
नील गगन के तले धरा पर
पीली चादर सरसों की
ओढे चुनरिया मानो बिरहन
राह निहारे प्रियतम की
सुध बुध खोई ,मगर ना खोई
आस अभी तक मिलने की ।
प्रभु के नाम सी जपती रहती
माला वो तो साजन की ॥सता रही है बनकर बैरन
पवन ये देखो अगहन की
ओढे चूनर …………….
कह के गये थे आ जाओगे
तुम दो चार महीनों में ।
कसम भी ये दे कर गये थे
आँसू ना लाना नयनों में ॥
याद नही आती क्या तुमको
घर आँगन या बगियन की
ओढे चूनर…………