प्रशंसक

गुरुवार, 11 मई 2017

क्या कहिये




जो दिख रहा वो सच नही 
फिर अनदिखे को क्या कहिये 
हस रहे जख्म महफिलो में
गुमसुम खुशी को क्या कहिये

हर किसी ने हर किसी की
किस्मतों पर रश्क खाया
फिर भी आसूं हर आँख में 
तो नजरिये को क्या कहिये

दिल लगाया इसलिए कि
दिल को तो कुछ सुकून हो
दिल लगा सूकूं काफुर हुआ 
तो दिल्लगी को क्या कहिये

कुछ कर गुजरने की चाहत 
जगी तो वो नेता बन गए 
कुछ छोड, कर गुजरे वो सब
तो दिल्ली को क्या कहिये 

जीते जी वो मर गए जो
हो गये जिंदगी से खफा 
जिन्दगी फिर भी न रूठी 
तो जिंदगी को क्या कहिये

बुधवार, 10 मई 2017

छोटी नौकरी


उसे ना बहुत गोरी ही कहा जा सकता था ना ही सांवली। हाँ कद काठी ऐसी थी कि एक बार मुड कर देखे बिना रुका ना सके, और सबसे बडा उसका आकर्षण थे उसके नागिन से लम्बे सुर्ख काले बाल, जो लडकों के तो क्या लड्कियों तक के मुंह से उफ्फ निकलवा देते।
पिछले दिनों ही मेरे पडोस में रहने आयी और चंद ही दिनों में ऐसी दोस्ती हुयी कि लगता पिछले जनम में जरूर हम बहन ही रहे होंगें। एक कारण यह भी था कि जब से मेरी नौकरी का ट्रांसफर हुआ मै भी बिल्कुल अकेली ही थी।
कई साल की नौकरी में कभी हास्टल रही कभी पीजी मगर इस बार मन किया बिल्कुल अकेले रहा जाय। ऐसा नही था कि मैं अकेले किसी खास आजादी के कारण रहना चाह रही थी, मगर इतने सालों के बाहर रहने के अनुभवों में एक बात तो समझ आ गयी थी कि यदि अपनी सेहत और मन का खाना है तो अपने रसोई बनानी पडेगी, और फिर मकान लेने का एक और फायदा था कि जब चाहे घर से कोई आ जा सकता था। मगर बहुत जल्द अकेले रहने के नुकसान भी दिखने लगे, शुरु शुरु में तो खूब घर सजाया, खूब मन का बनाया, फिर धीरे धीरे ऑफिस की थकान घर तक आने लगी, और कई कई दिन मैगी और ब्रेड पर निकलने लगे।
अभी कुछ दिनों पहले जब पडोस में नैना रहने आयी तो लगा जिन्दगी अब कुछ मजे से कटने वाली है, और हुआ भी यही, यूं तो नैना उम्र में मुझसे चार पाँच साल छोटी थी मगर दो चार मुलाकातों में ही उसने साफ साफ कह दिया, हम दोस्त हैं ये दीदी वीदी हम तो नही मानने वाले, और मैने भी हंस कर उसकी दोस्ती को ही गले से लगाया।
नैना की बातों से ही पता चला कि पडोस में रहने वाले अग्रवाल जी की दूर की चचेरी बहन लगती है, और नौकरी ढूंढने के सिलसिले में यहाँ आयी है। उन दिनों मेरे ऑफिस में भी निविदा पर जगह निकली थी ये सोचकर कि शायद नैना का कुछ काम बन जाय, जब मैने उसको निकली हुयी जगह के बारे में बताया तो वो बोली- क्या तुमने भी मुझे इतना छोटा समझ लिया, ऐसी छोटी नौकरी थोडे ही करूंगी, ये ही करना होता तो अपना ही घर क्या बुरा था।
बात शायद नैना ने ठीक ही कही थी, मगर उसके कहने में जिस गर्व का मुझे अनुभव हुआ वो कुछ चुभ सा गया। कौन सा मैने उसको सारी जिन्दगी ये नौकरी करने को कहा था, मैने तो बस अपनेपन के नाते बताया ही था। खैर दिन जाते रहे, नैना को आये करीब दो महीने हो रहे थे, मगर अभी कुछ काम बन सका था। छोटी नौकरी वो करने को तैयार ना थी और बडी नौकरी उसे मिलती नही थी।
यूं तो रोज शाम को आने का उसका नियम ऐसा था जैसे सूरज का ढलना और चाँद का निकलना मगर आज जब दो दिन हुये तो मुझे चिन्ता होने लगी। सोच रही थी कितनी मूर्ख हूँ आज के मोबाइल के जमाने में भी उससे ना तो उसका नम्बर लिया ना अपना दिया। ऑफिस से काफी थकी थी सो आलस करके लेट गयी, सोचा आती ही होगी। रात भूखी ही सो गयी, सुबह फिर वही ऑफिस। आज ऑफिस में कुछ कम काम था सो दिन में कई बार नैना के बारे में ख्याल आया। सोचा शाम को आज मै ही घर जाऊंगी, मगर अचानक एक हफ्ते का ट्रेनिंग का प्रोगराम मुझे सौंप दिया गया क्योकिं जयंत (मेरे सीनियर) की वाइफ को अचानक दिल का दौरा पड गया था। इस भागमभाग में नैना कही खो सी गयी। मगर मुंबई जाने से लेकर आने तक के रास्ते भर बराबर नैना की याद आती रही। वापस सीधे ऑफिस रिपोर्ट करना था सो शाम को सीधे अग्रवाल जी के घर ही गयी, उम्मीद थी कि गेटे पर ही नैना मिल जायगी तो उसको घर लेती आउंगी, और फिर पूंछूंगी क्यो नही आयी इतने दिनों से, फिर मन में ही सोचा इतने दिन अरे आज मिला कर तीन दिन होते, सच जब किसी से रोज का ही मिलना हो तो एक एक दिन भी महीनों सा बन जाता है। डोर बेल बजायी तो अग्रवाल जी की मिसेजे ने गेट खोला, मिसेज अग्रवाल जिनकी ना तो ऐसी उमर थी कि उनको आंटी कहा जा सकता था और ना दीदी जैसी उनसे आत्मीयता कभी जुड सकी थी सो हमेशा आप से ही काम चला लेती थी। और आज तो उस आप का भी विलोप करते हुये सीधे बोली- कई दिन से नैना नही आयी, कही गयी है क्या?
मिसेज अग्रवाल ने मेरे उत्तर के प्रतियुत्तर में मुझे अन्दर आने का निमंत्रण देते हुये कहा- लगता है अभी सीधे ऑफिस से आ रही हो, देखो गरमी भी तो कितनी ज्यादा हो रही है, आओ अंदर आ जाओ। गरमी की बात सुनते ही मुझे भी अनुभव हुआ कि वाकई गरमी बहुत थी और शायद मेरे चहरे की थकन देखकर उन्हे पहले मुझे पानी देना ज्यादा जरूरी लगा होगा। एक ही सांस में पूरा ग्लास पानी पी गयी, शायद तभी उन्होने मुस्कराकर कहा- और लाऊं क्या। थोडा सा खुद पर झिझक भी हुयी, कि इतनी आतुरता से पानी पीने कि क्या जरूरत थी मगर शायद गरमी में सूखा गला नही समझ सकता था और वो सूखी मिट्टी में पडी बारिश की हर बूंद को सोखता चला गया।
खाली पानी के ग्लास को मेरे हाथ से लेकर मेज पर रखते हुये मिसेज अग्रवाल बोली- नैना अपने घर चली गयी है, चली गयी है क्या मतलब था इसका क्या अब उसको वापस नही आना था, क्या उसको नौकरी मिल गयी थी या घर में कोई समस्या आ गयी थी, कई सारे सवाल मन में ऐसे आ गये जैसे पटरी पर माल गाडी के डिब्बे पलक झपकते ही निकल जाते हैं, मगर मिसेज अग्रवाल बहुत ही संयत थी। कही मेरे सवालों को वह अन्यथा ना ले, मैने खुद को बहुत नियन्त्रित करते हुये पूंछा- चली गयी मतलब, उसको कही नौकरी मिल गयी क्या?
मन ही मन गुस्सा तो आ रहा था कि ऐसे भी कोई जाता है क्या, कम से कम मिल कर तो जाती, उसकी खुशी से मुझे बहुत खुशी होती, मगर गुस्से को मन में ही रखना उचित था। तभी मिसेज अग्रवाल ने कहा- नही नौकरी कहाँ मिली, वो तो हम सबको छोड कर जाने कहाँ चली गयी। उसका फोन उसका सामान उसकी डिग्री सब यही पडे हैं, दो तारीख की सुबह निकली थी, कह रही थी – भाभी आप सबको बहुत परेशान किया, अब नही करूंगी, आज चाहे जैसी नौकरी मिले छोटी या बडी कर लूंगी। आज पूरे तेरह दिन हो गये नैना का कही पता नही, ना कही से कोई दुर्घटना की खबर ना किसी रिश्तेदारी में। दो महीने पहले एक एक्सीडेंट में माँ बाप नही रहे थे, ये उसको अपने साथ ले आये थे, मै बेऔलाद क्या जानती थी कि मेरे नसीब में तो औलाद का सुख था ही नही।

उफ्फ कितना कुछ समेटी थी खुद में , कभी कुछ नही बताया, और मै समझती थी कि हम एक माँ से जायी बहन से हैं जिनके बीच कोई बात अकेली नही। तो क्या वो सिर्फ मुझे ही खुशी देने आयी थी। मन में सैकडों सवाल हर रात उठते हैं और दब जाते हैं। बस तब से लेकर हर शाम जब घर लौटती हूँ तो मन में एक ही आस रहती है वो कही से आ जाय, और मुझसे कहे- ऐसी छोटी नौकरी थोडे ही करूंगी। 

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

कैसे कटेगा ये पहाड सा जीवन?... Why Walking Alone


ये मेरे जीवन में पहला अवसर नही था जब मैं इस प्रश्न का उत्तर दे रही थी। अब तक तो मुझे इस प्रश्न की आदत सी हो गयी थी, कुछ लोग मेरे कार्य की प्रसंशा करने के बाद य्ह प्रश्न पूंछते थे, कुछ की बातों का आरम्भ ही इस प्रश्न से होता था। आप भी सोच रहे होंगे कि प्रश्न पूंछने की चर्चा तो इतनी कर ली किन्तु प्रश्न अभी तक नही बताया, लिखूंगी वो भी लिखूंगी उसके पहले अपने बारे में कुछ बताती हूँ- मै अपने जीवन में पैतालीस बसन्त देख चुकी हूँ, और इन पैतालीस बसन्तों के पार होने में देख चुकी हूँ जीवन के अनन्त उतार चढाव, अनुभव कर चुकी हूँ नाना प्रकार के सुख दुख, सीख चुकी हूँ जीवन को जीना। किन्तु शायद लोग मुझसे ज्यादा मेरे लिये फिक्रमंद रहते हैं, और इसीलिये अक्सर लोग पूँछ लेते हैं- मीरा जी कैसे काटेंगीं ये पहाड सा जीवन? मीरा जी कैसे काटती है आप अपना खाली समय? मीरा जी क्या अकेले घर आपको काटने को नही दौडता? वगैरह वगैरह...। बार नाकाम कोशिश करती हूँ कि मेरी मुस्कराहट ही मेरा जवाब बन जाय किन्तु हर बार मेरी निश्छल हंसी से वह मेरे उत्तर ना देने की बात को समझ नही पाते या समझना नही चाहते या उन्हे लगता है कि शायद इस अर्धप्रौढा महिला ने उनके प्रश्न को समझा नही तो वह अपने प्रश्न में और शब्दों को सम्मिलित करते हुये प्रश्न का स्वरूप इस तरह बदलते है कि प्रश्न की आत्मा पूर्णतः जीवित रहे|
जब पूर्णतः मै आस्वश्त हो जाती हूँ कि प्रश्नकृता उत्तर का भिक्षुक है तो फिर उसको निराश करके पाप की भागीदार बनने से श्रेयश्कर लगता है कि भिक्षुक को उचित भिक्षा दी जाय।
फिर उत्तर की भिक्षा के रूप में उसकी झोली में डाल देती हूँ- अपनी बेबसी, अपना दुख, अपना दुर्भाग्य और अपनी लाचारी…..। यह सब पाकर वह भिक्षुक ऐसे प्रसन्न होता है जैसे किसी भिखारी को आशा एक रुपये या दो रुपये की हो और उसे सौ या दो सौ रुपये मिल जाय।
अब भिक्षुक के मन में भाव जगता कि वह तो एक दाता है- सामने वाला तो दीन हीन कमजोर लाचार किस्मत का मारा है, फिर वह मुझे सांत्वना देकर अपने दाता होने की संतुष्टि करता है. और बुनने लगता है झूठी सहानुभूति, अपनेपन का जाल।
यकीन मानिये मुझे आज तक किसी अविवाहित पुरुष के प्रति मन में ऐसी सहानुभूति नही हुयी, शायद मेरा ह्दय इतना उदार नही। मुझे कभी ऐसी आवश्यकता महसूस नही हुयी कि किसी से भी( ना स्त्री ना पुरुष) उसकी उम्र या कमाई पूँछी जाय।
किन्तु आज मै मेरे सभी अपरिचित और परिचित प्रश्नकॄताओं से कुछ कहना भी चाहती हूँ और पूंछना भी चाहती हूँ- कहना चाहती हूँ कि क्या वास्तव में जीवन काटने वाली वस्तु है और यदि है तो क्या विवाह वो कैंची है जो जीवन काटने में मदद करती है। ईश्वर ने यह जीवन जीने के लिये दिया है ना कि काटने के लिये।
और पूँछना चाहती हूँ कि मेरे अविवाहित होने पर क्या वाकई उनका मन मेरे जीवन के प्रति चिन्तित होता है? क्यों एक अविवाहित लडकी के चाल चलन पर प्रश्न किये जाते है कभी प्रत्यक्ष रूप से कभी अप्रत्यक्ष रूप से। मैंने बहुत सारे लोगों को हमेशा शालीनता से जवाब दिया है और देती रहूंगी, किसी उत्तर भिक्षुक को निराश नही करूगीं किन्तु मुझे वापस में उनसे कुछ भी नही चाहिये- नही चाहिये छल पूर्ण आमंत्रण, नही चाहिये छदम वार्ता, नही चाहिये आभासी सहानुभूति पूर्ण व्यव्हार। आज कई सारे कटु अनुभवों के आधार पर कह सकती हूँ कि एक लडकी मुख्यतः अविवाहित लडकी समाज में अपनी योग्यता के आधार पर अपने जीवन को एक ऐसे मुकाम पर पहुँचाती है जहाँ तक शादीशुदा पुरुष सामान्यतः नही पहुंच पाते तो उसको पीछे करने का बडा ही आसान सा तरीका होना है उसके अकेलेपन के प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त करना। फिर सहानुभूति की सीढी चढकर उसके पतन की कोशिश करना ।
उपरोक्त शब्दों से किसी के भी मन को ढेस पहुंची हो तो हदय से क्षमाप्रार्थी हूँ। यह मात्र मीरा के जीवन के अनुभव हैं, मुझे मित्र होने के नाते उसने माध्यम बनाया, उसको ऐसा लगता है कि उसके अनुभवों को मैं शब्दों की माला में सुन्दरता और सजीवता से पिरो सकती हूँ। 
              मीरा की बात के अन्त में, मैं दो शब्दों में अपनी बात कहूंगी- मीरा एक ऐसी महिला है जो मेरे साथ साथ ना जाने कितनी स्त्रियों, पुरुषों की आदर्श है, लोग सीखते है उससे जीवन जीना, स्वच्छंद हंसी उसका ऐसा आभूषण है जो उसके व्यक्तित्व को सदैव निखारता है। मीरा एकाकी होकर भी आज सफलता के एक ऐसे मुकाम पर है जहाँ से आप उससे प्रेरणा ले सकते हैं। यदि सम्भव हो तो अब किसी भी मीरा के जीवन में उत्तर का याचक बन कर ना आइयेगा। क्योंकि निजी प्रश्नों को निजी लोग ही पूँछें तो उचित भी लगता है और शोभनीय भी। और न कीजिए चिंता मीरा के लिए क्यो कि वह जीवन जीने मे विश्वास करती है काटने मे नही । कोई भी विष प्याला देकर उससे जीने की कला का हरण नही कर सकता। स्त्री के शक्ति रूप दुर्गा की स्तुति करने वाले क्यों यह ध्यान नही करते कि स्त्री कभी भी जीवन की खुशियों के लिये पुरुष पर निर्भर नही है। 

मंगलवार, 28 मार्च 2017

माँ दुर्गे का भजन....


अम्बे मइया के दरबार, लगी भक्तो की कतार
कोई लाया लाल चुनरिया॒॑sss - 2, कोई करे जयकार
शेरोवाली के दरबार, लगी भक्तो की कतार

दुष्ट जनों का नाश किया,
दुर्बल के कष्ट मिटाये
जो भी पुकारे भक्तिभाव से,
मइया के दर्शन पाये
खाली हाथ ना लौटा वो जोss - 2 आया माँ के द्वार
अम्बे मइया के दरबार, लगी भक्तो की कतार

सिन्दूर सोहे माँ के माथे,
सजे कंठ में माला
सिंह की अम्बे करे सवारी,
लेकर बरछी भाला
मइया का है रूप निराला ss - 2, महिमा अपररम्पार
अम्बे मइया के दरबार, लगी भक्तो की कतार

ब्रह्मा विष्नु महेस सभी,
करते गौरी का गान
ममता का है रूप भवानी
और शक्ति की खान
जो भी आया लेकर झोली ss - 2, उसे मिला वरदान
अम्बे मइया के दरबार, लगी भक्तो की कतार

कोई लाया लाल चुनरिया॒॑sss - 2, कोई करे जयकार
शेरोवाली के दरबार, लगी भक्तो की कतार

* चित्र के लिये गूगल का आभार
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