प्रशंसक

women लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
women लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

अपने अपने कर्म या अपने अपने भाग्य

कॉलेज की सीढियां उतर रही थी, मेरे नीचे की सीढियों पर दो गर्भवती स्त्रियां थी- एक मेरे साथ की ही अध्यापिका थीं और दूसरी थी कॉलेज में काम करने वाली एक मजदूर औरत। एक सम्भल सम्भल कर उतर रही थी, तो दूसरी अपने सिर पर रखी मौरंग की बोरी को ज्यादा सम्भाल कर उतर रही थी या अपने गर्भ में पल रही संतान को कहना मुश्किल था। एक बच्चे को भरपूर फल जूस और मेवे मिल रहे थे और दूसरे को सिर्फ माँ का रक्त। तभी सुबह पढी रामायण की चौपाई याद आ गयी
कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करई सो तसि फल चाखा।
मन में एक अजीब सा द्वन्द होने लगा। कौन सा कर्म किया है अलग अलग गर्भ में पल रही संतानों ने। क्या एक जन्म में ये मजदूर की संतान भर पायेगी इस भाग्य की खाई को?
और सोचने लगी कर्म बडा या भाग्य

सोमवार, 11 सितंबर 2017

स्पर्श और स्त्री



स्पर्श
जिसमें निहित है  
निर्मांण की कल्पना
या विनाश का षणयंत्र
बराबर मात्रा में
स्पर्श
एक ऐसा इन्टरफेस
जिसमें इनपुट तो एक ही होता है
मगर बदलते रहते हैं आउट्पुट
कभी बन जाता है भक्ति
तो कभी द्या 
कभी भर जाता है मन
स्नेह के भाव से
कभी जग जाती है 
सुषुप्त प्रेम की तॄष्णा
और कभी
छटपटा जाता है मन
जल विहीन मीन सा
स्पर्श
एक ऐसी शक्ति
जिसमें जीवन भी है
और मॄत्यु जितना भय भी
जो रच सकता है प्रेम का महाकाव्य
या बन सकता है विषैला सर्प
स्पर्श
जो कभी तैरा जाता हैं
अनगिनत सपने
कभी कर देता है
 हौसलों का संचार
थके मन में
कभी बन जाता है
आशीष
और कभी देता है आहट 
किसी अवांछनीय विनाश की
स्पर्श
कभी बन जाता है
विश्वास 
जीवन पर्यन्त साथ निभाने का
कभी दे जाता है 
अहसास
जो कहता है "मै हूँ ना"
तुम बस आगे बढो
स्पर्श
एक ऐसा अक्षररहित शब्द
जो कह देता है
हर वो बात जिसे
कोटि शब्द समूहों के युग्म भी नही कह पाते
स्पर्श 
एक ऐसी पहेली
जिसे सुलझा लेती है
स्त्री
क्षण के न्यूनतम भाग जितने समय में
जान लेती है
स्पर्श करने वाले का
इतिहास
और तय कर देती है
उसका चैरित्रिक भूगोल
निश्चित कर लेती है
दूरी या निकटता
और रच देती है अध्याय
सम्बन्धों की सम्भावना या असम्भावना का

शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

जाने कितने


जाने कितने छूटे हैं जाने कितने छूटेंगें
सोच की तंग गलियों में जाने कितने रूठेंगें

कुछ लोग गले से लगायेगे
फिर खंजर दिल पे चलायेगे
बन करके सबब बर्बादी का
जख्मों पर मरहम लगायेगे
जाल बिछा् अपनेपन का, सब हौले हौले लूटेंगे
जाने कितने छूटे हैं जाने कितने छूटेंगें

बुलंदी पर जश्न मनायेंगें
और जाम में जहर पिलायेंगें
स्वांग रचाके लव सव का
दामन में दाग लगायेंगें
गर सपने सरेआम किये, अरमान यहाँ फिर टूटेंगें
जाने कितने छूटे हैं जाने कितने छूटेंगें

सहमे हैं कभी, कभी सिमट गये
घिनौनी नजरों से घर में भी घिरे
कभी सब खो गहरे पानी में डूबे
कभी बचने को आग में कूद गये
ऐ बदनीयत जा बदल, हम ज्वाला बन फूटेंगें
जाने कितने छूटे हैं जाने कितने छूटेंगें

शनिवार, 18 मार्च 2017

पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे...................


पग डगमग कितने कर लो
पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे
भले बिछा लो शूल मार्ग में
पर नष्ट नही कर पाओगे…………………..
कठिनताओं से हाथ मिलाना
प्रिय खेल रहा है बचपन का
दुष्कर को ही लक्ष्य साधना
इक ध्येय रहा है जीवन का
तन पर प्रहार कितने कर लो
मन क्लांत नही कर पाओगे
पग डगमग कितने कर लो
पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे…………………………
उर में घातक हथियार लिये
जिव्हा पर प्रेम का अंकुर है
पुष्प से कोमल हम कहकर
रस हेतु भ्रमर सा आतुर है
तोडों या कुचलो तुम कलियां
गन्ध नष्ट नही कर पाओगे
पग डगमग कितने कर लो
पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे…………………………
विश्वास किये हम साथ चले
आघात की तुमने राह चुनी
सीता की चाह धरी मन में
ना राम की कोई बात सुनी
मै तत्पर हूँ अग्निपरीक्षा को
तुम वनवास नही कर पाओगे
पग डगमग कितने कर लो
पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे…………………………

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

गुनाह



माँ मै अब और एक भी दिन यहाँ नही रह सकती, हम कल ही यहाँ से चल देंगें है, इससे तो बहुत भला है अपना इंडिया। हम आ रहे हैं माँ। कहते हुये राधिका का फोन कट चुका था। मगर अनुसुइया जी के सामने तीन महीने पहले का दृश्य एक बार फिर से घूम गया।
राधिका अनुसुइया जी की एक मात्र संतान थी, उन्हे पालन पोषण में कभी इस बात पर विचार भी नही आया कि यह पुत्र है या पुत्री। लम्बे समय से वैधव्य का दंश झेल रही अनुसुइया जी के लिये वह जीविका का सहारा थी यह कहना गलत ही था किन्तु भावनात्मक रूप से वह उस पर पूर्ण निर्भर थीं।
दो साल पहले उन्होने राधिका की शादी बहुत धूम धाम से अपने ही समाज के एक प्रतिष्ठित परिवार में की थी। उनका मानना था कि विवाह करने के लिये दो चीजों का मेल खाना बहुत जरूरी है- एक लडके लडकी की कुंडली और दूसरा – लडके लडकी का कार्यक्षेत्र। विवेक, राधिका की ही तरह पेशे से डक्टर था।
दोनो की खुश गृहस्थी को देख वह सन्तुष्ट थी। विवेक भी घर का दामाद ना होकर बेटा ही था।  कोई एक पाँच छः महीने पहले राधिका के परिचित में कोई सउदी अरब चला गया था, प्रेक्टिस करने के लिये। उस दिन से तो राधिका के सिर पर भी सउदी जाने का भूत चढ गया था। पहले तो विवेक ने उसे खूब समझाया कि हम लोग यहाँ बहुत खुश हैं, सभी अपने हैं यहाँ और फिर माँ के लिये  तुम्हारे सिवा उनका कौन हैं, वगैरह वगैरह। मगर राधिका तो जैसे अपनी ही धुन में थी। एक दिन विवेक राधिका के साथ अनुसुइया जी के घर आया, और सारी स्थिति से अवगत कराया। माँ ने भी अपनी यथाशक्ति उसको समझाने की कोशिश की मगर राधिका टस से मस ना हुयी  और बोली- माँ मै अब और एक भी दिन यहाँ नही रह सकती, हमे जितनी जल्दी हो यहाँ से चल देना चाहिये, विवेक हमने सारी तैयारी कर ली है और प्लीज माँ की चिन्ता तुम मत करो, मै सब कर लूंगी। और वैसे भी मैं माँ पर डिपेंड हूँ, माँ मुझ पर नही क्यो माँ ठीक कहा ना , कहते हुये उसने लाड से माँ की गोद में अपना सिर रख दिया। अनुसुइया जी ने भी प्यार से उसका माथा चूमते हुये कहा – हाँ बेटा ये बिल्कुल ठीक कह रही है। तुम लोग मेरे लिये क्यो परेशान होते हो। आज कल के जमाने में क्या मुंबई क्या सउदी सब बराबर है। अनुसुइया जी जानती थी कि उसकी पुत्री किसी भी तरह मानने वाली नही मगर वो भविष्य भी साफ साफ देख पा रहीं थीं, फिर भी उन्होने चलते समय समझाने की अपनी एक आखिरी कोशिश की थी, किन्तु शायद राधिका के कान शब्द तो सुन सकते थे मगर शब्दों के पीछे छिपे भावों को समझने के सारे दरवाजे वो बन्द कर चुकी थी।
मन ना होते हुये भी विवेक राधिका के साथ एक हफ्ते के भीतर ही सउदी चला गया। राधिका की बातें सुनसुन कर वो खुश थीं कि अच्छा हुआ उन्होने अपनी बेटी का मन नही मारा। मगर कुछ ही दिन बाद सब धीरे धीरे बदलने लगा। राधिका वहाँ पर महिलाओं की स्थिति से रोज दो चार हो रही थी। मगर खुद को समझा लेती थी कि मुझे इन सबसे क्या। मेरे पास मेरा काम है, मेरा घर है और इस सबसे बढ कर हर परिस्थिति में साथ देने वाला उसका पति विवेक है। वो अक्सर खुद ये विवेक से कहती- विवेक आप ही मेरी माँ को मना सकते थे, अगर आप साथ न देते तो तो मां      कभी आने नही देतीं।
मगर तीन दिन पहले जो हुआ उसके बाद राधिका किसी भी तरह जल्द से जल्द अपने देश आने को व्याकुल होने लगी। दरअसल, तीन दिन पहले राधिका के पास एक महिला आई थी, अपने गर्भ का पता करने। एक बार में राधिका ने ऐसा करने से मना कर दिया, तो वह गिडगिडा कर बोली- आप मेरी जान बचा सकती हैं, अगर मेरे गर्भ में लडकी हुयी तो मेरे शौहर मुझे मार देंगे। उसकी बात सुन कर मेरे मन में कुछ आता इससे पहले वह बोली – अगर ये लडकी हुयी तो मैं इसे जन्म नही दूंगी। कुछ भी करके इसको दुनिया में नही आने दूंगी। मै हैरान थी कि क्या कोई माँ ऐसी भी हो सकती है? मैने उससे डॉट कर कहा – तुमको शर्म नही आती, तौबा करो, तुमको ऐसा गुनाह करने से डर नही लगता, कुछ तो अपने खुदा का खौफ करो। तुरन्त निकल जाओ यहाँ से वरना मै पुलिस को बुला दूंगी। वो रो रो कर कहने लगी – हमको पता है हम कोई गुनाह नही कर रहे, हम बेगुनाह है। मैं लगभग चीख सी पडी और उसको तुरन्त जाने को कहा। थोडी देर बाद मेरी नजर पास ही खडी एक नर्स पर पडी, ठीक से तो नही कह सकती कि वो अभी आयी थी या उसने मेरी उसकी बातें सुनी थी। रात को घर जाने से पहले वह मेरे पास आकर बोली- मैडम आप उसकी जान बचा सकती थी। मैने कहा- समीरा बी आप ये कह रही हैं ,सुना था आपने वो क्या कह रही थी। थोडी संजीदा होते हुये समीरा बोली- आप यहाँ के बारे में कितना जानती हैं, ये औरत जिसको अपना शौहर कह रही थी दरअसल वो उसका शौहर है ही नही, वो है लडकियों का सौदागर, ये दूसरे दूसरे मुल्कों से मजलूम लडकियों को जाता है, उनसे निकाह करता है, और फिर अगर लडका हुआ तो ठीक अगर लडकी हुयी तो, औरत को मार दिया और लडकी को अनाथाश्रम के रास्ते उसको अनाथ बताते हुये पहुँचा दिया बाजार। मैडम जी वो जानती थी कि अगर बेटी हुयी तो उसकी जिन्दगी में मरना तो तय है, चाहे जन्म से पहले मरे या जन्म के बाद रोज मर मर कर जिये और एक दिन फिर उसी की तरह किसी लडकी को जन्म देकर मर जाय।
रात भर मैं परेशान रही ये सोच कर कि मैने सही किया या गलत, क्या उसका औरत होना कुसूर था? क्या वो यहाँ से भाग नही सकती? क्या वो पुलिस की मदद नही ले सकती थी? बडी मुश्किल से सो पायी थी उस रात। सुबह देर से नींद खुली, विवेक अस्पताल जा चुके थे, मेरा सिर भारी हो रहा था, सोचा एक कप चाय पी लेती हूँ, चाय बना कर टेलीविजन ऑन किया, न्यूज का जो सीन मेरी आँखों के सामने था उसे देखकर हाथ में आ गयी मेज को अगर कस कर पकड ना लिया होता तो चक्कर खा कर गिर ही जाती। बीच बाजार में दो लोगों ने, पुलिस वालों की मौजूदगी में एक महिला का सरेआम कत्ल कर दिया था। न्यूज वाले बता रहे थे, उस पर अपने गर्भ में पल रही लडकी को मारने का इल्जाम था। और इसी कत्ल की उसे सजा दी गयी थी।

मेरी आँखो के सामने उसकी गिडगिडाती तस्वीर घूम रही थी जो रो रो कर रह रही थी- मैडम जी मैं बेगुनाह हूँ। तभी राधिका को माँ की याद आयी- बेटी माना अपने देश में पैसा खूब नही पर मान बहुत है। दूसरे ही पल उसके हाथ में मोबाइल था जो माँ के नम्बर को स्क्रॉल रह रहा था। 


* Image is referred from google.  and story is based on imaginations, if something match with any reality then it will be a purely coincidence.  my aim is not to heart anyone.

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

स्त्री - भोग्या नही भाग्य है


मेरी मुस्कान, कब बन गयी मौन स्वीकृति
वो स्वीकृति जो मैने कभी दी ही नही
वो स्वीकृति जो चाहता था पुरुष
कभी अनजानी लडकी से, कभी अपनी सहकर्मी से
कभी अपनी शिष्या से, कभी जीवनसंगिनी से
खुद से ही गढ लेता है पुरुष
वो परिभाषायें जैसा वो चाहता है
और परिभाषित कर देता है
स्त्री का पहनावा, उसकी चाल ढाल
अधिकारी बन जाता है समाज
आंचल में ट्कने को अनगिनत नाम
हद की पराकाष्ठा को भी पार करते हुये
अपने हिसाब से रच देता है उसका चरित्र
दोषी बन, नजरें छुपाये ताने सुनती है वो
छलनी की जाती है जिसकी अस्मिता 
तार तार हो जाता है सुहागिन बनने का सपना
और लुटेरा छलता रहता है जाने कितने सुहाग
कब समझेगा दम्भी, अभिमानी पुरुष
बल से मिलती है जय, सिर्फ संग्राम में
स्त्री रण नही, दामिनी है मानिनी है,
शक्ति का प्रतीक, जीवन की निशानी है
लाखों वीर्य करते हैं झुक कर निवेदन,
तब कभी किसी एक को मिलती है अनुमति
अपने अस्तित्व को विकसित करने की
स्त्री की पनाह में पलता है, बनता है
स्त्री करती है पल पल रक्षा
देती है अपना रक्त बनाने को तेरा नैन नक्शा
स्त्री स्वयं जया है, अविजित है
पुरुष तो अस्तित्व के लिये ही आश्रित है
उसे आश्रिता कहने की ना कर भूल
ना कर विवश कर कि बन जाय वो शूल
जिस दिन करेगी वो इन्कार बनने से जननी
पुरुष बिन कुछ किये ही मिट जायगा
धरा का अस्तित्व ब्रहमाडं से मिट जायगा
ना होगा पुरुष, ना होगी स्त्री,

हो जायगी एक पत्थर सी पृथ्वी

बुधवार, 11 मई 2016

२१ वीं सदी में स्त्री की स्थिति का जिम्मेदार कौन?


हम औरते अक्सर बात करते हैं कि सदियों से मर्द औरतों पर अत्याचार करते आ रहे हैं। स्त्री को प्रताडित किया जा रहा है वगैरह वगैरह…… कभी किसी पुरुष को ये कहते नही सुना गया कि वो भी प्रताडित होता है। आखिर क्या है सच? समाज में आज जो भी स्थिति स्त्री की है क्या उसके लिये सिर्फ पुरुष ही जिम्मेदार है? क्या स्त्री खुद अपनी स्थिति के लिये जिम्मेदार नही?
चाहे एक पढी लिखी लडकी हो, या घरेलू लडकी, चाहे वो स्वयं अपना वर चुने या घर के सदस्य, उसके ख्वाबों में एक ऐसा लडका होता है जो उससे ज्यादा सक्षम हो, ज्यादा आत्मनिर्भर हो। क्यों चाहती है हमेशा अपने से ज्यादा? क्या उसे अपनी क्षमता पर भरोसा नही? क्यों वह समाज में यह बात गर्व से नही कह पाती कि उसे मात्र इक सच्चा और नेक जीवनसाथी चाहिये, उसे उसके स्टेटस, उसके सेलरी पैकेज, उसके बैंक बैलेंस से कोई लेना देना नही।
आदमी जानता है कि एक लडकी उसे तभी पसन्द करेगी जब वो उससे उच्च हो खास कर आर्थिक मामले में, और इसीलिये शेष जीवन वो गर्व करता है, तब स्त्री कहती है कि घर में उसकी उपेक्षा की जाती है। क्यों कोई माँ जब अपनी बहू खोजती है तो अपने पुत्र से ज्यादा योग्य लडकी को बहू के रूप में चुन नही पाती, वो चाहती है कि उसका बेटा किसी भी मामले में अपनी पत्नी से कम ना हो। यानि कि एक स्त्री दूसरी स्त्री को उच्च पदस्त नही देख सकती। एक स्त्री ही समाज मे उस लडकी के चाल चलन पर पहला प्रश्न उठाती है, जब वो काम करके घर देर से आती है या बाहर किसी पुरुष मित्र के साथ घूमती हुयी दिख जाती है। क्यों वह उस लडके के चरित्र पर कोई प्रश्न नही उठाती।
स्त्री दुखी हो तो वह रो सकती है मगर बेचारा पुरुष उसे तो समाज ने रोने का अधिकार भी नही दिया। पति से झगडा हो तो पत्नी का पहला हथियार होता है – मायके जाने की धमकी, मगर पति उसके पास क्या है?  एक आदमी जो रोज घर से बाहर काम के लिये जाता है, मेहनत करता है, कभी कभी साथ लाया हुआ टिफिन भी नही खा पाता, भाग भाग कर लोकल ट्रेन पकडता है, रास्ते में सोचता है कि जाते हुये अभी हुये भिन्डी टमाटर खरीदने है, और घर पहुँचते ही उससे कहा जाता है कि ये क्या आपसे तो ठीक से सब्जी भी नही लायी जाती, ज्रा सी चीज याद नही रहती, खुद से ये भी नही होता कि धनिया मिर्च भी लेते आते। मगर बेचारा आदमी घर की सुख शान्ति बनी रहने के लिये बस मुस्करा कर कह देता है – देवी जी कल ध्यान से लेता आऊंगा। चलो एक कप चाय बना दो।
और यही पुरुष अगर गलती से थकान के कारण या आफिस की परेशानी के कारण गुस्सा हो जाय तो फिर तो घर का माहौल देखने ही वाला होता है। निकल आते है सारे अचूक बाण तरकस से, मै दिन भर काम करती रहूँ, मरती रहूँ, और फिर ये गुस्सा भी देखूँ। चुप चाप पुरुष सुन ले तो बेहतर वरना तो रोना तय ही है। फिर कहाँ खाना कहाँ चाय।
क्यों हम नही समझ पाते पुरुष मन, उसकी परेशानियां, क्यों नही समझ पाते कि वो घर के लिये उतना ही करता है जितना हम स्त्रियां। बहुत सारी बातें है, जिन पर विचार करना होगा। पुरुष सदैव स्त्री को दबाता नही, उसको पूजता भी है, उसका उपकार भी मानता है। और कई बार स्त्री खुद को पुरुष से ऊपर देखने का साहस नही जुटा पाती। पुरुष मन चाहता है एक ऐसी स्त्री जो उसका सम्बल बने, मुश्किल समय में उसे धैर्य दे। हम स्त्रियों को अपने नजरिये में बदलाव लाना होगा। ये बदलाव ही हमारी मजबूत पहचान बनायेगा।  

बुधवार, 6 अगस्त 2014

नारी


एक अबला आकार
कहते जिसे नारी,
दो मात्राओं से
नर पर है भारी।
वैसे तो है ये
जीवन का आधार,
मगर पुरुष मानता
इसे निराधार।
पत्थरों में पूजता
शक्ति के रूप में,
बल से चोट करता
छाया या धूप में।
मिटाना चाह रहा
हमारा अस्तित्व,
जाने कैसे बचायेगा
अपना व्यक्तिव।
ललकारती हूँ आज
ऐ बली नर तुझे,
मिटा कर रख दे
आज बस अभी मुझे।
कम से कम धरा से
जीवन तो खत्म हो,
एक स्वस्थ स्रुष्टि की

शायद रचना तब हो।
GreenEarth