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शनिवार, 4 अप्रैल 2015

प्रभा


उम्र के साठ बसन्त, पतझड और सावन देखने के बाद, आज दिल में अचानक जिन्दगी जीने की ख्वाइश पता नही कहाँ से जाग उठी। ये खवाइश तो दिल में तब भी नही उठी जब हाथों में मेंहदी रचाये, पायलों के मधुर संगीत के साथ आँखों में सतरंगी सपने लिये नव जीवन में प्रवेश किया था। जीवन जीने की ख्वाइश होती है ये सोचने का भी वक्त कहाँ मिल सकता था, विवाह बंधन में बंधते ही तीन बच्चों की जिम्मेदारी की कुंजी पाने वाली नववधू को। मिला था एक कठिन लक्ष्य, पत्नी बनाने के सौभाग्य के साथ मिला था सौतेली माँ का कलंक। जिसे मैं अपनी ममता और समर्पण से दिन रात धुल रही थी । मुझे एक ऐसी तलवार की धार पर जीवन मिला था कि चाहे कुछ भी करती, मेरा छलनी होना निश्चित था।
बच्चों को संवारने की कोशिश में जब भी उन्हे थोडी सी तपिश देती, मेरी आत्मा मेरे अपनों के शब्द बाणों से छलनी हो जाती। आखिर सौतेली माँ जो थी, एक ऐसी माँ जिसे ना तो अपने बच्चे को डाँटने का अधिकार मिलता है, ना दंड देने का। तो क्या हुआ जो मैने निर्णय कर लिया था कि मै सिर्फ यशोदा ही बनूंगी, देवकी नही।
मुझे सिर्फ अपने गले में पडे मंगल सूत्र को देख कर ही याद आता कि मै पत्नी भी हूँ। 
समय चक्र मे बहुत कुछ मिलता और छूटता गया। कई मकसद थे जिन्हे पूरा करते करते आज ऐसी जगह आ गयी थी कि अपना नाम भी आज याद करना पड रहा था।
जिस घर को अपना सर्वस्व समझ चालीस साल पहले आयी थी, आज उसी देहरी पर सब कुछ छोड आयी थी। 
कैसे मेरे मन में खुद को फिर से तलाशने की ख्वाइश जगी , कह नही सकती। कुछ था जो बरसों से अन्दर ही अन्दर टूट रहा था, कुछ था जो मुझे सब कुछ छोडने नही दे रहा था। कितनी बार मन चाहा था, दिखावे की दुनिया और बेमकसद से रिश्तो को तोड देने का। 
आज बरसों के बाद मेरे अन्तस में चुपचाप गुमसुम सी बैठी प्रभा ने मुझे पुकारा था। और चल पडी थी मै एक नयी राह पर सारे पुराने रिश्तों और बन्धनों से मुक्त एक नये आकाश की ओर उस प्रभा को नयी पहचान देने जो बरसों से मद्धिम सी पडी थी मगर उसमें अभी भी चमकने की चाह कही सांस ले रही थी। 

बुधवार, 31 दिसंबर 2014

कुंडली


एक अनसुलझा सा प्रश्न या सुलझा सा उत्तर ये कहना तो आसान नही। जन्म के साथ ही लिख दिया गया मेरा कर्म, वो कर्म जिसे मेरे नन्हे से हाथों ने अभी किया तो नही था मगर भविष्य के गर्भ में उसका अंकुर प्रस्फुटित हो चुका था। जन्म के सात दिन बाद ही मेरे जीवन काल की रेखा और उस पर सुख दुख के बिन्दुओं को आचार्य सत्यानन्द ने अपने काल के गणित से कुंडली की धरा पर चिन्हित कर दिया था।
अब यदि कुछ शेष बचा था तो वो था मेरा उन बिंदुओं को जोडते हुये अपने जीवल के पलों जीते हुये निर्धारित सभी सुख के पर्वतो पर चढते और दुख के बादलों में घिरते जूझते मृत्यु की चौखट तक पहुँचना। जब से होश संभाला, कुछ भी अच्छा हो जाने पर आचार्य सत्यानन्द जी की वाणी और विद्या को शत शत नमन किया जाता, और अशुभ होने पर समय की प्रबलता की व्याख्या की जाती।
स्वयं को इस विचारधारा से बहुत दूर रखने पर भी कई बार इसके भ्रमरजाल में खुद को जकडा पाती। आज पता नही सौभाग्य से कहूं या दुर्भाग्य से मुझे मेरी कुंडली मिल गयी जिसे माँ ने शायद बहुत जतन से ऐसे छुपा कर मेरी नजरों से दूर रखा था जैसे कोई कोई चिडिया अपने नन्हे से बच्चे को बिल्ली से बचा कर रखती है। उस कुंडली में मेरी आयु रेखा ३२ वर्ष निर्धारित की गयी थी। इस सावन की पूर्णिमा से मै ३१ सावन की गिनती पूरी करने वाली थी।
नानी की मोती की माला जो मुझे बहुत पसंद थी और जिसे माँ हमेशा देने से मना कर देती थी, आज उनकी अनुपस्थिति में खोजने लगी थी, और जिसे खोजते खोजते मुझे अपने जीवन की माला मिल गयी थी, जिसमें मात्र ३२ मोती थे। मैं चाह कर भी माँ के विश्वास को जीतता हुआ नही देखना चाहती थी, इसलिये नही कि प्रश्न मेरे जीवन या मरण का था, बल्कि इसलिये की प्रश्न था उस काल का जिसे कोई भी नही देख सकता था , उसे कैसे कोई भविष्यवक्ता अपनी गणित के गुणा भाग से संख्या में बदल सकता था।
मगर क्या वाकई मैं माँ के अटूट विश्वास को हरा सकी थी। एक वर्ष बाद जब मैं घर से मीलों दूर बैठी थी, मेरी ऐसी मानसिक स्थिति हुयी कि मुझे माँ को पत्र लिखना ही पडा - आपकी बेटी कल तक आपसे मीलों दूर थी, किन्तु फिर भी आपसे मिलने की उम्मीद थी, आज आपकी सारी उम्मीदों को तोड कर आपसे बहुत दूर जा रही हूँ, जहाँ आपसे मिल पाने की सारी सम्भावनायें क्षीण हो जाती है
पत्र पढकर माँ की ह्दय गति यदि नही रुकी होगी तो सम्भवतः इसीलिये क्योंकि काल के दर्पण में घटित होने वाली इस दुर्घटना का प्रतिबिम्ब उन्हे बहुत पहले ही मेरी कुडंली में दिख गया था, जिसे वो सदैव मेरी नजरों से ओझल रखना चाहती थी कि कही उनकी कोमल हदया बेटी का हदय अपनी म्रूत्यु की छाया को देख कर समयपूर्व ही उदासीन मृत्यु का वरण ना कर ले।
मगर समय के पटल पर क्या लिखा है इसे शायद अक्षरशः कोई महाज्ञानी भी शायद नही पढ सकता ।
उस दिन मेरी मत्यु तो हुयी मगर साथ ही जीवन दान भी मिला, एक अक्षय जीवन जिस पर कोई ग्रहों या उसकी दशाओं के बिन्दु नही खींच सकता था।
मृत्यु हुयी थी मेरी आशंकाओं की, जिसमें ना चाहते हुये भी मैं उलझ गयी थी, डर गयी थी, और अपने इसी डर को माँ से छुपाने के लिये मै दूसरे शहर नौकरी का बहाना लिये आ गयी थी। यहाँ कोई नही था जो मेरे मन में स्थायी घर बना लेने वाले मेरे भय को देख सकता। जैसे जैसे मेरा ये वर्ष बीत रहा था मुझे मेरा जीवन चक्र समाप्त होता दिख रहा था। मुझे नही मालूम कैसे अनन्त ने मेरी आंखों, मेरे रोम रोम में बसे मेरे डर को पहचान लिया। और एक दिन मुझसे सब कुछ जानने के बाद मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रखा। मैं विवाह करना तो दूर उसके बारे में सोच भी नही सकती थी। ये सुख तो मेरी कुंडली में लिखा ही नही गया था। फिर कैसे मैं पल पल मृत्यु के निकट जाते जीवन को सप्तपदी के पवित्र मार्ग से ले जा सकती थी। घरवालों के सामने यह प्रस्ताव रख पाना तो मेरे लिये रेगिस्तान में केसर की फसल उगाने जैसा था। मगर अन्नत तो आज जैसे ध्रुव सा अटल विश्वास ले विवाहवेदी की अग्नि में मेरे भय की आहुति देने ही आया था।
मेरे हाथ में अपना अपना हाथ लेते हुये उसने कहा- मुझे अपना शेष जीवन दे दो। वो याचक सा मेरे सामने खडा था। मुझमें अपने माता- पिता को यह दुख देने का साहस नही था। हाँ ये जानती थी कि नित्यप्रति मेरी दीर्घायु की कामना और प्रार्थना करने वाली माँ जानती है कि उसकी पुत्री की आयुरेखा अपने अन्तिम बिन्दु की ओर प्रस्थान कर चुकी है। बस यही सोचते हुये उन्हे संक्षिप्त पत्र लिख कर अपनी निकट आती मृत्यु की सूचना इस तरह दी कि जैसे मै इस दुनिया से प्रस्थान कर चुकी हूँ।
पता नही अन्नत मुझे सत्यवान मान, मेरे लिये स्वयं को सावित्री बना ईश्वर से मेरे लियी अक्षय जीवन मांग कर लाये थे या आचार्य सत्यवान की गणना में कही कोई त्रुटि हुयी थी, आज विवाह के दो साल बाद मैं अपने पति और पुत्र के साथ उस घर में जा रहे थे जहाँ मेरी आज भी मेरे विछोह में मेरी माँ की आंखे नम हो जाती होंगी। जहाँ मेरे काल्पनिक क्रियाकर्म में मेरी कुडंली को जलप्रवाहित कर दिया गया होगा।
जहाँ शायद अब अपने नवासे को देख कर उसकी नानी अपने नैनिहाल नाती की कुडंली बनवाने किसी आचार्य सत्यानन्द के पास नही जायगी।


शनिवार, 31 मई 2014

बीज




आज बहुत साल बाद गाँव जा रहा था। सुबह का समय था, सो बस से उतर कर सोचा, घर तक पैदल ही चलता हूँ। गाँव की बहुत सारी कच्ची सडकें पक्की हो गयीं थीं। पतली पलती सडकों के दोनो तरफ लहलहाते खेतों से आती हल्की हल्की हवा, तन ही नही मन को भी ठंडक पहुंचा रही थी। पुराने दिनों को याद करता हुआ घर की तरफ जा रहा था कि तभी गांव का जूनियर हाईस्कूल दिखा, कभी ये एक खुली पाठशाला हुआ करता था। पेड के नीचे हम सारे साथी अपनी अपनी पट्टी और कलम ले कर आते और मास्टर जी हमे शिक्षा के साथ साथ जीवन के पाठ भी पढाते। काश उस समय ही ये हाईस्कूल होता तो पढाई के लिये गाँव ना छोडना ना पडता। 
अपने खयालों में खोया हुआ जा ही रहा था कि तभी किसी ने मुझे आवाज दी, मैने मुड कर देखा , मगर कोई दिखा नही। शायद मेरा ख्याल था कि किसी ने मुझे पुकारा। अभी दो कदम आगे बढा ही था कि फिर से वही आवाज सुनाई दी- गोविन्द इधर उधर नही नीचे की तरफ देखो। मैने नीचे सडक की तरफ देखा, ये आवाज एक गेंहूँ के बीज से आ रही थी। मैने झुक कर लगभग बैठ कर उस गेंहूँ के बीज से कहा- क्या हुआ? आपको क्या चाहिये? उसने कहा - कुछ नही, बस मुझे यहाँ से उठा कर उधर खेत में डाल दो। मुझमे अभी भी जीवन है, गाँव की मिट्टी तक पहुंचा दोगे तो मै फिर से पनप जाऊँगा। यदि यही सडक पर पडा रहा तो, किसी ना किसी के पैरो से या किसी गाडी के तले रौंदा ही जाऊँगा।
मै उसे उठाकर सडक के दायीं तरफ के खेत की तरह डाल ही रहा था, कि तभी मेरी नींद खुल गयी, मेरी श्रीमती जी मुझे जगा कर कह रहीं थी कि प्लीज हम उस बच्चे को घर ले आते हैं ना, वो कल से अपने घर के सामने पडा हुआ है, ठीक है हमे नही पता कि वो कहाँ से आया है, मगर क्या हम उसे जीवन नही दे सकते, क्या अपने घर के आंगन में आ कर उसे जीवन नही मिल सकता।
एक पल को फिर से दो मिनट पहले का देखा सपना आँखों मे तैर गया और अगले ही पल मै अपनी पत्नी के साथ अपने घर के दरवाजे की तरफ चल दिया। 

रविवार, 30 मार्च 2014

जीवन गीत....



वो गीत दुआ बन जाते हैं, जो दर्द मे राहत देते हैं
कांटों मे भी जीवन होता है, ये फूल चमन के कहते है......

कोई रात सदा की होती नही, कोई गम भी सदा तो जीता नही
कोई चाहे भी तो चाह के भी, हर पल को खुशियां मिलती नही
इस रात की काली चादर में, ही तो तारे झिलमिल सजते है....
वो गीत दुआ..............

मिलती है उसे ही सच्ची खुशी, जो दर्द मे भी खुश रहता है
फिर हों अपने या हों बेगाने, पीडा सबकी ले लेता चलता है
देने सबको जैसे जीवन, पी कर विषप्याला शिव हसते है........
वो गीत दुआ..............

हैं जख्म मिले जो दुनिया से, तो कैसा शिकवा किस्मत से
जो आज नही कोई साथ मेरे, तो क्यों रूठे हम कुदरत से
वो लोग ही कुन्दन बनते हैं, जो वक्त की आंच में तपते हैं....

वो गीत दुआ..............

शनिवार, 12 जनवरी 2013

नारी मन


वो ख्वाब किसी की आंखों का, वो शब्द किसी की बातों का,

जीवन के हर क्षण में वो, वो आधार  सभी की सांसों का

रूप बदल बदल वो आये, हर रूप में सबका साथ निभाये

बिन उसके जीना असम्भव, पर सभी को ये समझ ना आये

दुनिया कभी पूजती उसको, कभी करती है उसका अपमान

नादां लोग ना जा सके, है उसके मान में ईश का मान

वो जीवन की धुरी धरा पर, उसका जीवन ही खतरे में

जब प्रहरी भी बन जाते भक्षक, तो बचे वो कैसे पहरे में

गॄहलक्ष्मी को ग्रहण लगाते, आंखों के तारे राहू बन जाते

कहने को ज्ञानी कहलाते, पर "नारी मन" समझ ना पाते
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