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सोमवार, 17 जुलाई 2017

एक सिपाही का खुला खत

कल ऑफिस पहुंची तो मिसेज कौल ने बोला- इन्द्रा तुम कल जम्मू चली जाओ, एक हफ्ते की वर्कशॉप के लिये, जाना तो मुझे था लेकिन कल ही मेरे सास ससुर घर आ गये हैं और मम्मी जी का आँख का ऑपरेशन कराना है, तो मै किसी भी हालत में नही जा सकती। मेरी जगह तुम इसे अटेंड कर आओ।
बहुत मन तो नही था, मगर कई सालों से वैष्नोदेवी जाने का सोच रही थी और जा नही पा रही थी, सोचा शायद ये माँ का ही बुलावा हो, और मिसेज कौल मेरी सीनियर से ज्यादा दोस्त थी, तो उनको ना करने का तो प्रश्न भी नही था।
इलाहाबाद से जम्मू करीब एक दिन का सफर था, और मैने इतना लम्बा सफर कभी नही किया था, सो स्टेशन पर तीन चार शिवानी जी के नॉवेल खरीद लिये, सोचा सफर ठीक कट जायगा। बहुत दिनो से कुछ अच्छा पढा भी नही था।
इन्डियन रेल तत्काल में शायद ही किसी को अपने मन की सीट देता है, कम से कम मेरा तो हमेशा ऐसा ही अनुभव रहा। मम्मी के लिये कभी भी सीट करानी होती तो मै लोअर बर्थ का प्रिफरेन्स देती हूँ मगर मिलती है अपर या मिडिल बर्थ। और अपने लिये हमेशा जब अकेले सफर करना हो तो देती हूँ अपर बर्थ और मिल जाती है लोअर बर्थ। मेरे ख्याल से तो तत्काल रिसर्वेसन फार्म से सीट च्वाइश का ऑप्शन ही हटा देना चाहिये।
खैर अब जो भी हो, सफर तो करना ही है, सोचा मिसेज कौल होती तो लोअर सीट पाकर खुश हो जाती, अपने घुटनो के दर्द के कारण तो उन्होने अपना ऑफिस फस्ट फ्लोर से ग्राउंड फ्लोर पर करा लिया था।
हम दोनो ही अपने अपने वेट से परेशान थी, अक्सर वो कहती भी इन्द्रा तुम मेरा पाँच दस किलो वेट ले लो तो दोनो का भला हो जाय, और फिर जोर का ठहाका लगाती। उनकी उनमुक्त हसी से मेरा वेट भले ना बढता हो मगर रक्त संचार जरूर बढ जाता था।
अपने कम्पार्टमेंट मे गयी तो देखा मेरे और एक अंकल जी के अलावा सारे ही सहयात्री सिपाही थे, सिपाहियों के बारे में मेरे मन में आदर का भाव है किन्तु कई बार कुछ ऐसा सुना था जिससे मन मे थोडा डर भी लगा। चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गयी और अभी अभी स्टेशन पर खरीदा हुआ शिवानी जी का नॉवेल अपराजिता पढने लगी।
थोडी देर में अपर बर्थ में लेटे एक सिपाही सहयात्री ने कहा- मैडम क्या और भी नॉवेल है आपके पास? मुझे आश्चर्य हुआ- सोचने लगी क्या सिपाही लोग भी किताबें पढते है, मै तो समझती थी कि ये लोग सिर्फ बन्दूकों और बारूदों की दुनिया में रहते हैं, तभी आवाज आयी- सॉरी, आपको डिस्टर्ब किया, मुझे लगा अगर आपके पास एक्स्ट्रा बुक हो तो मै भी पढ लेता, सॉरी। मैने कहा- अरे नही नही सॉरी की क्या बात, मेरे पास और भी तीन नॉवेल है मगर है सभी शिवानी जी के, आपको पसन्द हैं शिवानी जी।
उसने कहा- पसन्द क्या मैने अभी तक उनका कोई नॉवेल नही पढा, मगर हाँ अगर आप मुझे पढने को देगीं तो शायद पसन्द भी करने लगूं। मैने हल्का सा मुस्कराते हुये, बैग में रखा चौदह फेरे निकाल कर दे दिया।
पढते पढते करीब १२ बज गये, ध्यान ही नही रहा कि कम्पार्टमेंट के बाकी लोगो को लाइट से प्राबलम भी हो रही होगी, सोचा लाइट बन्द कर सोने की कोशिश की जाय, तभी देखा अपर बर्थ मे बैठा सहयात्री कुछ लिख रहा था, मुझे देख कर बोला – थैंक्स फॉर नावेल, वाकई अच्छा है, मगर मेरा कुछ लिखने का मन करने लगा, सो मैने इसका नाम नोट कर लिया, कभी जरूर खरीदुंगा। मैने नावेल वापस लेते हुये कहा- प्लीज आप जब सोइयेगा तो लाइट ऑफ कर दीजियेगा, और मैं सोने की कोशिश करने लंगी।
सुबह मेरी नींद काफी देर से खुली वो भी चाय वाले की आवाज सुन कर। अभी तक मिडिल बर्थ वाले अंकल जी सो रहे थे, वरना शायद सीट खोलने के कारण वो मुझे जगा देते। और अब उठते ही लगने लगा, अंकल जी भी अब उठ जाए तो अच्छा हो, ठीक से बैठ कर चाय पी जाय, सोचते हुये मै वॉशरूम की तरफ बढ गयी।
वापस आयी तो देखा मिडिल बर्थ खुल चुकी थी। मै फैला हुआ कम्बल समेटने लगी तभी एक पेपर पर मेरी नजर पढी, हाथ से कुछ लिखा हुआ था, हमेशा से पढने की शौकीन रही हूँ सोचा कि शायद कोई कहानी लिखी हो, तो पढने लगी, मगर ये क्या – ये तो उस अपर बर्थ वाले का लिखा हुआ लग रहा था, शायद कल रात ये यही लिख रहा था, उसको वापस देने के इरादे से ऊपर नजर दौडाई तो बर्थ खाली थी, शायद रात में ही या सुबह उसका स्टेशन आ चुका था।
उसमे लिखे को पूरा पढने के लालच से खुद को बचा न सकी, और पढने लगी, उसमे लिखा था-
मेरी
ऐसा बहुत कुछ है जो मै कहना चाह रहा था मगर कह नही सका, ऐसा बहुत कुछ है जो मै कहना नही लिखना ही चाहता हूँ, कुछ शब्द कहने से अपना पूरा आकार लेते हैं कुछ पढने से। मेरी, मुझे तुम्हारा ये नाम तुम्हारे और हमारे सम्बन्ध की पूर्ण परिभाषा लगता है और तुम्हारा मुझे मेरे कहना मेरे जीवन को जीवन्त कर देता है।
मै घर से दूर आ कर भारत माँ की सेवा पूरे तन मन से कर पा रहा हूँ क्योकि तुमने अपना तन मन मेरे माता पिता की सेवा में लगा दिया है। मै आज तुम्हे अपने मन की बात कहता हूँ वैसे शायद कहने की जरूरत नही क्योकि तुम मुझे मुझसे भी ज्यादा जानती हो, फिर भी कहता हूँ जो तुम माँ पिता जी के लिये कर रही हो, जिस तरह से तुमने सारे रिश्तों को एक धागे मे पिरो रखा है, मै कभी नही कर सकता। मुझे ये आता ही नही। मै सीधा सीधा लड सकता हूँ गोली मार भी सकता हूँ और खा भी सकता हूँ, मगर तुम जो करती हूँ वो आसान नही। मेरे जीवन लक्ष्य को पूर्ण करने में तुमने सहर्ष अपने जीवन की आहुति दी है।
अक्सर कभी बर्फ पर खडे हुये या तपती रेत पर लेटे हुये जब तुम्हारी याद यादी है यकीन मानों मौसम बदल जाता है, बर्फीली हवाओं में तुम आग बनकर और तपती रेतीली हवाओं में तुम शीतलता बन कर आ जाती हो। तुमसे यह कहना पूर्ण नही कि मै तुमको बहुत प्यार करता हूँ, तुम प्रेम की सीमाओं से परे होकर मुझे प्रेम करती हो।
जानती हो, जब तुम मेरे पैर छूती हो, उस समय मै बस यही सोचने लगता हूँ कि काश मुझमे दुनिया के रीति रिवाजों को तोड सकने की हिम्मत होती और मै अपनी देवी के पैर छू पाता। तुम कहती हो कि तुमने मुझे ईश्वर को प्रसन्न करके पाया है, मै सोचता हूँ कि मै तो कभी मन्दिर तक नही गया, फिर कैसे ईश्वर ने मेरे हाथ में संसार की सर्वश्रेष्ठ स्त्री का हाथ दे दिया। मै यकीन से कह सकता हूँ तुम्हारी की हुयी पूजा का फल तुम्हे नही मुझे मिला है।
तुमसे मुझे कभी कुछ मांगने की आवश्यकता ही नही हुयी, तुमने स्त्री के हर रूप को ओढ कर मेरा साथ दिया है। आज युद्ध के लिये जाने को अगर मै तन मन से तैयार हो सका तो यह तुम्हारे ही कारण तो है, वरना सच कहता हूँ मैने फौज की नौकरी बस ये सोच कर कर ली थी, कि यहाँ ठीक ठाक तनख्वाह मिल जायगी, और खूब सारी सुविधायें होंगी। मगर तुमने ही मुझे मेरी जिम्मेदारियों का अहसास दिलाया। आज गर्व से सिर उठा कर सिर कटाने को तैयार हूँ। मुझे नही पता कि इस युद्ध का क्या परिणाम होगा, मै सशरीर घर आऊंगा या सिर्फ शरीर आयगा, मगर इतना पता है कि मेरी आत्मा हमेशा तुम्हारे ही साथ रहेगी।
तुम इस जनम में मेरी हो और हर जनम में मेरी ही रहोगी, ये मेरा विश्वास है।
तुम्हारा
मेरे

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

कब बुराई दूर होती है……………………………..


उदास यूं बैठ जाने से
कब उदासी दूर होती है
बुरा कहकर बुराई को
कब बुराई दूर होती है………………………..
जलाना बन्द भी कर तो,
मोमबत्तियां चौराहों पर
इस तरह के जुलूसो से
कब बुराई दूर होती है………………………..
मिलेगा क्या जलाने से
ये पुतले रोज चौराहों पर
इस तरह ही लपटों से
कब बुराई दूर होती है………………………..
चलो फिर से करो चर्चा
खोजो आतंक का मजहब
धरम के पैबन्द लगाने से
कब बुराई दूर होती है…………………...…..
करेंगे कुछ लोग फिर निन्दा
कागजी तलवार चमकेगी
मगर ढुलमुल इरादों से
कब बुराई दूर होती है…………………………
लिखने का हुनर आजमा
शहीद हुये फिर सरहद पर
मगर लाइकों से व्यापारों से
कब बुराई दूर होती है…………………………

सोमवार, 10 जुलाई 2017

जुनैद ह्त्या कांड- ह्त्या या उससे भी कुछ अधिक



पिछले कुछ दिनों अपने परिवारिक मंगल कार्यो में व्यस्त होने के कारण अखबार और टीवी से दूर ही रही। कल रात मेरे एक परम मित्र ने मुझे जुनैद पर लिखने के लिये प्रेरित किया। तुरन्त ही जुनैद के प्रति भाव आया कि निश्चित तौर पर जुनैद के साथ कुछ अप्रिय य अवांछनीय ही हुआ होगा। तुरन्त ही मीडिया के हर माध्यम से रात भर जुनैद के बारे में पढती रही। मुझे जुनैद के साथ हुयी बर्बरता पर कुछ नही लिखना, वो काम तो मीडिया ने कर दिया, तो फिर मुझे क्या लिखना चाहिये, जिसकी अपेक्षा मेरे मित्र ने मुझसे की।
जुनैद की हत्या स्पष्ट रूप से नफरत का परिणाम दिखती है। नफरत की चरम सीमा जहाँ व्यक्ति जानवर में कब परिणित हो जाता है , इसका आभास खुद उसे भी नही होता। और शायद मेरा जानवर कहना भी उचित नही क्योकि जानवर भी अपने आप किसी को क्षति नही पहुचाते जब तक उनको आपसे खतरे का अनुभव ना हो। अपने बचाव की प्रक्रिया में ही वह आपको चोट देता है, यहाँ निश्चित तौर पर मै यह कह सकती हूँ कि कोई भी जानवर हत्या करने जैसी भावना नही रखता।
स्पष्ट रूप से दिखता है कि नफरत व्यक्ति को जानवरों से भी बदतर बना देती है और वह जो यह भी नही जानता कि क्यो वह आपकी नफरत का पात्र है, वह यातना झेलता है, जीवन खोता है, उसके बच्चे यतीम होते है, उसके माता पिता अपनी आखों के सामने अपने लाडले को खून से लथपथ देखने को विवश होते हैं।
क्या ऐसे ही भारत को हम विश्व स्तर पर ले जाने की कल्पना कर रहे हैं। भले ही दुनिया भर के देश भारत को एक मजबूत राष्ट्र के रूप में देखने लगे हों मगर मुझे भारत का यह खोखलापन साफ तौर से नजर आता है। चाहे कितने ही गीतों में हम हिन्दू- मुसलिम – सिक्ख- इसाई, आपस में सब भाई भाई होने की बात कह ले, मगर ना जाने कितने दिलों में यह जहर आज भी भरा हुआ है। कोई भी धर्म या जाति का व्यक्ति सिर्फ इस लिये अच्छा या बुरा नही हो जाता कि वह एक विशेष जाति या धर्म है।
जुनैद हत्याकांड ना पहली घटना है ना आखिरी, जहाँ तक मै देख पाती हूँ इस देश में कुछ लोग नफरत के बीज बोने का ही काम करते है, उनका घर नफरत की फसल से ही चलता है। वो जानते है कि जिस दिन लोग मिल जुल कर रहने लगे, उनका जीवन खतरे में आ जायगा।
सभ्य समाज की कल्पना में ऐसे व्यक्तियों का जब तक अस्तित्व होगा, कल्पना सिर्फ कल्पना बन कर ही रह जायगी।
कुछ देर के लिये आपको इस घटना से दूर ले चलती हूँ
जरा सोचिये आप स्वयं किसी भी दूसरे धर्म के प्रति कितना उदार है? आप किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति के साथ कितना सहज होकर बात कर पाते है? आप किस स्तर तक उसके साथ अपने आप को जुडा हुआ महसूस कर पाते है? क्या निकटता बनाते समय आपके मन मस्तिष्क में उसके दूसरे धर्म के होने की बात चलती नही रहती?
कभी विचार किया ऐसा क्यों होता है? क्या भीड में किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति को देखकर आपके मन में कुछ नकारात्मक प्रतिक्रिया जन्म लेती है? यदि हाँ तो यकीन मानिये आप भी नफरत का बीज लिये बैठे हैं। पता नही किस धर्म की हम लोग बात करते हैं, बडी आसानी से हम लोग दूसरे धर्म के लोगो पर उंगली उठा देते है। अपने को अच्छा बताने का इससे सरल उपाय और हो भी क्या सकता है कि दूसरे को बुरा कह दिया जाय।
मै पूंछती हूँ अगर जुनैद ने उस समय अपनी पारम्परिक पोशाक ना पहनी होती, अपने पहनावे से वह किसी धर्म विशेष का ना दिख रहा होता, तब भी क्या वही होता जो हुआ? कैसे उसके पहनावे से उसका आचरण निर्धारित कर दिया गया? कैसे उसके साथ वो सब किया गया जो कदाचित नही किया जाना था? कैसे वहाँ उपस्थिति लोग मूक दर्शक बन अपनी सहमति देते रहे? क्यो पुलिस विभाग ऐसे लोगो को ढूंढने और सजा देने की प्राथमिकता सुनिश्चित नही कर पा रहा?
क्या जो आज जुनैद के साथ हुआ वो कल किसी जतिन, जॉन या जसविन्दर के साथ नही हो सकता? तो क्या नफरत के इस खेल का अन्त सारी मानव जाति के अन्त पर जा कर ही खत्म होगा?

क्या ऐसे ही देश को हम कहते रहेगें मेरा भारत महान?

रविवार, 9 जुलाई 2017

नरेन्द्र मोदी जी की सफल विदेश यात्रा पर हिन्दुस्तान को बधाई



देश का सम्मान, उसकी प्रतिष्ठा किसी भी दल या पार्टी की कूटनीतियों या आपसी मनमुटाव से परे होना चाहिये। देश का प्रधानमंत्री देश का प्रतिनिधित्व करते हैं ना कि किसी पार्टी का और इसी लिये हम सभी की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि यदि वह देश हित के लिये कार्य करें और उसमें सफल भी हो तो हमे खुले दिल से इसका स्वागत करता चाहिये। यदि विश्व में वह देश की एक मजबूत राष्ट्र के रूप छवि बनाने में सफल हुये है तो निश्चित तौर पर यह  उनके अथक प्रयासों का परिणाम है।
इस कविता के माध्यम से कुछ कहने की कोशिश की है........

कितना आसान है कह देना
आखिर उसमे रक्खा क्या है
किस्मत का है धनी बहुत
वरना वो करता ही क्या है

जिसका डंका बज रहा विश्व में
बाते जिसकी सुन रहे ध्यान से
कितनी आसानी से हम कह देते
आखिर वो कहता ही क्या है

रात दिवस का मिटा के अन्तर
देश की प्रगति मे लगा निरन्तर
कितनी आसानी से हम कह देते
आखिर वो करता ही क्या है

भाई भतीजा वाद ना मन में
जनहित ही बस उसके मन में
कितनी आसानी से हम कह देते
आखिर वो तजता ही क्या है

जाति धर्म दल से सोचो हट कर
विद्रोह न कर कठपुतली बन कर
आसानी से बस अब ना कह दो
देखो सोचो तो वो करता क्या है


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