पिछले चार साल मै शायद ही कोई दिन ऐसा हुआ होगा जब मै मन्दिर नही गया हा । रोज की दिनचर्या में शामिल था , सुबह आफिस जाने से पहले मन्दिर जाना और सीढियों से उतरते समय उसे एक का सिक्का देना । मेरी तनख्वाह के २५ रुपये उसी के नाम थे । कभी एक से ज्यादा ना मैने दिया ना उसने कभी कुछ कहा । जैसे मैन्दिर में भगवान का स्थान नियत था उसी तरह मन्दिर के बाहर उसका । एक अजीब सा रिश्ता बन गया था मेरा उसके साथ । कभी भी कोई कामयाबी मिलती तो ऐसा लगता जैसे उसमे उसकी दुआओं का भी असर है । कल मेरा प्रोमोशन हुआ था , पता नही क्यो आज मेरे हाथ से पाँच का नोट उसको देने के लिये निकल गया । आज उसके लिये मन मे अजीब सी आत्मीयता का अनुभव हुआ । मैने उसको अपनी तरक्की के बारे में बताया और यह भी कहा कि इसमें आपकी दुआओं का भी असर है । फिर मैने कहा- बाबा मै कई सालो से यहाँ आ रहा हूँ , और हमेशा आपको इसी जगह पर देखता हूँ, आप रोज सबसे पहले मन्दिर कैसे आ जाते हो , आपको कभी देर नही होती । इससे पहले कि वो मुझे जवाब देते , एक आदमी ने आकर पर्ची काटते हुये कहा – निकालो इस महीने का किराया ।फिर थोडा सा मुस्कुराते हुये बोला – अगले महीने टेन्डर पडने है ,तेरी इस जगह पर बहुत लोगों की निगाहें है । मै बिना कुछ कहे चुपचाप चल दिया , मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल चुका था।
पलाश सिर्फ अपनी डाल पर लगता है और खिल कर धरती पर गिर जाता है। वह सिर्फ अपने लिए अपनी डाल पर ही सीमित रहता है। और डाल से अलग होते ही अपने अस्तित्व को समाप्त कर देता है। यही है उसका पूर्ण समर्पण उस डाल के प्रति जिसने उसको जीवन दिया ।
रविवार, 30 जनवरी 2011
बुधवार, 26 जनवरी 2011
भारतीय गणतन्त्र का संकल्प
आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें । आज देश ने कुछ मामलों में बहुत तरक्की की है , हमारी दुनिया में एक पहचान बनी है , लोग हमे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं , किन्तु इसी के साथ हमने (हमारे कुछ भारतीयों) ने इसकी छवि को धूमिल करने के प्रयास भी किये है , आज जब भ्रष्टाचार की बात दुनिया के किसी भी कोने मे होती है तो वहाँ पर अपने देश का नाम भी आ जाता है , जो हमारे लिये बहु्त शर्मनाक बात होनी चाहिये । हमारे शहीदों ने , बापू जी ने , भगत जी ने और भी अविस्मरणीय क्रन्तिकारियों ने कभी भी ऐसे भारत का सपना नही देखा था । हमारे संविधान की परिकल्पना ऐसी नही थी कि जिसमे दोषी लोग आराम से समाज मे घूमें और बेगुनाह सजा भुगतें । शायद आज हमारा देश जिस बुलंदी पर होना चाहिये था नही है , हम सभी अपने देश के , भारत माँ के गुनहगार है । अब भी समय है , हमे सचेत हो जाना चाहिये । जब तक देश का भविष्य उज्जवल नही , किसी भारतीय का भविषय उज्जवल नही हो सकता । आज गणतंत्र दिवस के इस पावन दिवस पर हम सभी को एक संकल्प लेने की आवश्यकता है । इसे सिर्फ चंद पंक्तियां समझ कर ना पढें । जीवन मे अमल करने की भी कोशिश करें। तभी आज के दिवस को मनाने की सार्थकता है
भारतीय गणतन्त्र का संकल्प
" हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए दृढ संकल्प होकर आज तारीख 26 जनवरी २०११ को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”
जय हिन्द जय भारत
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गणतंत्र दिवस,
संकल्प
रविवार, 23 जनवरी 2011
ओढे चूनर…………

नील गगन के तले धरा पर
पीली चादर सरसों की
ओढे चुनरिया मानो बिरहन
राह निहारे प्रियतम की
सुध बुध खोई ,मगर ना खोई
आस अभी तक मिलने की ।
प्रभु के नाम सी जपती रहती
माला वो तो साजन की ॥सता रही है बनकर बैरन
पवन ये देखो अगहन की
ओढे चूनर …………….
कह के गये थे आ जाओगे
तुम दो चार महीनों में ।
कसम भी ये दे कर गये थे
आँसू ना लाना नयनों में ॥
याद नही आती क्या तुमको
घर आँगन या बगियन की
ओढे चूनर…………
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चूनर,
पीली सर्सों,
बिरहन
बुधवार, 19 जनवरी 2011
मुझे पूर्ण कर दो !!!
तमन्ना ने एक दिन हौसले से कहा – सभी कहते हैं मै अधूरी हूँ , और ये सच भी है । तुम्हारे बिना मै पूर्ण हो ही नही सकती तुम्हारा साथ पा कर ही मेरा अस्तित्व है । मुझे अपना साथ दे कर मुझे पूर्ण बना दो । हौसले ने कहा- नही , तुम मौसम के साथ बदलती रहती हो तुम अगर बदल जाओगी तो मै बिल्कुल टूट जाऊँगा । तमन्ना ने कहा – मै तुम्हे वचन देती हूँ मै जीवन के किसी भी मोड पर तुम्हारा साथ नही छोडूंगी , मगर तुम भी जीवन के अन्तिम छोर तक मुझे अपना साथ दोगे । मै तुम्हारा जीवन सवांर दूंगी । हर खुशी जो तुम चाहोगे तुम्हारे कदमों में होगी । हौसले ने बढ कर तमन्ना का हाथ थाम लिया । धैर्य की धरा और उम्मीदो के आसमां तले ये एक अद्भुद मिलन हो रहा था और आशाओं के जुगनू खुशी से सारी धरती को इस तरह प्रकाशित कर रहे थे कि गगन के तारों को भी अपनी रौशनी फीकी सी मालूम पडने लगी ।
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