख मंडल पर 
गम्भीर गम्भीरता
दिया आदेश
ठीक है
रात में भेज देना बिटिया को

*********************

बडे लोग ही देख सकते हैं
बडे भव्य सपने
छोटे लोगो के हिस्से तो
सिर्फ आते हैं
सपने
कल की रोटी के

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दरबान
सुबह से रात तक
सैकडों को
करता है
झुक कर सलाम
और आंक लेता है
इंसान के अंदर का इंसान
अंदर जाने वाले के
सलाम को लेने भर के अंदाज से

*************


बडे मजबूर होते हैं
अक्सर बडे लोग
बडी मुश्किल में रहते हैं
अक्सर बडे लोग
बडी आसानी से ले सकते है
किसी की भी जान
फिर उस मामूली जान की
चुका एक बडी कीमत
कमाते है बडा नाम
बन जाते हैं

कुछ और बडे 

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

एक सुबह ऐसी भी…….



नींद हल्की हल्की सी खुली थी, घडी का पहला अलार्म बजा था, अलार्म बन्द करके सो गयी सोचा आज तो इतवार है, और इतवार का तो मतलब ही है देर से उठना। अभी दुबारा ठीक से सो भी नही पायी थी कि फोन की घंटी बजी- ध्यान आया कि शायद निम्मी की ट्रेन आ गयी होगी। निम्मी मेरी बुआ जी की बडी बेटी। उसका पीसीएस मेन्स क्लिअर हो गया था और उसे इन्टरव्यू देने आना था। मै इलाहाबाद में थी सो मेरे पास आ रही थी। पहली बार आ रही थी तो मैने कह दिया था कि स्टेशन आ जाऊंगी। फोन देखा निम्मी का ही फोन था- दीदी ट्रेन दो घंटे लेट है, जब फाफामऊ आउंगी तब काल कर दूंगी, आप तब आ जाना। अभी आप सो लो। फोन रख कर मै सोचने लगी कि उसको मुझे जगा कर ये बताने की क्या वाकई जरूरत थी कि अभी सो लो। खैर उसने तो कह दिया सो लो मगर मेरी नींद उड चुकी थी सो किचन में जाकर एक कप चाय बनाई और अखबार लेकर बैठ गयी। घडी की तरफ देखा साढे सात बज रहे थे, अचानक से याद आया कभी बचपन में इस समय का कितनी बेसबरी से इन्तजार करते थे, रंगोली जो देखनी होती थी, अनायास ही हाथ पास मे पडे रिमोट पर चला गया और उंगलियां टी वी पर डी डी वन खोजने लगी। एक लम्बे अरसे बाद रंगोली के प्रति वही आकर्षण जाग उठा। रंगोली शुरु हो चुकी थी और गाना आ रहा था- मदहोश दिल की धडकन चुप सी ये तनहाई……..बहुत सी यादे आंखों के सामने तैर सी गयी, वो हर पल याद आने लगा जब मै और वो एक साथ थे, गाने में तो प्यार का फिल्मांकन था, हमने इस प्यार को जिया था। बस मन किया की पल भर में उड के उनके पास पहुँच जाऊँ। उडना तो असम्भव था, रिमोट को म्यूट किया और फोन मिला दिया। सोचा कहूंगी टी वी खोलो, दूर ही सही दोनो एक साथ फिर से इस गाने को एकसाथ सुनते हैं। पूरी कॉल चली गयी मगर फोन न उठा, एक एक करके दस बारह कॉल कर दी, मन में कुछ घबराहट सी होने लगी। रात में तो बात करके सोयी थी, आखिर क्या हो गया। कुछ समझ नही आ रहा था। सोचा अजीत को फोन मिला लूँ, फिर सोचा पता नही, इतनी सुबह उसको फोन करूं तो पता नही वो क्या समझे, एक बार बहुत कहने सुनने के बाद इन्होने अपने रूम पार्टनर अजीत का नम्बर दिया था, बस यही सोच कर लिया था कि साथ रहने वाले का नम्बर तो पास में होना ही चाहिये। तभी डोर बेल बजी, किशन दूध लाया था। दूध लेकर आयी फिर सोचा चलो एक बार और इन्हे कॉल करके देखती हूँ शायद उठ गये हों। सोचा शायद साईलेंट पर करके सो गये हों। कितनी बार कह चुकी कि फोन साइलेंट मोड में मत करके सोया करो मगर नही करनी तो अपने ही मन की है ना। कॉल करने को फोन उठाया ही था कि निम्मी का कॉल आ गया, आवाज आयी- दीदी हम फाफामऊ आ गये, आप आ जाओ। बेमन से स्कूटी निकाली, सोचा निम्मी को ले आती हूँ, शायद तब तक ये उठ ही जाये। भगवान से बस मनाती रही- हे भगवान बस ये सो ही रहे हो, सब ठीक हो। इलाहाबद में कुम्भ चल रहा था, वो रास्ता जो २० मिनट में कवर करती थी, करीब ४५ मिनट लग गये। सोच रही थी अभी तक इनका कॉल नही आया। स्टेशन पहुँची तो देखा बहुत से लोगों की भीड लगी हुयी है लोग भाग रहे थे, शायद कुछ देर पहले ही कोई दुर्घटना घटित हुयी थी। स्कूटी एक किनारे लगाई निम्मी को कॉल किया। फोन स्विच ऑफ। दिल बहुत तेज घबराने लगा। कही निम्मी को …. नही नही ऐसा कुछ नही हुआ होगा। खुद को सम्भालते हुये भीड से भिडते टकराते स्टेशन के अन्दर गयी। लोग पागलों की तरह इधर उधर भाग रहे थे। लोगो की बातों से अंदाजा हुआ कि आखिरी समय में ट्रेन का प्लेटफार्म बदलने के कारण भगदड मच गयी थी जिससे शायद एक व्यक्ति की मृत्यु हो गयी थी और कुछ लोग घायल भी हो गये थे। हर तरफ नजर दौडा ली निम्मी का कुछ पता नही चल रहा था। फोन लगातार स्विच ऑफ जा रहा था, तब तक एनाउन्समेंट हुआ, गोरखपुर से आने वाली गोरखपुर एक्सप्रेस अपने नियत समय से तीन घंटा लेट से चल रही है। गाडी कुछ ही देर में प्लेटफार्म नम्बर दो पर आ रही है। भगवान को थैन्क्स बोला कि चलो निम्मी ठीक है, मन की परेशानी शान्त हुयी मगर सहसा बगल से एक बुरी तरह से घायल व्यक्ति को ले जाते लोगों को देख कर अपने इस तरह से स्वार्थी होने पर मन लज्जा से भर गया। सोचने लगी कैसे हम लोग अपने आस पास की समस्याओं से संवेदना शून्य हो जाते हैं। तभी ट्रेन के आने की आवाज आयी। एक पल पहले मन मे आये लज्जा भाव को वही छोड आने वाले डिब्बों में निम्मी को ढूंढने लगी। धीरे धीरे निकलते ट्रेन के ड्ब्बों में से निम्मी दिखी, वो रो रही थी। एक बार फिर दिल घबरा गया, आखिर क्यों रो रही है, तभी ख्याल आया ओह शायद उसका मोबाइल चोरी हो गया है, अच्छा तभी फोन स्विच ऑफ जा रहा था। ट्रेन लगभग रूक गयी थी, मै निम्मी के ड्ब्बे की तरफ बडी। निम्मी ट्रेन से उतरते ही मेरे गले लग के रोने लगी। कोई चलती ट्रेन से उसका बैग ले कर कूद गया था। उसमें उसके सारे डॉकूमेन्ट्स थे। किसी तरफ से निम्मी को चुप करा कर घर लायी, मन में एक तरफ निम्मी के लिये दुख हो रहा था और दूसरी तरफ इनके लिये चिन्ता। ये कहना मुश्किल है मन किसके लिये ज्यादा परेशान था। किसी तरह उसे चुप करा किचन मे चाय बनाने गयी। सुबह का चाय का भगौना शिकायत करने लगा- सुबह चाय तो बडे मन से बनायी थी न,  देखो जाकर अभी भी मेज पर पडी रो रही है। फिर ख्याल आया निम्मी भी तो रो रही है, फटाफट चाय बनायी।
कल बडे मन से बिग बाजार से रेडीमेड आलू की टिक्की लायी थी निम्मी की फेवरेट जो थी, सोचा था सुबह नाश्ते मे फटाफट डी फ्राई कर दूंगी, मगर मै जानती थी कि अभी न तो निम्मी कुछ खा पायेगी और न मै सो सिर्फ नमकीन बिस्किट निकाल लिये।


तभी मोबाइल पर रिंग हुयी, मन ने कहा पक्का इनका ही फोन होगा। सोचा अब मै भी नही उठाती फोन, इनको भी तो समझ आये कि फोन न उठाने पर कितनी चिन्ता हो जाती है, मगर मन कहाँ मानने वाला था, फोन उठा लिया, मगर ये क्या अजीत की कॉल? एक पल में मन फिर से हजारों शंकाओं से घिर गया। फोन उठाया, चिरपरिचित आवाज आई- हैलो उठ गयी कि नही।कुछ समझ नही आया बस रो पडी, 
उधर से आवाज आयी- अरे क्या हुआ , कुछ तो बताओ, सब ठीक तो है ना, 
थोडा सम्भलते हुये शिकायत के लहजे में कहा- सुबह से कहाँ थे, कितनी बार कॉल कर चुकी, आप तो निश्चिन्त सो रहे थे और मै परेशान हो रही थी। 
अरे प्लीज रुको मेरी बात तो सुनो- कल रात तुमसे बात करने के बाद हम और अजीत छत पर गये, पता नही कैसे मेरा मोबाइल गिर गया और उसका डिस्प्ले खराब हो गया। और तुम तो जानती ही हो अकसर मै फोन साइलेंट पर रखता हूँ और फिर तुमने ही तो कल कहा था कि कल सनडे है ग्यारह बजे तक सोऊंगी सो मैने सोचा शायद अब उठ गयी हो इसलिये कॉल की। लेकिन हाँ आज एक प्रामिस करता हूँ अब से कभी मोबाइल साइलेंट पर करके नही सोऊंगा। अब तो हंस दो प्लीज। तभी याद आया कि चाय तो पक कर आधी हो चुकी होगी और निम्मी… 
अच्छा सुनो हम आज शाम नही मिल रहे, निम्मी आयी हुयी है, तुमको और भी बहुत कुछ बताना है, अभी रखती हूँ, फिर कॉल करूंगी। बॉय, और धीरे से आई लव यू जी कह फोन रख वापस चल दी किचन की ओर। मुडते हुये नजर म्यूट चल रहे टी वी पर पडी, स्टेशन पर घायल पडे लोगो को अस्पताल ले जने की तस्वीरे दिखायी जा रही थी। अचानक से वापस वो दर्द वो चीखें कानों में पडने लगी।
और मै सोचने लगी - आज सुबह से कितना कुछ हो गया............
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