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गुरुवार, 18 जुलाई 2019

क्या छोडूं और क्या बांधू

नवजीवन का आगमन, कई प्रश्न भी लेकर आया है
कुछ दुविधा में मन मेरा, क्या छोडूं और क्या बांधू

क्या छोडूं उस चिडियां को, जो फुदकती आंगन में
या छोडूं अल्लहडपन को, जो बरसता था सावन में
क्या कुछ काम के ये होंगे, या कर्कट साबित होगे
या बरसों बक्सों मे बन्द, बस आभासी साथी होंगें
नवखुशियों का आगमन, जटिल पहेली भी लाया है
कुछ दुविधा में मन मेरा, क्या छोडूं और क्या बांधू

किन यादों को धरती के, आंचल में दबा कर तज दूँ
किन स्मॄतियों को हदय के, पन्नों में अंकित कर लूँ
क्या विरक्त हो जायेंगी, या नवप्रभा भोर की देखेंगी
क्या मेरी बचपन गाथा में, अनुरक्ति किसी की होगी
नवप्रभात का आगमन, कुछ संशय भी संग लाया है
कुछ दुविधा में मन मेरा, क्या छोडूं और क्या बांधू
  
मुक्त करूं कुछ बंधुजनों को, या भावों को ढीला कर दूँ
या नयनों में भर नाते, क्या दायित्वों पर ताला चढ दूँ
मन विमुक्ति हो जायेगा, या चिरकाल ऋणी रह जायेगा
भावनाओंं के भंवर का भला, क्या समाधान हो पायेगा
नवबंधन का आगमन, कृतध्नता का भार भी लाया है
कुछ दुविधा में मन मेरा, क्या छोडूं और क्या बांधू

शुक्रवार, 14 जून 2019

बचपन



जीवन की आपाधापी में
बरसों के आने जाने में
बहुत कुछ बदलता है लेकिन
जो नही बदलता, वो बचपन है
बदल जाते है, रंग खुशी के
बदल जाते है, संग सभी के 
बदल जाते है, चेहरे मोहरे
बदल जाते है, मन भी थोडे
मौसम के आने जाने में
जमानों के गुजर जाने में
दिन रात बदलते है लेकिन
जो नही बदलता, वो बचपन है
बदल जाते है, रिश्ते नाते
बदल जाते है, दहजीज दुआरे
बदल जाते है,किस्मत के तारे
बदल जाते है, ख्वाब भी सारे
लोगो के आने जाने में
दुनिया के ताने बाने में
बदल जाते है रास्ते लेकिन
जो नही बदलता, वो बचपन है
जीवन की आपाधापी में
बरसों के आने जाने में
बहुत कुछ बदलता है लेकिन
जो नही बदलता, वो बचपन है

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

बहारें फिर आयेंगी


क्या होगा कुरेदने से, स्मृतियों के पल
कुछ दबी आंधियां, तूफान बन जायेंगी

जितना भी तय करेंगें, वो बीता सफर
वापसी में तय हैं, कडवाहटें भी आयेंगी

याद ना कर उसे, जो दर्द का कारन था
आप उम्र भर उसे, माफ न कर पायेंगी

कुछ कदमों की आहटें हैं, प्रतीक्षा से परे
अतिथि सा भी उसे, स्वागत न दे पायेंगी

जीवन नही, सिर्फ स्वप्न पूर्ण करने को
कुछ बातें हमेशा ही, अधूरी रह जायेंगी

खुश रहने का तरीका, सुझाती है पलाश
पतझड को कर विदा, बहारें फिर आयेंगी

शनिवार, 16 मई 2015

यादों के झरोखों से....


यादों के पन्ने, जब कभी खुल जायेगे
आँखे मुंद जायेगीं, आप नजर आयेगें

कसमें जो दी हैं , उन्हे निभाना है
ख्वाबों में भी, नजदीक नही आयेगें

चाँद देखने का शौक, काफुर हुआ
चांदनी पहरे में, कहाँ तुम्हे पायेंगें

बूंदें बारिश की, अंगारो सी लगे
प्यासे मन, अब ना भींग पायेगें

संग चली गयी, चंद लकीरे भी 
हथेलियों में, तेरी छाप सजायेगें

न गुजरेगें उन रस्तों से, जहाँ साथ चले
राहें पूंछेगीं तुम्हे, तो क्या उन्हे बतायेगें

जाते हुये कह तो दिया, ना याद करना
अपने किस्सों में क्या, वो हमे न लायेगें
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