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मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018

मुकद्दमें जब चलाये जाते हैं



बेदिल दिल देखे उनके
जो दिलवाले कहलाते हैं
चराग बाटंने वाले अक्सर
रातों में ख्वाब जलाते हैं

कहाँ दिखेगें दाग भला
सफेदपोशों के दामन में
गुनाहो का कारोबार तो ये
खाली पेटों से करवाते हैं

कैसे ढूंढेगा कोई भला
अंधियारे में उजियारे को
सच को बदनाम झूठ के
जब नकाब पहनाये जाते हैं

कहने से भला कहाँ होगा
इश्क आजाद मजहब से
इंसा तो क्या खुदा पर भी
जब मुकद्दमें चलाये जाते हैं

किस हद तक और गिरेगा
हैवान अपनी हैवानियत से
इंसा छोडो, मुर्दो पर भी
जब इल्जाम लगाये जाते है

बुधवार, 12 सितंबर 2018

आस पर विश्वास



दुर्वासा ऋषि  दुर्योधन की कपटता से पूर्णतः अनभिज्ञ थे, दुर्योधन ने उनसे अनुरोध किया कि जैसे आपने हमे अपनी सेवा का मौका दिया उसी तरह वह उसके पांड़्व भाइयों को भी अपनी सेवा का अवसर देने की कृपा करें। दुर्वासा जी दुर्योधन के छल को न समझ और अपने अन्य ऋषियों के साथ पांड़्वो के पास पहुंचने का निश्चय किया। संयोगवश जब वह पांड़्वो की कुटिया पहुँचते हैं, रानी द्रौपदी भोजन समाप्त कर अक्षयपात्र भी धुल चुका होती हैं। राजा युधिष्ठिर चिंतित होते है कि अब अतिथियों को भोजन कैसे कराया जायगा, किन्तु रानी द्रौपदी सरलता से कह देतीं है, आप ऋषियों से स्नान करके आने को कहिये, मै भोजन का प्रबन्ध करती हूँ। युधिष्ठिर विस्मय में पड जाते हैं, उन्हे समझ नही आता कि द्रौपदी आखिर किस प्रकार भोजन का प्रबन्ध करोगी। वो अधीर हो द्रौपदी से कहते हैं- प्रिये- तुम अक्षयपात्र तो साफ कर चुकी हो, और एक बार साफ करने के पश्चात एक ही दिन में दुबारा इसमें भोजन पकाना सम्भव नही, फिर किस भांति तुम अतिथियों के भोजन का प्रबन्ध करोगी, मैं ऋषि श्रेष्ठ से क्षमा याचना कर लेता हूँ। तब दौपदी ने कहा- आर्यपुत्र – मुझे अपनी आस पर विश्वास है। मेरे कृष्ण मेरी आस हैं, और उनके रहते चिंतित होने की तनिक भी आवश्यकता नही। मेरे कृष्ण ने तो अब तक कुछ विचार कर ही लिया होगा। अतएव आप निश्चिन्त हो और अतिथियों के शेष स्वागत की तैयारी कीजिये।

जीवन में कई बार ऐसा होता है जब स्वयं का विश्वास भी पर्याप्त नही पड़्ता हमे कई काम असम्भव जान पड़्ते हैं, तब हमे जिस पर भी भरोसा होता है उसके विश्वास के बल पर हम वह असम्भव भी कर जाते हैं। 

बुधवार, 22 अगस्त 2018

कुछ यूं ही



बडी खामोशी से हमने चुन ली खामोशी
बेअदबी ही अदब जबसे जमाने में हुआ

किससे करे शिकायत किसकी करे शिकायत
दामन में दागों का फैशन जरा जोरों पे है

खुदा का शुक्र जो बक्शा भूल जाने का हुनर
कुछ तो बच गया जिगर लहू लुहान होने से

तबाहियों के मंजर पे जाता दिखता है जमाना
बर्बादियां जब तरक्की की नुमांइन्दगी करती है

बडे शौक से दफन किये जाइये तहजीबो उसूल
नूर परख पाना हर किसी के बस की बात नही

जिधर भी देखा उधर मुखौटे ही मिले
एक मुद्दत से हमने चेहरा नही देखा

तालियों की गडगडाहटें बता देती हैं
खुशी का मंजर है या खुशामद का हुजूम

कुदरत गर्म औ लहू का सर्द मौसम हुआ 
कुछ बारिशें है जरूरी इन रेगिस्तानों में

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

जरूरत का फूल



नही दे सकती स्नेह का जल
सीचंने को नवजात जीवन
कि सुनती हूँ उसके रोने में
चीखें तीन जिन्दा, चार मॄत
और दो अंकुरित मादा लाशों की
जानती हूँ अच्छी तरह
निर्दोष है पूरी तरह
ये नन्हा सा जीव
बाहें पसारे आतुर है
मेरे स्पर्श को
जो इसका अधिकार भी है 
और मेरा दायित्व भी
मगर उसके मासूम से चेहरे में
आने लगता है मुझे नजर
मॄत्यु का ताडंव
याद आती है वो यातना
जब मन चीख चीख कर
मना रहा होता था मातम
और नोचा जा रहा था ये शरीर
जहाँ थी मै मात्र एक मशीन 
जिसमे डाला जा रहा था बीज
जबरदस्ती अहंकार के साथ
कि कैसे नही उगेगा इस धरा पर
पुत्र नाम का पौध
यही तो है वो 
जिसके सहारे बढेगी वंश की बेल
जिसे पल्लवित करने के लिये दी गयी बलि
मेरी जन्मी अजन्मी बेटियों की
चारो तरफ से आने वाली बधाइयों में
सुनती हूँ अपनी बेटियों की बेबसी
जिन्हे नही दे सकी अपना हाडं मास
बस धीरे धीरे हर बार थोडा थोडा
मरती रही मेरी ममता
मरता गया मेरा ममत्व
और आज लेबर रूम से बाहर
एक नवजात शिशु के साथ निकली
एक ऐसी जिन्दा औरत
जिसके अन्दर दमतोड़ चुकी थी मां
इस अबोध की आवाज में सुन रही हूँ
अट्टहास एक आदमी का
जो कह रहा है
देखा मै आ गया
जान लो, तुम हो सिर्फ एक औरत
क्या हुआ जो है
जन्म देने का अधिकार तुम्हारे पास
दुनिया में तो वही आयगा जिसे मैं चाहूंगा
रुई के इस फाहे को भूख से बिलखता देख भी
नही फूटता प्रेम का कोई अंकुर
सूख गयी है छाती रेत की तरह
और चट्टान की तरह निष्प्राण हो गया है सीना
फिर भी शायद इस शुष्क तन में 
कहीं बची रह गयी है स्त्री 
जो देगी ही जीवन
इस जरूरत के फूल को
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