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शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

बस तुम ही हो मेरा जीवन....................


मै नही देती हक किसी को
मुझे जीता या हारा कहने का
मुझे नही होती खुशी
अपनी झूठी तारीफ सुन कर
मुझे तकलीफ भी नही होती
जब बेगाने इंगित करते है कमियां मेरी
मुझे नही मिलती राहत
परायी संत्वनाओं से किसी पल
नही बहते मेरे आंसू
जब खो जाती है मेरी कोई चीज
ऐसा नही मुझे खुशी या गम
महसूस नही होता
रो पडती हूँ देखकर
आंसुओ की आहट माँ की आंखो में
बेबस हो जाती हूँ ये सुनकर
जब वो कहती है
कैद कर लिया है मैने खुद को
घर की चार दीवार में
क्योकि नही दे पाती वो जवाब
जमाने के सवालों का
गुनाह बस उसका है इतना
नही कर पाई है वो हाथ पीले अपनी बिटिया के
नही बेच पाई वो अपने जिगर के टुकडे को
किसी योग्य वर के हाथों में
माँ कैसे यकीन दिलाऊं
मै खुश हूँ तेरे आंचल में
मुझे नही लगती कोई कमी
अपने इस खुशहाल जीवन में
मै खुश नसीब हूँ कि आज भी
मिलती है तेरे हाथ की रोटी
और आ जाती है सुकून की नींद
तेरी जन्नत सी गोद में...............

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

माँ --- ईश्वर का आशीर्वाद


कामता आज जब काम करने आयी तो उसके साथ करीब तीन साल की छोटी बच्ची भी थी। आते ही बोली- बीबी जी ये मेरी बहन की बेटी है, इसी को लेने मै गांव गयी थी। इसके जनम के साथ ही मेरी बहन मर गयी थी, और मेरा जीजा साल भीतर ही दूसरी को ब्याह लाया। पहले तो थोडा ठीक रहा , मगर अब तो इस बेचारी को दूध की तो कौन कहे, पानी पर भी जीने के लाले है। बिन माँ की तो थी ही, अब तो बाप के रहते भी, बिन बाप की ही हो गयी। अब मै इसकी माँ तो नही मगर माँ जैसी तो हूँ ही, आखिर मेरी बहन की आखिरी निशानी है, कइसे देख सकती थी, इस नन्ही ही जान को मरते सो इसको ले आयी। अब आज से मै ही इसकी माँ भी हूँ और बाप भी। जाने कैसी कठोर दिल की है वो जो इस मासूम की सूरत देख कर भी नही पसीजती। मगर बीबी जी भगवान भी सबका हिसाब कर ही देते है, तीन बरस मे तीन मरे हुये बच्चों को जनम दे चुकी, पर अकल आज भी नही आयी। चलूँ काम कर लूँ, आप बस जरा इसको देखे रहियेगा, वैसे तो ये यही कोने मे बैठी रहेगी।

कामता की बाते सुन कर ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे मुंह पर जोर का तमाचा लगा दिया हो, कि क्या मै रेनू के लिये माँ जैसी बन सकी, क्या मुझमे और इस बच्ची की सौतेली माँ मे कोई फर्क नही। क्या इसी कारण से मै भी आज तक माँ नही बन सकी? क्या भगवान मुझे भी माँ जैसे रिश्ते को अपमानित करने की मुझे सजा दे रहे हैं? क्या मैने रेनू से उसके पिता को नही छीन रखा? क्या शादी से पहले जब नवीन ने मुझसे वादा लिया था कि तुम रेनू की माँ पहले और मेरी पत्नी बाद मे होगी, उस वादे को नही तोड दिया था ? क्या अगर आज रेनू की भी कोई मौसी होती तो वो भी रेनू को यहाँ से ले जाती - मेरे अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिये। क्या रेनू इस बच्ची से भी ज्यादा अभागी है जिसके पास कम से कम कामता जैसे मौसी तो है जो उसे माँ बाप दोनो का प्यार देगी। और एक रेनू है जिसे मैने आज तक माँ कहने का भी अधिकार भी नही दिया। शुरु शुरु मे तो नवीन ने कई बार मुझे समझाया कि- अरुणा, कहने दिया करो ना रेनू को माँ, तुम माँ ही तो हो उसकी, मगर मैने ही उसे कभी माँ नही कहने दिया। धीरे धीरे पिता पुत्री एक के बाद एक समझौते करते गये, और मै उसको अपनी विजय समझती गयी। क्या कामता परोक्ष रूप से मुझे ही सुना कर गयी थी, कि महलों और झोपडो मे कोई अन्तर नही। दोनो मे ही रहने वाले लोग छोटे भी हो सकते है और बडे भी। आज कामता मुझसे कही बडी बन गयी थी, और उसके सामने मै खुद को बहुत बौना महसूस कर रही थी। तभी एकाएक पहली बार मन से अपने अधूरेपन के अहसास मिट गया, आज मैने अपने भीतर छुपी माँ को पा लिया था। तभी ध्यान घडी पर गया। रेनू की बस आने का समय हो गया था, रोज कामता को ही भेज देती थी उसको लाने के लिये। फटाफट अलमारी से पर्स उठायी, घडी की तरफ देखा, बस आने मे दस मिनट है अभी, कोने की दुकान से उसके लिये चाकलेट ले लूंगी । कामता को आवाज लगायी- मै जा रही हूँ- रेनू की बस का टाइम हो रहा है, तुम काम बन्द करके इस बच्ची को देख लो। और तेज कदमों से बस स्टाप की और चल दी, उसी रफ्तार से जैसे एक माँ अपनी बच्ची को लेने जाती है,.............

शनिवार, 12 जनवरी 2013

नारी मन


वो ख्वाब किसी की आंखों का, वो शब्द किसी की बातों का,

जीवन के हर क्षण में वो, वो आधार  सभी की सांसों का

रूप बदल बदल वो आये, हर रूप में सबका साथ निभाये

बिन उसके जीना असम्भव, पर सभी को ये समझ ना आये

दुनिया कभी पूजती उसको, कभी करती है उसका अपमान

नादां लोग ना जा सके, है उसके मान में ईश का मान

वो जीवन की धुरी धरा पर, उसका जीवन ही खतरे में

जब प्रहरी भी बन जाते भक्षक, तो बचे वो कैसे पहरे में

गॄहलक्ष्मी को ग्रहण लगाते, आंखों के तारे राहू बन जाते

कहने को ज्ञानी कहलाते, पर "नारी मन" समझ ना पाते

बुधवार, 15 जून 2011

बदलते इन्तजार



आज लगभग ४ महीने के बाद मै पुनः इस ब्लाग की दुनिया में वापस आ रही हूँ । इस बात की मुझे हार्दिक खुशी है कि एक दिन के लिये भी कभी आप लोगों ने मुझे अपने आप से दूर नही किया । सदैव मेरा उत्साह बढाया और लिखने के लिये प्रेरित करते रहे । यह आप सभी के अशीर्वाद और स्नेह का परिणाम ही है कि मै फिर से लिखने का साहस कर पा रही हूँ , इस विश्वास के साथ की पहले से कही अधिक आप सभी का सहयोग मुझे मिलेगा , मेरी त्रुटियों को सुधारने में अच्छे लेखन में आप मेरी मदद करेंगें ।

यह कहानी एक ऐसी औरत की है जो हमारे आपके आस पास जीती है । कभी आप इसे चाची कह कर पुराकते है कभी दादी । मै और मेरे आस पास के लोग इनको रुक्मी ताई के नाम से जानते है । रुक्मी ताई जो कभी पूरे मोहल्ले की जान हुआ करती थी , आज उनकी सांसे तो चल रही थी , मगर जीना भूल चुकी थी । आज मुझे वो समय याद आता है ,जब वो अपने हेमू में अपना भविष्य खोजती दिन रात काम में लगी रहती थी । किस तरह उन्होने एक साधारण से मकान को सुन्दर से घर में बदल दिया था । बस दिन रात उनकी आखों में यही सपना सजता था की कब उनका नन्हा सा हेमू (हेमन्त) बडा होगा और पढ लिखकर एक बडा आदमी बनेगा ।

जिस मुश्किल दौर को उन्होने देखा था वो उसकी परछाई भी उस पर नही से पडने देना चाहती थी । आखिर एक वो भी दिन आया जब उनकी बरसों की मेहनत और इन्तजार  सच्ची खुशियों के  रंग ले कर लौटे ।

देश के सबसे अच्छे इंजीनियरिंग कालेज में हेमू को आज दाखिला मिल गया था ।धीरे धीरे समय मन से भी तेज रफ्तार से चलने लगा । रुक्मी की आंखों मे उसकी एक अच्छी सी नौकरी का सपना पलने लगा था । ईश्वर ने भी जैसे उसके हर एक सपने को पूरा करने की ठान ली थी । उसको एक विदेशी कम्पनी में नौकरी मिली थी । रुक्मी ताई ने पूरे सवा पाँच किलो के बेसन के लड्डू का बजरंग बली जी को भोग चढाया था । उसके जाने की तैयारी में उन्होने दिन रात एक कर दिये थे । उनका बस चलता तो वो एक दो महीने के लिये खाने का सामान बना देती ।

फिर वो भी दिन आया जब वो घर में अकेली रह गयी । फिर भी मन में संतोष और आँखे खुशी के आंसुओं से भरी थी । हेमू से फोन पर हुयी पाँच - दस मिनट की बात को वह पूरे मोहल्ले में घंटों सुनाया करती थी । और फिर धीरे धीरे शुरू होने लगा वापस आने का इन्तजार ।

कई बार सोचती कि बडी गलती हुयी उनसे , हेमू की शादी कर देती तो ठीक रहता , कम से कम विदेश में उसको खाने की परेशानी तो नही उठानी पडती । फिर सोचती कि इस बार आने पर उसकी शादी जरूर कर देगीं । फिर तो उनका सारा दिन लडकी ढूंढने में ही निकलने लगा । एक रिश्ता उन्होने लगभग तय ही कर दिया था , बस इन्तजार था हेमू की हाँ का । आज दो साल बाद हेमू दीवाली पर घर आ रहा था या ये कहा जाय कि  रुक्मी ताई की दीवाली आज दो साल बाद ही आई थी । उनका राम सा बेटा आज अपने घर आया था , बस उनको अब इन्तजार था सीता सी बहू लाने का । मगर जब उनको पता चला कि उनके बेटे ने अपने लिये पत्नी देख ली है , तो पहले तो उन्हे थोडा दुख हुआ , दुख इस बात का नही था कि उसने लडकी स्वयं ही पसन्द कर ली थी , वो उनकी जाति की नही थी , मगर उन्होने इस दुःख को अपने चेहरे पर भी नही आने दिया था । खूब धूम धाम से शादी हुयी , हर किसी से कहते नही थकती कि मेरी बहू लाखों नही करोंडों में एक है , दूसरी जाति की है तो क्या , संस्कारों की उसमें कोई कमी नही ।  मै  मूरख तो सात जनम भी अपने हेमू के लिये ऐसी बहू नही ढूँढ पाती ।

शादी के १० -१५ दिन बाद जब वो दोनो घूम कर लौटे , तब माँ के मन में आस जगी कि कुछ दिन दोनो उसके पास रहे , मगर हेमू ने कहा- माँ सारी छुट्टियां खत्म हो चुकी है , लेकिन माँ अब हम साल मे एक बार पूरे एक महीने के लिये आपके पास आया करेंगें । मगर ना साल बीता ना वो महीना आया । आँखे रास्ता देखती रहीं , खबरें मिलती रहीं , रिश्ते बढने लगे  , अब वो एक माँ से दादी बन चुकी थीं । पोते के चेहरे को तरसती आँखों में भी खुशी की चमक थी । इस खुशी मे उन्होने कितनों को कितनी मिठाई खिला दी थी , इसका हिसाब तो ब्रह्मा जी भी नही रख सके होंगें । वादे होते रहे मगर सिर्फ टूटने के लिये । अब उसमें अपने दर्द को आचंल में बाँध कर रखने की क्षमता खत्म सी हो चली थी , और दर्द ने आँखों के किनारों से निकलनें का रास्ता देख लिया था । पुत्र विछोह उनकी आँखों के आइने में साफ नजर आता था । मगर आस थी कि नदी के किनारे की तरह नदी के बहाव का साथ दिये थी ।

मुझे याद है वो दिन जब मै उनके घर पर ही थी , कि हेमू का फोन आया था । ताई जी कह रही थी - बेटा बस चाहती हूँ मरने से पहले एक बार अपने पोते को देख लेती । मगर शायद हेमू उस दर्द को महसूस नही कर पा रहा था जिसे मैं पराई होकर भी देख रही थी , हँस कर बोला - माँ आप भी ना हमेशा मरने की ही बात क्यों करती हो , मै आने की कोशिश कर रहा हूँ , मगर यहाँ से आना इतना आसान नही होता | आप ऐसा क्यों सोचती हैं कि मै आना नही चाहता , माँ मुझे बहुत दुख हो रहा है कि एक माँ ने ही अपने बेटे की मजबूरी को नही समझा ।

उस दिन की बात के बाद तो रुक्मी ताई बिल्कुल अनमनी सी रहने लगी , जैसे जीने की इच्छा ही खत्म हो गयी हो , शायद अब उनका हर इन्तजार खत्म हो गया था । तीन दिन बाद ही उन्होने प्राण त्याग दिये । जाने से एक दिन पहले उन्होने मुझे बुला कर कहा था - बेटी मेरे मरने की खबर हेमू को ना देना , वो बेचारा परेशान हो जायगा , और फिर इतनी दूर से तुरन्त आना मुंकिन भी नही होगा । बस तुम मेरे जाने के बाद इस घर में रोज दिया - बाती कर दिया करना । हेमू के आने तक मै उसका इन्तजार इसी घर में करूगीं । मुझे विश्वास है वो समय मिलते ही अपनी माँ से मिलने जरूर आयगा और फिर   तब मैं हमेशा के लिये उसी के पास जा कर रहूंगीं ।

क्या वाकई मरने के बाद भी इन्तजार खत्म नही होते ? क्यों इन्तजार कभी कभी इतना बेदर्द हो जाता है कि जीवन को उसके सामने घुटने टेकने पड जाते हैं ? क्यों हम ऐसा इन्तजार करते है ? ये कुछ ऐसे प्रश्न है जिनके जवाब मैं आज तक ढूँढती हूँ , मगर आज तक अनुत्तरित ही हूँ । बस इन्तजार है कि शायद कभी मुझे मेरे सवालों के जवाब मिल जायें ।


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