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सोमवार, 25 मई 2020

हम भी

इश्क़ की राह के, हमसफ़र हम भी हुये
तुम बने जो आसमान, चांद हम भी हुये

मुकम्मल हुए ख्वाब सारे, बाद एक मुद्दत के 
रौशनीं में तेरी आज, आफताब हम भी हुये

चुभते रहे न जानिए, कितनों की निगाह में
आपने जो थामा हाथ , गुलाब हम भी हुये

गुज़र रहे थे आम से, रात दिन बेज़ार से
हुई निगाह तुमसे चार, ख़ास हम भी हुये

बुझे हुए चराग से, हुआ किये थे कल तलक
घुली जो मुझमें तेरी सांस, साज़ हम भी हुये

शनिवार, 24 जनवरी 2015

वाकिफ इससे भी होने दो............



ना सुलझा मेरी उलझन, थोडा बेचैन होने दो, 

ये भी रंग इश्क का  है, वाकिफ इससे भी होने दो


ना रोको मेरे अश्कों को, जरा बरसात होने दो

ये भी मौसम इश्क का  है, वाकिफ इससे भी होने दो


ना बोलो कुछ लबों से आज, इन्हे खामोश रहने दो

ये भी जुबां, इश्क की है, वाकिफ इससे भी होने दो


ना बैठो नजदीक इतने तुम, जरा दूरी सी रहने दो

ये भी इशारे, इश्क के हैं, वाकिफ इससे भी होने दो


ना उठाओ आज पर्दा तुम, फासले ऐसे भी रहने दो

ये भी नजारा, इश्क का है, वाकिफ इससे भी होने दो


ना लेना हाथ, हाथों में, तडप थोडी तो होने दो

ये भी कशिश इश्क में है, वाकिफ इससे भी होने दो


ना आना आज ख्वाबों में, तमाम रात जगने दो

ये भी तजुर्बे, इश्क के हैं, वाकिफ इससे भी होने दो

बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

सबसे बडा गुनाह


शायद उसने किसी का कत्ल भी कर दिया होता तो भी उसका परिवार उसको माफ कर देता, मगर उसका गुनाह तो इससे भी कही बडा था । एक ऐसा गुनाह जो उसके परिवार को आज समाज में सम्मान से जीने का अधिकार नही देता। पिता के सारे जीवन की पूंजी उनकी दौलत नही बल्कि उनकी कमाई हुयी इज्जत ही तो थी, और आज उनकी बेटी ने उसको ही मिट्टी में मिला दिया था। वो तो कहो समय रहते उन्हे हर बात मालूम हो गयी, और समाज में उनकी नजरे झुकने से बच गयी।
आखिर क्या अधिकार था निमिषा को ऐसा करने का। हमेशा से ही तो वो घर में सबकी लाडली थी। मां    हो , पापा हो या भाई, सभी उसकी हर ख्वाइश को पूरा कर देते थे। भाई ने निमिषा के लिये पिता जी को शायद पहली बार जवाब दिया था- पापा निमिषा अब मेरी जिम्मेदारी है, आप प्लीज उसको पढने भेज दीजिये। मगर प्रह्लाद को भी क्या पता था जिस लाडली बहन के लिये वो पापा से उलझ रहा है, वही एक दिन सबके लिये उलझन बन जायगी।
और ऐसा नही था कि उनका नाज करना गलत था, हर जगह ही तो वो अव्वल आती थी। जब उसकी पढाई पूरी हुयी तो उसके पापा ही उसको होस्टल से लिवाने गये थे, वहां सभी के मुंह से निमिषा की तारीफ सुन कर उसके पापा का सीना खुशी से चौडा हो गया था। और उसी भरोसे पर उन्होने उसको नौकरी के लिये बाहर जाने की खुशी खुशी आज्ञा दे दी थी, मगर वो क्या जानते थे कि कल यही निमिषा उनके लिये अपमान का विषय बन जायगी।
शायद जो गुनाह निमिषा ने किया, उसके कितने भयानक परिणाम हो सकते है , उसके बारे में उसने भी अनुमान नही लगाया होगा, काश वो समय रहते सोच पाती कि वो जिस रास्ते पर चल रही है वो मात्र फिल्मों में ही अन्तोगत्वा सफल हो जाता है, हकीकत में नही। उसे क्या अधिकार था कि एक उच्च ब्राहमण कुल में जन्म लेने के बाद वो एक शूद्र से प्रेम करे। क्या हुआ जो किताबों मे लिखा गया है कि प्रेम की कोई जाति या धर्म नही होता। वो पगली क्यो नही समझ सकी कि प्रेम भी जातीय होता है, तो क्या हुआ जो उसका मानव लाखों में एक था, क्या हुआ जो मानव सहदय होने के साथ साथ एक सफल साइंटिस्ट भी था, तो क्या हुआ जो उसने कभी निमिषा की लंबाई या चेहरे के दागों पर ध्यान ना देते हुये उसके गुणों की कद्र की। आखिर क्यों वो मानव के हाथों में अपनी तकदीर देखती रही, कैसे उसे मानव के हाथों में नीच कुल की रेखा नही दिखाई दी जो उसके उच्च्कुलीन पिता के कुल के लिये ग्रहण से कम नही थी। आज वो चाहे स्वीकार करे या ना करे मगर गुनाह तो वो कर ही चुकी थी।
अब तो बस बाकी थी इस गुनाह का प्रायश्चित - जो शायद एक कुलीन ब्राहमण पुत्र के साथ अग्नि के सात फेरे लेकर अपने मन की आहुति उस अग्निकुंड में देने से ही उसे पूरा करना था।



रविवार, 20 जुलाई 2014

एक प्रश्न ?


पूज्य पिता जी
क्षमाप्रार्थी हूँ,  
कभी आपकी अनुमति के बिना मैं कही दूर तो क्या पडोस मे कमला चाची के घर भी नही गयी किन्तु आज जीवन में पहली बार आपसे आज्ञा और आशीष लिये बिना ही घर से निकल आई हूँ। और निकली भी हूँ तो एक ऐसी यात्रा पर जिसका ना तो मुझे गंतव्य मालूम है और ना ही रास्ता, ज्ञात है  तो सिर्फ अपना लक्ष्य। 
आपके दिये हुये इस जीवन में आपसे बहुत कुछ कुछ सीखा, संक्षेप में कहूँ तो आज जो थोडी बहुत बुद्दि और साहस मुझमें है तो वह आपके लालन पालन से ही है। माता जी का आँचल तो मुझ बदनसीब को जन्म से ही नही मिला किन्तु आपके स्नेह ने मुझे कभी ममता की कमी महसूस नही होने दी। आपसे मुझे जीवन की कठिन से कठिन लडाई को सच्चाई और मानवता के सहारे जीतने का पाठ मिला है।
आपने सदैव ही मेरी हर परेशानी को बहुत आसानी से सुलझाया है मगर आज मेरे सामने एक ऐसा प्रश्न खडा हो गया है, जिसका उत्तर आपके पास भी नही है और हम आपको अनुत्तरित होते देखने का साहस नही रखते, इसीलिये स्वंय ही उत्तर की खोज में निकल आयी हूँ
सदा से ही आपने सिखाया कि प्रेम से बडा कोई धर्म नही होता, प्रेम की कोई जाति नही होती। प्रेम तो बस प्रेम होता है, यदि प्रेम में भेद हो तो वह प्रेम नही बचपन से ही आपने इस बात को कभी रामायण के प्रसंगों से समझाया कभी कबीर और रहीम के पघों से सिखलाया। कल तक आप वैदिक से बहुत स्नेह रखते थे, किन्तु जब हमने आपसे यह स्वीकार किया कि हम और वैदिक विवाह सूत्र में बँधना चाहते है तब आपने कहा - बेटी विवाह स्वजाति , स्वधर्म में ही शोभा देता है, वैदिक का और हमारा कुल अलग है। तुम अपने मन में उसके प्रति जो लगाव है उसे स्थान मत दो।
कल रात भर हम आपकी बातों पर विचार करते रहे। मुझे समझ नही आया कि क्या दो लोगो का आपस मे विवाह लेने का निर्णय इस आधार पर नही हो सकता कि वह दोनो प्रेम धर्म को मामने वाले हैं? क्या आप जब वैदिक से स्नेह करते है तब यह बात क्यों नही आती कि दो विभिन्न धर्म के किन्तु एक लिंग के लोग भी आपस में प्रेम भाव नही रख सकते? आखिर क्यों दो प्रेम धर्म को मानने वाले प्राणियों को विवाह जैसी संस्था में प्रवेश की अनुमति नही मिलती
आशा करती हूँ, शायद समाज के बनाये नियमों के पीछे छिपे तर्को को मैं खोज निकलूंगी, शायद यह बात मैं समाज में स्थापित कर पाऊंगी कि प्रेम धर्म वाकई में सबसे बडा धर्म है और सफल विवाह की बुनियाद भी। समाज की रचना के लिये जैसे विवाह अनिवार्य है , वैसे ही विवाह के लिये प्रेम ना कि जाति , धर्म का मिलान जो हमारे समाज ने अपनी सहूलियतों के हिसाब से गढ लिये है।

आशीर्वाद की आकांक्षिणी
आपकी स्नेहिल पुत्री

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