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सोमवार, 24 अगस्त 2020

सगे- सम्बंधी

आखिर क्या है सम्बंध 
सगे- सम्बंधी में
या बिना संबंध के ही
रहते हैं एक साथ
जैसे रहते हैं कई बार लोग
या दोनों है एक दूसरे के पूरक
क्या इस युग्म में समाहित हैं
वो संबंध भी जिनके मध्य
नहीं है कोई संबंध, संबंध होकर भी
क्या ये मिलकर बनाते हैं परिधि
जिसमें समा सकते हैं
सारे रिश्ते
इक ऐसी परिधि
जिसमें कुछ रिश्ते बंधे तो हैं
सम्बन्ध की डोर से
मगर हैं
भावहीन
जिनके जीवित होने की न है प्रसन्नता
न मृत हो जाने का भय
भावहीन सम्बन्ध झूलते रहते हैं
जीवन और मृत्यु के बीच
अज्ञात सा है इस परिधि का 
केन्द्र बिन्दु
बहुत खोजने पर भी
नहीं दिखता कहीं
मित्रता का भाव
न परिधि पर न परिधि के अन्दर
अवश्य ही मिलेगा
यह कहीं उन्मुक्त आकाश में
विचरता
जो स्वतंत्र होगा
हर दिखावटी बंधन से
जो देगा शरण
सगे-संबंधों से छले
थके मन को
हां यही है केन्द्र बिन्दु
हर सच्चे संबंध का
होकर भी परिधि से बाहर

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

जीवन की कडियां - रिश्ते

रिश्ते जो मिल जाते हैं
जन्म के साथ
और बन जाते हैं आधार
जीवन का
ये मिट नही सकते
बदलते रहते हैं
नही बदलता रंग लहू का
बदलती है सिर्फ उसकी गर्माहट
इस श्रेणी में आते हैं
भाई बहन माता पिता
चाचा ताऊ और भी बहुत
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रिश्ते जो मिलते हैं
घर की दीवार से
निभाना होता हैं जिन्हे
जिन्दगी चलाने के लिये
साथ खेलने लडने के लिये
कभी चीनी उधार मांगने को
कभी अपनी खुशियां बांटने  को
जो वाकिफ होते हैं
मेरे घर की हर आवाज से
दरवाजे पर बजी डोर बेल से
रिश्तों की भाषा में
 कहते हैं जिन्हे पडोसी
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रिश्ते जो मिलते है
घर के बाहर
और बन जाते हैं
जिन्दगी का अंग
स्कूल के टिफिन से शुरु होकर
मिलते हैं खेल के मैदान में
कभी साथ पढाई करते
कभी लडाई झगडा करते
मिलती है इन्हे मजबूती
और बन जाते हैं सम्बल
इन्हे कभी हम कहते है दोस्त
कभी मित्र, यार, सहेली या फ्रेंड
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रिश्ते जो मिलते है
कार्यक्षेत्र में काम के साथ
बच नही सकते इनसे
दिल मिले ना मिले
हाथ मिलते रहते हैं
मन में लाख जहर हो
पर्टियों में जाम मिलते हैं
अक्सर, नही चलते ये उम्र भर
फिर भी परेशानियां दे जाते है
कभी कभी इस भीड से ही
मिल जाते हैं हमसफर 
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रिश्ते जो बनते हैं
नजर के इशारों से
सीधे देते हैं दस्तक,दिल पर
चैन सुकून और नींद
सब, पल भर में ले जाते हैं
देते हैं बहुत तकलीफ  
मगर दिल को भाते हैं
और बन जाते हैं
पूरी की पूरी जिन्दगी
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रिश्ते जो मिलते हैं
समय के साथ
कभी भी कही भी
जुड जाते हैं हमसे
कभी ट्रेन में, कभी मंदिर में
कभी यूं ही घूमते फिरते
जैसे मिलते हैं 
दो फूल, दो पंक्षी या पानी
देखते ही संप्रेषित होता है
एक मौन संदेश
कुछ ही पल में
बन जाते है 
अनकहे अनजानें बेनाम 
अपरिभाषित रिश्ते
चित्रों के लिये गूगल का आभार
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