नही दे सकती स्नेह
का जल
सीचंने को नवजात जीवन
कि सुनती हूँ उसके
रोने में
चीखें तीन जिन्दा,
चार मॄत
और दो अंकुरित मादा
लाशों की
जानती हूँ अच्छी तरह
निर्दोष है पूरी तरह
ये नन्हा सा जीव
बाहें पसारे आतुर है
मेरे स्पर्श को
जो इसका अधिकार भी है
और मेरा दायित्व भी
मगर उसके मासूम से चेहरे
में
आने लगता है मुझे नजर
मॄत्यु का ताडंव
याद आती है वो यातना
जब मन चीख चीख कर
मना रहा होता था मातम
और नोचा जा रहा था
ये शरीर
जहाँ थी मै मात्र एक मशीन
जिसमे डाला जा रहा
था बीज
जबरदस्ती अहंकार के साथ
कि कैसे नही उगेगा इस धरा पर
पुत्र
नाम का पौध
यही तो है वो
जिसके सहारे बढेगी
वंश की बेल
जिसे पल्लवित करने
के लिये दी गयी बलि
मेरी जन्मी अजन्मी
बेटियों की
चारो तरफ से आने वाली
बधाइयों में
सुनती हूँ अपनी बेटियों
की बेबसी
जिन्हे नही दे सकी
अपना हाडं मास
बस धीरे धीरे हर बार
थोडा थोडा
मरती रही मेरी ममता
मरता गया मेरा ममत्व
और आज लेबर रूम से
बाहर
एक नवजात शिशु के साथ
निकली
एक ऐसी जिन्दा औरत
जिसके अन्दर दमतोड़
चुकी थी मां
इस अबोध की आवाज में
सुन रही हूँ
अट्टहास एक आदमी का
जो कह रहा है
देखा मै आ गया
जान लो, तुम हो सिर्फ
एक औरत
क्या हुआ जो है
जन्म देने का अधिकार
तुम्हारे पास
दुनिया में तो वही
आयगा जिसे मैं चाहूंगा
रुई के इस फाहे को
भूख से बिलखता देख भी
नही फूटता प्रेम का
कोई अंकुर
सूख गयी है छाती रेत
की तरह
और चट्टान की तरह निष्प्राण
हो गया है सीना
फिर भी शायद इस शुष्क तन में
कहीं बची रह गयी है स्त्री
जो देगी ही जीवन
इस जरूरत के फूल को