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मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

जीत या हार


अभियेन्द्र प्रताप मिश्र के नाम से कौन परिचित नही था, सभी उनका आदर करते थे, आदर इसलिये नही कि वो महान व्यक्तित्व के मालिक थे, इसलिये कि सभी उनकी शक्ति से परिचित थे। कहने को तो उनके सहयोगी और पार्टी सदस्य उनकी जीत को लोकतंत्र की जीत बता रहे थे, मगर हर व्यक्ति जानता था कि ये जीत किसकी है, जनतंत्र की या बलतंत्र की !
पिछले पन्द्रह सालों में सरकारे बदल गयी, मगर कुछ नही बदला, तो वो था सिवेर का निरंकुश शासक। जी हाँ, शासक ही तो कहा जायगा , जिसने अपने विकास के सिवा्य किसी और का विकास करना तो दूर की बात, कभी उसके लिये सोचा तक नही था, फिर भी आज तक किसी की आवाज में वो ताकत नही जो अभियेन्द्र के खिलाफ कुछ बोल सके। 
आज चौथी बार उनकी विजय और मासूम जनता की हार हुयी थी । दोपहर से उनके घर में बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ था। हर कोई कुछ ना कुछ ले कर ही आता था। उनको खुश करने के लिये सुरा और सुन्दरी दोनो के इन्तजाम किये गये। 
अभी कुछ दिनों पहले अपने कुकृत्यों के कारण, अभियेन्द्र को पार्टी प्रमुख की तरफ से कुछ चेतावना भी मिली थी, सो इस बार उन्होने अपने मुलाजिमों से किसी दूर  के इलाके में सारे इन्तजामात करने को कहा था। 
पूरे दो दिन बाद अपनी जीत की खुशी मना कर अभियेन्द्र अभी घर पहुंचे ही थे कि उनकी पत्नी ने उन्हे सूचना दी कि रश्मि दो दिन से लापता है। रश्मि उनकी पहली पत्नी की संतान थी। उनकी ये पत्नी रश्मि को बिल्कुल भी पसन्द नही करती थी और इसी कारण से उसने अभी तक अभियेन्द्र को इसकी सूचना नही होने दी थी। वो खुद भी दो बार रश्मि को मरवाने की कोशिश कर चुकी थी। अभियेन्द्र को किरणवती पर से विश्वास उठ चुका था और इसीलिये उन्होने रश्मि को बचपन से ही पढने के लिये बोर्डिंग स्कूल भेज दिया था। दो दिन पहले वो अपने पिता की जीत की खुशी में शामिल होने और उनको सरप्राइस देने के लिये आ रही थी, कि किसी ने शायद उसका अपहरण कर लिया था। वो तो कालेज वालों ने घर फोन किया था कि रश्मि घर चली आई है, उसे बता दिया जाय कि उसका नाम एशियाई खेल में जाने वाली टीम में सेलेक्ट हो गया है, मगर आज दो दिन बाद भी वो अभी तक घर नही आयी थी।
सारी बात जानने के बाद, अभियेन्द्र पुलिस को सूचना देने ही वाले थे कि तभी फोन की घंटी बजी। और उधर से किसी ने कहा - अभियेन्द्र तुमने मुझे हरा कर जिस तरह अपनी जीत की खुशी मनाई है, मैने भी उतनी ही खुशी अपनी हार की मनाई है,फर्क बस इतना है तेरे साथ तो तुम्हे भी नही पता था किसकी किसकी बेटियां थीं, मगर ये जान ले मेरे साथ सिर्फ एक ही व्यक्ति की इकलौती बिटिया थी -जिसने मुझे हराया है । अब सोचो कौन जीता इस बार तुम या मै !
आज दस दिन बीत चुके थे, मगर अभियेन्द्र अपनी सारी प्रत्यक्ष एंव परोक्ष शक्ति लगा देने के बाद भी रश्मि का पता ना लगा सके थे। आज उन्हे अपने पद का कोई मान ना बचा था। चालीस वर्षीय अभियेन्द्र इन दस दिनों में दस वर्ष की उम्र पार कर चुके से लगते थे। सब कुछ होते हुये भी वो खुद को दुनिया का सबसे गरीब व्यक्ति मान रहे थे। दो दिनों से उन्होने अन्न जल भी छोड रखा था, जिस भगवान को ना जाने कब से भूले बैठे थे, आज सारी उम्मीदें उसी ईश्वर से थी। तभी उनके सामने वो अभियेन्द्र आ खडा हुआ - जो निर्बल तो था मगर निश्छल था, निर्धन तो था, मगर मानवता की दौलत से भरपूर सच का प्रतिबिम्ब था । अभियेन्द्र अपने इस रूप से नजरे नही मिला पा रहे थे, आखिर कहाँ खो गया था - उनका बल, उनका अभिमान, उनकी अकूत सम्पदा जिसके सामने उनसे कोई नजरे मिलाना तो दूर नजरे उठा तक ना पाता था! निर्भीक अभियेन्द्र ने , इस क्षीण, दुर्भल, परास्त अभियेन्द्र से पूछा - आज किस बात के लिये रोते हो ? आज अपनी बेटी नही मिल रही तो इतनी बेचैनी है, जरा सोचो कितनी बटियों को तुमने लापता कर दिया, तब क्या बीती होगी, उन सभी के माँ बाप पर। जब असहाय लोगों के घर जला कर अपनी लालसाओं की अग्नि को शान्त करते थे तब कैसे वो बेबस लोग खुद को आग की लपटों के हावाले कर देने को मजबूर हो जाते थे।
भगवान के सामने रोता बिलखता अभियेन्द्र, अब सिर्फ एक पिता था, बेटी के विछोह ने उसे एक दरिन्दे से इन्सान में परिवर्तित कर दिया था। वो किसी भी तरह से अपने पापों का प्रायश्चित करना चाह रहा था। उसे आज अपनी बेटी के अलावा ईश्वर से कुछ नही चाहिये था ।
वो बिलख बिलख कर ईश्वर से अपने कुकर्मों की सजा मांग रहा था, और याचना कर रहा था कि उसे अपनी बेटी को खो देने जैसी सजा ना दे।
तभी उनके दरबान ने कहा - सरकार बिटिया आई है, सुनते ही अभियेन्द्र ऐसे भागे जैसे भक्त को भगवान मिल जाये। रश्मि को देखते ही अभियेन्द्र अपनी बेटी से लिपट गये जैसे किसी शाख से बेल, यूं लगा जैसे अपने जीवन श्रोत उन्हे मिल गया हो। कुछ पल ज्ञान में आने के बाद, बोले- तुम कहाँ चली गयी थी, तुम्हे पता है, तुम्हे कहाँ कहाँ नही खोजा, तुम्हे कुछ हुआ तो नही ..... उनके सवालों की मूसला धार वर्षा को रोकते हुये रश्मि ने कहा - पिता जी, मै पूरी तरह से ठीक हूँ, और आज मुझे सकुशल घर तक आपके सामने लाने का पूरा श्रेय उस व्यक्ति को है, जिसका जीवन खत्म करने में आपने कभी कोई कसर नही छोडी - कौशल व्यास। नाम सुनते ही, अभियेन्द्र के सामने एक ही क्षण में कौशल और उसके साथ किये गये अत्याचारों की, उसको बल के जोर से चुनाव में पिछले दो बार से हराने की, उसके सत्यवादी विचारों को दबाने की जो तस्वीर दिखाई दी, आज वो खुद उसको ना देख सके, एकाएक उनकी आंखे बन्द हो गयी, उन्हे आज अहसास हुआ कि निर्बल वो नही था, वो ही उससे भयभीत थे, तभी तो उसके निर्दलीय उम्मीद्वार होते हुये भी, वो अपनी जीत को लेकर आशंकित रहते थे। एकाएक उनके आखों के कोरों से अश्रुधार बह निकली, जिसमें से उनके पाप भी बह रहे थे।
वो समझ रहे थे कि उनकी बेटी को एक ऐसा इन्सान मिल गया था, जो उन्हे जिन्दगी की असली जीत का पाठ पढाना चाह रहा था। आज उन्हे जीत के मायने समझ आ गये थे। उन्हे जीत और हार से बाहर की परिधि का जीवन दिख रहा था। कुछ भी ना पूछते हुये उन्होने रश्मि से बस इतना ही कहा - बेटी मुझे खुशी है कि जिस व्यक्ति को मैं छल बल से हराता रहा, आज उसने तुम्हे अपना निस्वार्थ सहयोग देकर, मुझे जिन्दगी मे हारने से बचा लिया।



रविवार, 13 अप्रैल 2014

क्यों करें मतदान ?

मतदान करे, देश निर्मांण करे,

हो बूढे, महिला या फिर जवान, उंगली पे हो स्याही का निशान
भारत विश्व का सबसे बडा लोकतांत्रिक देश है, और इस देश की चुनाव प्रक्रिया पर पूरे विश्व की निगाहें हैं। देश के हर नागरिक को, जिसे मत देने का अधिकार हमारे संविधान में दिया गया है, उसका सही उपयोग करना होगा। ये ना सिर्फ हमारा अधिकार है बल्कि कर्तव्य भी है, कि हम देश को एक ऐसी सरकार दें, ऐसे सांसद दे, जो देश को विश्व पटल पर अग्रसित करें।

अक्सर पढे लिखे समाज में भी ये कहते सुनते पाया जाता है कि "कोउ नृप होय हमे का हानि" या फिर हमारे एक वोट से क्या होगा, या कोई भी सरकार हो हमे क्या, सभी भ्रष्ट है, या कुछ नही बदलने वाला यहाँ, या फिर हमे तो पढ लिख कर बाहर चले जाना है, फिर ह्म क्यो सोचे, कोई भी सरकार बने..........
लोकतंत्र का होगा सम्मान, ज्यादा होगा जब मतदान
कुछ प्रश्न हम करना चाहते है उन लोगों से जो चुनाव के दिन को मात्र एक छुट्टी मानते हैं, या फिर अपने संसदीय क्षेत्र में आकर मतदान में अपनी सहभागिता सुनिश्चित नही करते कि कौन जाय वोट देने, क्यो अपना पैसा खर्च करें ........
१.क्या होता यदि आपके पास मतदान का अधिकार ना होता?
२.क्यों मतदान की आयु 21 वर्ष की जगह 18 वर्ष की गयी?
३.क्या अर्थ है लोकतंत्र का यदि हमारी भूमिका नगण्य है?
४.हम देश की दिशा और दशा को निर्धारित करने वाली इकाई है, यदि यह शून्य हो जाय, तो क्या देश रहेगा?
५.क्या देश निर्माण के लिये हम अपने मत का दान ना करके देश के भविष्य के साथ धोखा नही कर रहे?
६.क्या जवाब देंगें आप स्वंय को, जब आपके सहयोग ना करने के कारण, गलत हाथों में देश रहे और  विश्व में उसकी छवि खराब हो, क्या देश की छवि, हमारी छवि नही?
७.क्या अधिकार है हमे भारतीय कहलाने का, जब हम उस समय सो जाते हैं या अकर्मण्य हो जाते है, जब  देश हमसे सहयोग मांगता हैं?
८.क्या अधिकार है आपका देश को, या सरकार को दोष देने का,जब आपको देश या देशवासियों की जरूरतों से कोई सरोकार ही नही?
९.क्या देश का नागरिक होने के नाते हमारा फर्ज नही कि कुछ देर हम देश के लिये चिंतन करें, मनन करें और अपनी वोट की आवाज से देश की आवाज को बुलंद बनाये?

१०.क्या सच में हमें अधिकर है खुद को भारतीय कहलाने का, यदि हम भारत के लाभ और अपने लाभ को एक नही अलग-अलग देखते हैं?
प्रयोग कीजिये चुनाव का अधिकार, दीजिये भारत को योग्य सरकार

चुनाव एक ऐसा हवन हैं, जिसमें हम सबको अपने मत की आहुति दे कर इस यज्ञ को सफल बनाना होगा। लोगों को प्रेरित करना होगा, कि वो भी अपने मत का दान करें। 
सहयोग कीजिये, यदि आपके आस पास कोई बुजुर्ग है, और वो अकेले चुनाव स्थल तक जाने में असमर्थ है। यदि आपके घर में महिलायें हैं और वो ये मानती हैं कि उनको वोट देने की कोई खास जरूरत नही, घर के आदमी ही डाल आयें। तो उन्हे भी अपने साथ ले कर जाइये। 
आपको बहुत सारी छुट्टियां मिलती हैं जब आप अपनों के साथ त्योहार मनाते हो, ये एक छुट्टी अपने देश के साथ मनाइये। देश के लिये हर वोट बराबर की कीमत रखता है।
वोट डालने से पहले अच्छी तरह से विचार कीजिये कि आप किसे वोट देगें और क्यों?
एक अच्छे नागरिक होने का फर्ज निभाइये,

लोकतंत्र को दे आधार, सपने सब होंगे साकार



रविवार, 30 मार्च 2014

जीवन गीत....



वो गीत दुआ बन जाते हैं, जो दर्द मे राहत देते हैं
कांटों मे भी जीवन होता है, ये फूल चमन के कहते है......

कोई रात सदा की होती नही, कोई गम भी सदा तो जीता नही
कोई चाहे भी तो चाह के भी, हर पल को खुशियां मिलती नही
इस रात की काली चादर में, ही तो तारे झिलमिल सजते है....
वो गीत दुआ..............

मिलती है उसे ही सच्ची खुशी, जो दर्द मे भी खुश रहता है
फिर हों अपने या हों बेगाने, पीडा सबकी ले लेता चलता है
देने सबको जैसे जीवन, पी कर विषप्याला शिव हसते है........
वो गीत दुआ..............

हैं जख्म मिले जो दुनिया से, तो कैसा शिकवा किस्मत से
जो आज नही कोई साथ मेरे, तो क्यों रूठे हम कुदरत से
वो लोग ही कुन्दन बनते हैं, जो वक्त की आंच में तपते हैं....

वो गीत दुआ..............

रविवार, 23 मार्च 2014

दीवारें- The Walls of Mankind


कभी कभी सोचती हूँ कि आखिर वो कौन लोग थे जिन्होने जाति और धर्म की दीवारे बनाई, क्यों ये दीवारें इतनी मजबूत हैं कि दिलों को भी अलग कर देती हैं। आखिर क्यों हम इंसानियत को सबसे बडा धर्म कहते हैं, जबकि इसका तो कही अस्तित्व ही नही दिखता।
ऐसा नही था कि ये विचार पहली बार मेरे दिल दिमाग में दस्तक दे रहे थे, मगर कल की घटना ने मुझे कही अन्दर तक हिला कर रख दिया था ।
करीब एक महीने पहले बहुत बुरी तरह से दर्द से पीडित किसी व्यक्ति को लेकर माधवी मेरे अस्पताल आई थी। अस्पताल में काफी भीड थी, मगर फिर भी उस भीड में भी पन्द्रह साल पहले मिली माधवी को पहचानने में एक क्षण भी ना लगा। उसकी आँखों में कुछ अलग ही बात थी। मगर मैं चाह कर भी अपनी सीट से उठ नही सकी, बस अपने असिस्टेंट से माधवी की तरफ इशारा करते हुये कहा - राजेश उस मरीज को पहले भेज दो, लगता है कुछ सीरियस केस है।
समय की परेशानियों ने शायद माधवी की यादों पर संघर्ष की एक परत चढा दी थी , वो मुझे एक झलक में पहचान ना सकी, मगर नैनपरी कहते ही वो बोल उठी, अरे बदरा तुम , दरअसल उसकी सुन्दर आंखों के कारण मै उसको नैनपरी और मेरे घने लम्बे बालों के कारण वो मुझे बदरा कहा करती थी। उसकी आँखे तो आज भी वैसी ही खूबसूरत थी मगर मेरा बदरा नाम मुझ पर अब नही जचँता था । उस मरीज को देखने के दौरान ही पता चला कि वो व्यक्ति कोई और नही उसका पति रंजन है। सारी टेस्टिंग्स के बाद पता चला कि रंजन की एक किडनी तो पूरी तरह से फेल हो चुकी है और दूसरी की भी हालत ठीक नही । रंजन को मैने अपने ही हास्पिटल मे एडमिट कर लिया था। मै देखती थी रंजन की सेवा में अकेली माधवी ही लगी रहती थी। फिर एक दिन मेरे पूँछने पर पता चला कि, उन दोनो की शादी में रंजन के परिवार वालों की कोई सहमति नही थी, शादी के आठ साल और दो बेटे होने के बाद भी ससुराल वालों ने कभी मुड कर नही देखा । शादी के दो साल बाद माधवी के माता पिता जी एक दुर्घटना में नही रहे थे। आज उसके जीवन की धुरी इन तीन जीवन स्तम्भों पर टिकी थी।  
एक दिन मैं अपने केबिन मे थी कि माधवी मेरे पास आई - बोली रितिका एक परेशानी है समझ नही आता क्या करूँ, मै अक्सर देखती हूँ, ये अपने माँ पिता जी को बहुत याद करते है, कहते तो कुछ नही मगर मुझे लगता है कि वो उनके पास जाना चाहते है, उनसे मिलना चाहते हैं, मुझे समझ नही आ रहा क्या करूँ? कहते कहते उसका गला रुंध सा गया। फिर मेरी सलाह पर उसने अपने ससुराल वालों को उनके पुत्र की तबियत की सू्चना दी । और फिर कल माधवी ने स्तब्भ भाव से आ कर मुझे एक कागज पकडा दिया ।
यह उसके पत्र का उत्तर था, उस पत्र का संक्षेप बस यही था कि वो अपने पुत्र को ना सिर्फ देखने के लिये आ सकते हैं बल्कि उसका इलाज कराने और अपने साथ रखने को भी तैयार है, मगर उसके लिये माधवी और उसके पुत्रों को ये मान लेना पडेगा कि रंजन की दुनिया में उनका कोई अस्तित्व नही है।
पत्र पढकर कुछ पल के लिये यूँ लगा जैसे मैं ऐसी जगह हूँ जहाँ सिर्फ अन्धकार है। मै हतप्रभ थी, कि क्या जाति का जीवन में इतना अहम स्थान है जो अपने बीमार पुत्र को उसकी पत्नी के साथ स्वीकार नही कर सकता । क्या रंजन और माधवी ने सच में अंतर्जातीय विवाह करके समाज की उस व्यवस्था को बिगाडा है जहाँ प्रेम, त्याग, समर्पण जैसी भावनाये दम तोड दे। क्यों समाज की व्यवस्था ने माधवी के सामने एक ऐसी स्थिति ला दी जहाँ उसे खुद को अपराधी समझना पडे।

इन सारी परिस्थितियों मे यदि वह स्वयं को शून्य मानकर रंजन और उसके माता पिता के बीच की दीवार गिराती है तो एक नयी दीवार खडी होती है जिसके एक तरफ रंजन और दूसरी तरफ उसके पुत्र होंगें। 
क्या सच में ऐसा कोई रास्ता नही था, जो एक दीवार गिराने पर दूसरी एक दीवार नही , बल्कि दो घरों को एक कर देता ............
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